भारत में अक्षय ऊर्जा को बढ़ावा दिए जाने की वजह से सौर उद्योग तेजी से बढ़ रहा है और आगामी बड़े लक्ष्यों का मतलब है कि मौजूदा पूंजीगत खर्च से और ज्यादा क्षमता विकसित होगी। आपूर्ति श्रृंखला में कुछ हद तक आपूर्ति-मांग में अंतर और अत्यधिक क्षमता का जोखिम है।
मॉड्यूल क्षमता घरेलू इंस्टॉलेशन की जरूरतों से कहीं ज्यादा है। एमएनआरई डेटा के मुताबिक चालू मॉड्यूल क्षमता 144 गीगावॉट (जीडब्ल्यू) है और वित्त वर्ष 2030 तक इसके 180 गीगावॉट तक पहुंचने का अनुमान है, जबकि सेल 23.4 गीगावॉट पर है। सालाना सोलर इंस्टॉलेशन 45-50 गीगावॉट तक पहुंच सकते हैं, जबकि मॉड्यूल उत्पादन 60-65 गीगावॉट है और इसके अलावा सेल को आयात करने की भी जरूरत है। (मॉड्यूल के लिए) सीधा समाधान निर्यात है, लेकिन अमेरिकी टैरिफ से शायद एक जरूरी बाजार रुक सकता है।
सालाना अमेरिकी मॉड्यूल खपत 50 गीगावॉट थी और मौजूदा आंकड़े से पता चलता है कि अगले कुछ वर्षों में 70-80 गीगावॉट सालाना मॉड्यूल की जरूरत होगी। अमेरिका में मॉड्यूल बनाने की क्षमता 50-55 गीगावॉट है और उसके पास सेल और वेफर बनाने की क्षमता पर्याप्त नहीं है।
24 फरवरी को अमेरिकी वाणिज्य विभाग ने भारत से सौर आयात पर 126 प्रतिशत की शुरुआती काउंटरवेलिंग ड्यूटी (सीवीडी) की घोषणा की और इंडोनेशिया से आयात पर 86-143 प्रतिशत और लाओस से शिपमेंट पर 81 प्रतिशत प्रतिशत की शुरुआती सीवीडी तय की। सीवीडी इस बात पर निर्भर करता है कि अमेरिका को आपूर्ति किए गए मॉड्यूल में इस्तेमाल होने वाले सोलर सेल किस देश से हैं। असल में, 126 प्रतिशत टैरिफ तभी लागू होता है जब अमेरिका को आपूर्ति किए जाने वाले सोलर मॉड्यूल में भारत निर्मित सोलर सेल का इस्तेमाल हुआ हो। दरों का आखिरी फैसला जुलाई 2026 में होना है।
यह तय है कि सीवीडी से निर्यात-केंद्रित निर्माताओं पर नकारात्मक असर पड़ेगा। भारत ने अमेरिका को अप्रैल 2023 से नवंबर 2025 के बीच 34,000 करोड़ रुपये मूल्य के सेल और मॉड्यूल का निर्यात किया। भारत के सोलर सेल और मॉड्यूल निर्यात में अमेरिका की हिस्सेदारी 95 फीसदी से ज्यादा है और सीवीडी की वजह से भारत से आयात होने वाले मॉड्यूल, प्रतिस्पर्धी उत्पादों के मुकाबले कम से कम 30 प्रतिशत अधिक महंगे हैं।