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फरवरी में FPI निवेश 17 महीने के हाई पर, करीब तीन साल बाद म्युचुअल फंड बने शुद्ध बिकवाल

विशेषज्ञों का मानना ​​है कि म्युचुअल फंडों की यह ताजा बिकवाली संरचनात्मक के बजाय रणनीतिक ज्यादा है

Published by
मयंक पटवर्धन   
समी मोडक   
Last Updated- February 26, 2026 | 10:53 PM IST

घरेलू शेयर बाजारों में निवेशकों के व्यवहार में एक दुर्लभ अंतर देखने को मिल रहा है। इसमें जहां विदेशी पोर्टफोलियो निवेशक (एफपीआई) शुद्ध खरीदार बन रहे हैं वहीं घरेलू म्युचुअल फंड (एमएफ) बिकवाल बन रहे हैं। इस महीने विदेशी पोर्टफोलियो निवेशक (एफपीआई) भारतीय शेयरों में अब तक करीब 25,000 करोड़ रुपये का निवेश करके मजबूत शुद्ध खरीदार के रूप में उभरे हैं, जबकि म्युचुअल फंड लगभग 1,000 करोड़ रुपये की निकासी करके शुद्ध बिकवाल बन गए हैं। विदेशी निवेश का आकार उल्लेखनीय है क्योंकि इससे सितंबर 2024 के बाद से एफपीआई की सबसे ज्यादा शुद्ध खरीदारी जाहिर होती है।

लंबे समय से चले आ रहे जोखिम वाले माहौल के बाद निवेश आने से कुछ राहत मिली है। पिछले 13 महीनों में विदेशी पोर्टफोलियो निवेशकों (एफपीआई) ने घरेलू शेयरों से करीब 2 लाख करोड़ रुपये निकाले थे। इसके विपरीत म्युचुअल फंडों ने अप्रैल 2023 के बाद पहली बार मासिक स्तर पर शुद्ध निकासी दर्ज की है। इस तरह घरेलू शेयरों को मिल रहे उनके लगातार समर्थन का सिलसिला टूट गया है। 2025 से म्युचुअल फंडों ने घरेलू शेयरों में अब तक करीब 5.5 लाख करोड़ रुपये का निवेश किया है। विशेषज्ञों का मानना ​​है कि म्युचुअल फंडों की यह ताजा बिकवाली संरचनात्मक के बजाय रणनीतिक ज्यादा है।

बजट से जुड़ी नरमी के बाद बाजारों में तेजी से सुधार आ चुका है और विदेशी भागीदारी भी बढ़ रही है। समझा जाता है कि घरेलू फंड प्रबंधक वैश्विक आर्थिक घटनाओं और कंपनियों के आगामी नतीजों को देखते हुए संभावित अस्थिरता से पहले मुनाफावसूली, पोर्टफोलियो को फिर से संतुलित कर रहे हैं और नकदी स्तर बढ़ा रहे हैं।

विदेशी निवेशकों की बढ़ती दिलचस्पी सिर्फ भारत तक ही सीमित नहीं है। चीन, ताइवान, थाईलैंड और ब्राजील जैसे अन्य उभरते बाजारों में भी इस महीने सकारात्मक निवेश देखा गया है। जानकार इसे वैश्विक जोखिम लेने की क्षमता में सुधार बता रहे हैं, खासकर डॉलर के प्रभाव में कमी के व्यापक माहौल के बीच उभरते बाजारों को लेकर उनका नजरिया बदल रहा है।

इलारा कैपिटल की हालिया रिपोर्ट के अनुसार वैश्विक उभरते बाजारों के इक्विटी फंड 2016-18 के चक्र के बाद से अपने सबसे मजबूत निवेश के दौर में से एक का अनुभव कर रहे हैं। भारत, उभरते बाजारों का एक प्रमुख घटक है जो वैश्विक उभरते बाजारों के फंडों में निवेश से लाभान्वित हो सकता है। इसके अतिरिक्त, हालिया गिरावट के बाद बाजार के कुछ चुनिंदा शेयरों अपेक्षाकृत आकर्षक मूल्यांकन ने निवेश को बढ़ावा दिया है।

ऐतिहासिक रूप से, विदेशी निवेशकों के मजबूत निवेश से प्रमुख सूचकांकों को समर्थन मिला है, हालांकि निरंतर तेजी के लिए आमतौर पर विदेशी और घरेलू निवेशकों के बीच तालमेल आवश्यक होता है। सकारात्मक विदेशी निवेश के बावजूद भारतीय शेयर बाजार इस महीने वैश्विक बाजारों से पीछे रहे हैं और निफ्टी में केवल 0.7 फीसदी की वृद्धि हुई है। इसकी तुलना में दक्षिण कोरिया में 20 फीसदी से अधिक की तेजी आई है जबकि थाईलैंड और जापान में करीब 10 फीसदी की वृद्धि दर्ज की गई है।

नोमूरा ने एक नोट में कहा, भारतीय बाजार का प्रदर्शन वैश्विक बाजारों के मुकाबले लगातार खराब रहा है। साल की शुरुआत से निफ्टी में अमेरिकी डॉलर के हिसाब से अब तक 3 फीसदी की गिरावट आई है। यह गिरावट मुख्य रूप से आईटी सेवाओं के कारण हुई है, जिनमें लगभग 15 फीसदी की गिरावट दर्ज की गई है।

इसमें कहा गया है कि आईटी सेवा कंपनियों पर एआई के कारण पड़ने वाले अपस्फीति के दबाव को लेकर चिंता समय से पहले और जरूरत से ज्यादा लगती हैं और उम्मीद है कि कंपनियां नए कारोबारी अवसरों का लाभ उठाने के लिए अपनी रणनीति में बदलाव करेंगी और इस क्षेत्र के प्रति सकारात्मक दृष्टिकोण बनाए रखेंगी।

आगे चलकर बाजार की दिशा विदेशी निवेश की स्थिरता और इस बात पर निर्भर करेगी कि मूल्यांकन में स्थिरता और आय की स्पष्टता में सुधार होने के बाद घरेलू निवेशक शुद्ध खरीदार के रूप में वापस आते हैं या नहीं।

First Published : February 26, 2026 | 10:49 PM IST