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ब्रिक्स भुगतान प्रणाली में डॉलर की कितनी चुनौती?

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डॉलर की जगह भुगतान की दूसरी प्रणाली अनिश्चितता भरी दुनिया में जोखिम कम करने के लिए जरूरी है।

Last Updated- February 08, 2025 | 11:15 AM IST
Brics

ब्रिक्स उन अंतर-क्षेत्रीय संगठनों में शामिल है, जो अमेरिका में नया निजाम आने के फौरन बाद सीधे निशाने पर आया है। अमेरिका के राष्ट्रपति डॉनल्ड ट्रंप ने खुलेआम धमकाया है कि अगर ब्रिक्स डॉलर की जगह कोई और मुद्रा अपनाता है तो उस पर 100 प्रतिशत शुल्क लगा दिया जाएगा। ब्रिक्स देशों में डॉलर की जगह दूसरी मुद्रा अपनाए जाने की चर्चा तभी से शुरू हो गई, जब 2024 में इसमें नए सदस्य शामिल हुए और व्यापारिक सौदे निपटाने के लिए वैकल्पिक मुद्राओं का इस्तेमाल किया गया। इससे यूक्रेन संकट के बाद रूस पर लगे आर्थिक प्रतिबंधों को कुछ हद तक बेअसर करने में भी सफलता मिली। अब तो अमेरिका और चीन के द्विपक्षीय संबंध भी व्यापार और तकनीकी होड़ से ज्यादा तय हो रहे हैं,जिस कारण अपनी मुद्रा रेनमिनबी को अंतरराष्ट्रीय स्तर पर चलाने के चीन के प्रयासों ने भी अमेरिका की नींद उड़ा दी है।

ब्रिक शब्द का इस्तेमाल सबसे पहले गोल्डमैन सैक्स ने तेजी से उभरती प्रमुख अर्थव्यवस्थाओं ब्राजील, रूस, भारत और चीन के लिए किया था। ब्रिक की पहली बैठक 2009 में हुई। उसके अगले साल दक्षिण अफ्रीका भी इसका हिस्सा बन गया और नाम ब्रिक्स हो गया। लंबे अंतराल के बाद 2024 में ब्रिक्स का फिर विस्तार हुआ। इसमें साझेदार देशों की श्रेणी जोड़ी गई, जिसमें संयुक्त अरब अमीरात (यूएई), मिस्र, इथियोपिया और ईरान आए। जनवरी 2025 में इंडोनेशिया भी ब्रिक्स का सदस्य बन गया। 10 सदस्यों और 9 साझेदारों वाले इस समूह को ‘ब्रिक्स प्लस’ कहा जा रहा है। दुनिया की करीब 55 प्रतिशत आबादी इसी समूह में रहती है और क्रय शक्ति समानता (पीपीपी) के लिहाज से दुनिया का 40 प्रतिशत सकल घरेलू उत्पाद (जीडीपी) भी इसी समूह में है। कुल वस्तु निर्यात में ब्रिक्स की चौथाई हिस्सेदारी है।

इसलिए खासी आर्थिक रसूख वाले ब्रिक्स प्लस को दुनिया के पिछड़े और विकासशील देशों की आवाज तथा वैकल्पिक विश्व व्यवस्था का जनक माना जा रहा है। रूस के कजान शहर में 2024 में हुई ब्रिक्स की बैठक में नेताओं के संयुक्त वक्तव्य में जिन बातों पर जोर दिया गया, उनमें ब्रिक्स देशों के बीच भुगतान प्रणाली के जरिये वित्तीय एवं व्यापारिक सहयोग मजबूत करना, व्यापार बाधाएं कम से कम करना और साझेदार देशों के बीच व्यापारिक सौदे स्थानीय मुद्रा में निपटाना शामिल हैं। इन घोषणाओं पर पश्चिमी देशों का ध्यान गया है मगर सवाल उठ रहे हैं कि ये कदम कितने व्यावहारिक हैं। व्यापार सौदों के निपटान के लिए प्रस्तावित वैकल्पिक मुद्रा प्रणाली की व्यावहारिकता पर विशेष रूप से संशय जताया जा रहा है।

ब्रिक्स प्लस देशों की राजनीतिक व्यवस्था अलग-अलग है और वे आर्थिक विकास के अलग-अलग स्तरों से गुजर रहे हैं, जो समूह की ऊपर बताई महत्त्वाकांक्षाओं की राह में सबसे बड़ा रोड़ा बन रही है। इसके अलावा दुनिया भर के केंद्रीय बैंकों के विदेशी मुद्रा भंडार में, अंतरराष्ट्रीय ऋण में एवं विदेशी मुद्रा में व्यापार तथा निर्यात के मामले में डॉलर का बोलबाला देखकर व्यापारिक सौदों के लिए वैकल्पिक मुद्रा की व्यावहारिकता पर सवाल उठाए जा रहे हैं। रूस को सोसाइटी फॉर वर्ल्ड इंटरबैंक फाइनैंशियल टेलीकम्युनिकेशन्स (स्विफ्ट) में प्रवेश नहीं देने और उसे विश्व अर्थव्यवस्था से एक तरह से बाहर करने की पश्चिम की कोशिश के बाद डॉलर पर निर्भरता कम करने की ब्रिक्स देशों की मंशा अपनी जगह है मगर सवाल यह है कि प्रमुख ब्रिक्स अर्थव्यवस्थाएं अमेरिका के साथ अपने रिश्तों में कितना जोखिम ले सकती हैं।

पिछले दो वर्षों से रूस से भारी मात्रा में कच्चा तेल खरीदने वाले चीन और रूस के सामने अमेरिका के साथ व्यापारिक रिश्ते साधने की चुनौती आ रही है, जो उनका सबसे बड़ा निर्यात बाजार है। इसलिए इन दोनों अर्थव्यवस्थाओं और अन्य सदस्य देशों के लिए डॉलर छोड़कर वैकल्पिक मुद्रा, व्यापार तथा वित्तीय व्यवस्था तैयार करने की गुंजाइश शायद कम है। एक दिक्कत यह भी है कि बड़े सदस्य देश वर्तमान अंतरराष्ट्रीय वित्तीय संस्थाओं में ज्यादा से ज्यादा नुमाइंदगी और बहुपक्षीय व्यवस्था में सुधार की मांग कर रहे हैं।

इस बीच ब्रिक्स के कुछ सदस्य देशों में तेजी से विकसित होती भुगतान प्रणाली एवं वित्तीय ढांचे को नजरअंदाज नहीं किया जा सकता चाहे फिलहाल उनका इस्तेमाल केवल द्विपक्षीय या क्षेत्रीय व्यापार एवं वित्तीय लेनदेन के लिए ही क्यों न हो रहा हो। चीन का पूंजी खाता दूसरों की तुलना में कम खुला है, जिसके कारण आ रही बंदिशों से पार पाने के लिए उसने द्विपक्षीय मुद्रा आदान-प्रदान (स्वैप) और ऑफशोर क्लियरिंग बैंक जैसी वैकल्पिक संस्थागत व्यवस्थाएं एवं वित्तीय व्यवस्थाएं तैयार कर ली हैं। चीनी बैंकों की विदेशी शाखाओं और विदेशी बैंकों की शाखाओं को रेनमिनबी में निपटान के लाइसेंस दिए गए हैं। रेनमिनबी को विशेष आहरण अधिकारों तथा ग्लोबल बॉन्ड सूचकांकों में जगह देकर इन व्यवस्थाओं को प्रोत्साहन दिया जा रहा है। इसके कारण ज्यादा व्यापारिक सौदे रेनमिनबी में निपटाए जा रहे हैं।

आंकड़े बताते हैं कि रेनमिनबी का इस्तेमाल दुनिया भर में भले ही कम (दो देशों के बीच होने वाले सौदों का केवल 2 प्रतिशत) है मगर अलग-अलग क्षेत्रों में यह अनुपात भिन्न है। कुछ एशियाई देशों, लैटिन अमेरिकी देशों और अफ्रीका के कुछ हिस्सों में इसका जमकर इस्तेमाल हो रहा है। इससे भौगोलिक और राजनीतिक निकटता के साथ यह भी पता चलता है कि इन अर्थव्यवस्थाओं का चीन के साथ व्यापार बहुत अधिक है। वैश्विक मूल्य श्रृंखलाओं में चीन की गहरी पैठ और उसके बढ़ते निवेश का इसके पीछे बड़ा हाथ है। संकट से उबरने में भी रेनमिनबी का इस्तेमाल हो रहा है, जैसा 2023 में दिखा जब अर्जेंटीना ने अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष का कुछ कर्ज उतारने के लिए चीन के केंद्रीय बैंक की स्वैप लाइन का इस्तेमाल काय था।

भारत भी स्थानीय मुद्राओं में व्यापार के लिए संयुक्त अरब अमीरात, मलेशिया और इंडोनेशिया जैसे देशों के साथ समझौते कर रहा है, जिनके तहत निर्यातकों और आयातकों को अपने-अपने देश की मुद्राओं में भुगतान का मौका मिल जाता है। इससे कम से कम खर्च और समय में निपटान हो जाता है। साथ ही इसमें डिजिटल भुगतान के लिए भारत के सफल यूनिफाइड पेमेंट्स इंटरफेस (यूपीआई) का भी इस्तेमाल हो सकता है। ब्रिक्स के अन्य प्रमुख अर्थव्यवस्थाओं – चीन, रूस, ब्राजील और इंडोनेशिया – के पास भी उनकी डिजिटल भुगतान प्रणाली हैं। इनकी डिजिटल वॉलेट तकनीक तथा क्यूआर कोड व्यवस्थाओं का इस्तेमाल सीमा पार भुगतान तथा संदेश प्रणाली में किया जा सकता है ताकि सदस्य देश अपनी मुद्राओं में व्यापार कर सकें। इससे स्विफ्ट और केवल डॉलर पर निर्भरता का जोखिम कम हो जाएगा। मगर पहले देशों की भुगतान व्यवस्थाओं तथा फिनटेक ढांचों को एक दूसरे के साथ काम करने लायक बनाना होगा। तकनीकी पहलुओं के अलावा देशों के नियम कायदों के मुताबिक ढलने वाला साझा नियामकीय ढांचा तैयार करना भी ब्रिक्स प्लस देशों के लिए चुनौती होगी।

दुनिया में अनिश्चितता बढ़ रही है, शुल्कों को हथियार बनाया जा रहा है और बार-बार प्रतिबंध की धमकियां मिल रही हैं। इसलिए जरूरी है कि ब्रिक्स प्लस देश जोखिम कम करने के लिए आपसी व्यापार में ब्रिक्स प्लस सीमा पार भुगतान प्रणाली को बढ़ावा दें। बेशक इसका मकसद डॉलर को चुनौती देना नहीं है और न ही अभी यह इस लायक बन पाई है।

(लेखिका जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय में अर्थशास्त्र की प्राध्यापक हैं। लेख में निजी विचार हैं)

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First Published - February 8, 2025 | 11:07 AM IST

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