इस सप्ताह आयोजित बिज़नेस स्टैंडर्ड मंथन में वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण ने कृषि क्षेत्र के लिए विकसित की जा रही डिजिटल अधोसंरचना ‘एग्रीस्टैक’ को भावनात्मक रूप से ‘अगला यूपीआई’ करार दिया। वह उस यूनिफाइड पेमेंट इंटरफेस का हवाला दे रही थीं जिसने न केवल देश में खुदरा भुगतान प्रणाली को क्रांतिकारी ढंग से बदल दिया बल्कि अब उसका विदेश में भी विस्तार हो रहा है।
परंतु यूपीआई की अवधारणा अपेक्षाकृत सरल है। यह उपयोगकर्ता के बैंक खातों को डिजिटल भुगतान प्रणाली से जोड़ता है और गूगल पे या फोनपे जैसे वाणिज्यिक ऐप के माध्यम से उन तक पहुंचा जा सकता है। इसके विपरीत एग्रीस्टैक कहीं अधिक महत्त्वाकांक्षी और जटिल प्रयास है जो केंद्र एवं राज्यों की प्रशासनिक तथा आईटी क्षमताओं की परीक्षा लेगा।
इसका इरादा 11 करोड़ किसानों के लिए डिजिटल आईडी तैयार करना और किसान पंजीकरण, भू अभिलेख और फसल डेटा को जोड़ने वाले तीन बुनियादी डेटाबेस तैयार करना है। इसका उद्देश्य स्पष्ट है: किसानों को न्यूनतम कागजी कार्रवाई या सेवा प्रदाताओं के पास जाने की जरूरत के बिना लाभ और सेवाओं तक पहुंच प्रदान करना।
केंद्र द्वारा सितंबर 2024 में अनुमोदित इस परियोजना के तहत राज्यों को अपने किसानों का पंजीकरण करने के लिए वित्तीय मदद आवंटित की गई है। अधिकांश राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों ने इस पर हस्ताक्षर कर दिए हैं। अब तक 8.62 करोड़ किसान आईडी बनाई जा चुकी हैं। केंद्र का लक्ष्य मार्च 2027 तक इस कार्य को पूरा करना है। इसलिए एग्रीस्टैक को प्रभावी बनाने के लिए बारीक डेटा संग्रह आवश्यक है। हालांकि देश के कुछ हिस्सों में ड्रोन तकनीक का उपयोग करके कृषि भूमि की डिजिटल मैपिंग में तेजी से प्रगति हुई है किंतु भू-स्वामित्व स्थापित करना एक कठिन काम रहा है।
सैद्धांतिक तौर पर ऐसा इसलिए क्योंकि देश के करीब 20 फीसदी किसान परिवार जमीन पट्टे या बंटाई पर लेकर खेती करते हैं जबकि जमीन के वास्तविक स्वामी बड़े शहरों या विदेशों में बस चुके हैं। कुछ राज्यों में बंटाई या पट्टे पर खेती करने वालों का अनुपात 36 फीसदी तक है। इसके बावजूद अगर किसानों का पंजीयन और भू-अभिलेख को सही तरीके से दर्ज किया जाता है तो एग्रीस्टैक एक बड़ा बदलाव लाने वाला साबित हो सकता है।
खासतौर पर भूमिहीन खेतिहर किसानों के लिए जो बंटाई या पट्टे पर खेती करने वाले किसानों का लगभग एक-तिहाई हिस्सा हैं और छोटे जोत और सीमित स्वायत्तता के कारण सबसे अधिक असुरक्षित वर्ग में आते हैं। इनमें से अधिकांश की संस्थागत ऋण या फसल बीमा जैसी सरकारी सहायता योजनाओं या पीएम किसान प्रत्यक्ष लाभ हस्तांतरण कार्यक्रम तक बहुत कम पहुंच है। इसके तहत न्यूनतम आय सहायता के रूप में प्रति वर्ष 6,000 रुपये हस्तांतरित किए जाते हैं। आंकड़े यह भी दर्शाते हैं कि उर्वरक का 60 फीसदी उपयोग उन लोगों द्वारा किया जाता है जिनके नाम पर जमीन नहीं है।
दरअसल, उर्वरकों के उपयोग में एग्रीस्टैक महत्त्वपूर्ण लाभ पहुंचाने की क्षमता रखता है। यह आगामी वित्तीय वर्ष में 1.7 लाख करोड़ रुपये से अधिक के बजट वाली बढ़ती सब्सिडी को नियंत्रित करने और मिट्टी की सेहत को बहाल करने, दोनों में कारगर साबित हो सकता है। उदाहरण के लिए, हरियाणा में एग्रीस्टैक का उपयोग करके भूमि, उर्वरक उपयोग और उगाई गई फसलों को जोड़ने वाले एक प्रयोग से भारी बचत हुई।
सबसे बड़ी कटौती यूरिया में हुई, जिस पर इतनी अधिक सब्सिडी दी जाती रही है कि इसके लगातार अत्यधिक उपयोग से उर्वरक उपयोग में असंतुलन पैदा हो गया है। वर्षों से, फॉस्फेटिक (पी) और पोटैशियम (के) उर्वरकों की तुलना में यूरिया (एन) का यह अत्यधिक उपयोग, जिसे आमतौर पर एनपीके असंतुलन के रूप में जाना जाता है, मिट्टी के क्षरण और कृषि उत्पादकता में गिरावट का एक प्रमुख कारण रहा है।
इसलिए, एग्रीस्टैक उर्वरक सब्सिडी के वितरण में महत्त्वपूर्ण नीतिगत बदलाव ला सकता है, जिससे सब्सिडी निर्माताओं के बजाय सीधे किसानों तक पहुंचेगी। प्रत्यक्ष हस्तांतरण से उपयोग में पारदर्शिता भी आ सकती है, जिससे सब्सिडी का अधिक सटीक समायोजन संभव हो सकेगा। विशेषज्ञों का मानना है कि इससे लगभग 30,000-40,000 करोड़ रुपये की बचत हो सकती है। लेकिन बहुत कुछ डेटा संग्रह तंत्र की सटीकता और दक्षता पर भी निर्भर करेगा।