भारत पैक्स सिलिका में शामिल हो गया है। यह अमेरिकी नेतृत्व वाला प्रौद्योगिकी और आपूर्ति श्रृंखला का गठबंधन है। भारत औपचारिक रूप से दिसंबर 2025 में बने इस समूह का हिस्सा बन गया है जो सेमीकंडक्टर, आर्टिफिशल इंटेलिजेंस अधोसंरचना और अहम खनिजों की आपूर्ति श्रृंखला सुरक्षित करने और चीन पर निर्भरता कम करने के लिए बना है। खासतौर पर दुर्लभ खनिजों के प्रसंस्करण और सेमीकंडक्टर विनिर्माण के क्षेत्र में निर्भरता को कम करने के लिए।
पैक्स सिलिका का उद्देश्य खनिजों के उत्खनन और प्रसंस्करण से लेकर चिप निर्माण, डेटा अधोसंरचना और उन्नत कंप्यूटिंग तक निवेशों का समन्वय करना है। इसके सदस्य देशों में अमेरिका, जापान, दक्षिण कोरिया, ब्रिटेन, सिंगापुर, इजरायल, नीदरलैंड, ऑस्ट्रेलिया, संयुक्त अरब अमीरात, कतर और ग्रीस शामिल हैं, जबकि कनाडा, यूरोपीय संघ और ताइवान पर्यवेक्षक के रूप में हिस्सा ले रहे हैं।
भारत के लिए रणनीतिक वजह एकदम स्पष्ट है। वैश्विक स्तर पर दुर्लभ खनिजों के प्रसंस्करण की करीब 90 फीसदी क्षमता चीन में है। भारत अपने दुर्लभ खनिज मैग्नेट और संबंधित सामग्री जरूरत का करीब 80 से 90 फीसदी हिस्सा चीन के आपूर्तिकर्ताओं से आयात करता है। हाल में चीन में निर्यात नियंत्रण और लाइसेंसिंग से उपजे हालात ने भारत के वाहन और इलेक्ट्रॉनिक्स उत्पादन को प्रभावित किया है।
इससे यह स्पष्ट होता है कि किसी एक देश पर निर्भर होने के क्या खतरे हो सकते हैं। पैक्स सिलिका में हिस्सेदारी के बाद स्रोतों को विविध बनाने, प्रसंस्करण के क्षेत्र में भागीदारी और समन्वित भंडारण की संभावनाएं बनी हैं। यह कदम भारत के घरेलू औद्योगिक गतिविधियों को बल देने के साथ भी सुसंगत है। सरकार ने 1.6 लाख करोड़ रुपये मूल्य की सेमीकंडक्टर परियोजनाओं को मंजूरी दी है जिसमें करीब 76,000 करोड़ रुपये का प्रोत्साहन शामिल है।
फैब्रिकेशन यूनिट, कंपाउंड सेमीकंडक्टर संयंत्र और डिजाइन पहलों पर काम चल रहा है, जिनमें माइक्रोन जैसी वैश्विक कंपनियां और टाटा समूह जैसे घरेलू खिलाड़ी निवेश कर रहे हैं। 2026-27 के केंद्रीय बजट में सरकार ने ओडिशा, केरल, आंध्र प्रदेश और तमिलनाडु में ‘रेयर अर्थ कॉरिडोर’ बनाने की घोषणा की है, साथ ही 7,280 करोड़ रुपये की ‘रेयर अर्थ परमानेंट मैग्नेट योजना’ भी शुरू की है, जिसका लक्ष्य प्रति वर्ष 6,000 मीट्रिक टन की एकीकृत मैग्नेट क्षमता का निर्माण करना है।
ये कदम मौजूदा क्षमताओं पर आधारित हैं और खनन, प्रसंस्करण, अनुसंधान और विनिर्माण को एकीकृत करने का प्रयास करते हैं। पैक्स सिलिका केवल खनिजों और चिप तक सीमित नहीं है। इसमें एआई अधोसंरचना, डेटा सेंटर, फाइबर नेटवर्क और फाउंडेशनल मॉडल भी शामिल हैं। भारत की विशाल डिजिटल सार्वजनिक अधोसंरचना, तेजी से बढ़ता एआई बाजार और पर्याप्त इंजीनियरिंग प्रतिभा इस ढांचे के भीतर उसकी मूल्य संभावना को और मजबूत करते हैं।
फिर भी इस समूह में शामिल होना कुछ समझौतों के लिए भी मजबूर करता है। जैसे-जैसे आपूर्ति श्रृंखलाएं चीनी नेतृत्व वाले और पैक्स सिलिका के नेतृत्व वाले तंत्रों के बीच बंटती हैं, निर्यात नियंत्रण, प्रौद्योगिकी मानक और निवेश सुरक्षा प्रथाओं पर अपेक्षाएं और अधिक कठोर हो सकती हैं। एक निर्भरता को दूसरी निर्भरता से बदलने का भी जोखिम है। उन्नत लिथोग्राफी उपकरण, उच्च-स्तरीय एआई चिप और कंप्यूटिंग हार्डवेयर अब भी अमेरिका-समर्थित पारिस्थितिक तंत्रों में केंद्रित हैं।
अमेरिका ने रिकॉर्ड संख्या में वैश्विक समझौतों से पीछे हटते हुए, भारत के नेतृत्व वाले अंतरराष्ट्रीय सौर गठबंधन सहित, अमेरिका की बहुपक्षीय प्रतिबद्धताओं के स्थायित्व पर सवाल खड़े किए हैं। पैक्स सिलिका को भी उसी दृष्टि से देखा जाना चाहिए। हालांकि यह एआई और महत्त्वपूर्ण खनिजों में सहयोग के अवसर प्रदान करता है।
आखिरकार, यह अमेरिकी आर्थिक-सुरक्षा उद्देश्यों को आगे बढ़ाने के लिए डिजाइन की गई एक अमेरिकी-नेतृत्व वाली पहल है। इसलिए भारत की भागीदारी को दीर्घकालिक विश्वसनीयता, नीतिगत लचीलेपन और रणनीतिक स्वायत्तता के यथार्थवादी आकलन द्वारा निर्देशित होना चाहिए। पैक्स सिलिका की सदस्यता पूंजी, प्रौद्योगिकी और बाजारों तक पहुंच प्रदान कर सकती है। यह टिकाऊ आर्थिक सुरक्षा में परिवर्तित होगा या नहीं, यह अधोसंरचना की तैयारी, नियामक स्पष्टता, पर्यावरणीय सुरक्षा उपायों और अनुसंधान व विनिर्माण में सतत निवेश पर निर्भर करेगा।