चीन के राष्ट्रपति शी जिनपिंग | फोटो: Commons
दुनिया की बड़ी प्राइवेट इक्विटी (PE) कंपनियां इस समय चीन में एक बड़ी दिक्कत का सामना कर रही हैं। वहां निवेश करना तो इनके लिए पहले आसान था, लेकिन अब उसी निवेश से बाहर निकलना मुश्किल होता जा रहा है।
फाइनेंशियल टाइम्स की रिपोर्ट के अनुसार, केकेआर (KKR), ब्लैकस्टोन, CVC कैपिटल पार्टनर्स, वारबर्ग पिंकस और द कार्लाइल ग्रुप जैसी कंपनियों ने 2025 में चीन में अपने निवेश से पूरी तरह बाहर निकलने का एक भी सार्वजनिक सौदा नहीं किया। इसका असर यह हुआ है कि अरबों डॉलर का पैसा चीन में ही अटका हुआ है और पूरे एशिया में पूंजी का फ्लो धीमा पड़ गया है।
प्राइवेट इक्विटी कंपनियां आम तौर पर किसी कंपनी को खरीदती हैं, उसे बेहतर बनाती हैं और फिर ज्यादा कीमत पर बेचकर मुनाफा कमाती हैं। बाहर निकलने के दो ही रास्ते होते हैं कि या तो कंपनी किसी और को बेच दी जाए या फिर उसे शेयर बाजार में IPO के जरिए लिस्ट कर दिया जाए। लेकिन चीन में फिलहाल ये दोनों रास्ते मुश्किल हो गए हैं।
इसकी कई वजहें हैं। चीन की धीमी पड़ती अर्थव्यवस्था के कारण कंपनियों की वैल्यूएशन यानी कीमतें गिर गई हैं। इसके अलावा अमेरिका और दूसरे पश्चिमी देशों के साथ बढ़ते भू-राजनीतिक तनाव और सख्त नियमों ने विदेशी निवेशकों को सतर्क कर दिया है। ऐसे में कई निवेशक चीन में अपना जोखिम घटा रहे हैं, जिससे खरीदारों की कमी महसूस हो रही है।
FT की रिपोर्ट के मुताबिक, यह दिक्कत सिर्फ चीन की नहीं है, बल्कि पूरी दुनिया में ऐसा ही रुझान देखने को मिल रहा है। ब्याज दरें ऊंची हैं और कंपनियों की वैल्यूएशन भी पहले जितनी नहीं मिल रही, इसलिए प्राइवेट इक्विटी फर्म्स अपने एसेट्स बेचने की बजाय उन्हें ज्यादा समय तक संभालकर रख रही हैं। पिचबुक और डीलॉजिक के आंकड़ों के मुताबिक, 2025 तक दुनियाभर में प्राइवेट इक्विटी कंपनियों के पास करीब 3.8 ट्रिलियन डॉलर के निवेश ऐसे हैं जो अभी तक बिक नहीं पाए हैं।
जब कंपनियां अपने निवेश से बाहर नहीं निकल पातीं, तो वे पेंशन फंड्स, सॉवरेन वेल्थ फंड्स और फैमिली ऑफिसेज जैसे निवेशकों को उनका पैसा समय पर वापस नहीं दे पातीं। इससे वैश्विक स्तर पर नकदी की कमी यानी लिक्विडिटी क्रंच की स्थिति बन गई है।
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जब सामान्य तरीके काम नहीं करते, तो निवेशक ‘सेकेंडरी मार्केट’ का सहारा लेते हैं। यहां वे अपने फंड की हिस्सेदारी किसी दूसरे निवेशक को बेच देते हैं। लेकिन चीन से जुड़े सौदों में यह विकल्प भी महंगा पड़ रहा है।
FT की रिपोर्ट के मुताबिक, एशिया में प्राइवेट इक्विटी फंड्स की हिस्सेदारी औसतन 44% तक के डिस्काउंट पर बिक रही है। चीन-केंद्रित फंड्स में तो यह छूट 40 से 50% तक पहुंच गई है।
अपना पैसा निकालने की कोशिश में निवेशकों ने 2024 में सेकेंडरी मार्केट के जरिए करीब 162 अरब डॉलर के सौदे किए। IPO और सीधे बिक्री के सीमित विकल्पों के बीच यही उनके लिए नकदी जुटाने का मुख्य जरिया बन गया है।
हांगकांग के शेयर बाजार में थोड़ी रौनक जरूर लौटी है। 2025 में वहां करीब 35 अरब डॉलर के IPO आए, जिससे कुछ प्राइवेट इक्विटी फर्म्स को अपने छोटे निवेश, खासकर वेंचर-स्टाइल हिस्सेदारी, से बाहर निकलने का मौका मिला। हालांकि, बड़े बायआउट सौदों के लिए हालात अभी भी आसान नहीं हैं।
इस साल जनवरी में कुछ सकारात्मक संकेत तब मिले, जब बेन कैपिटल ने अपने डेटा सेंटर ऑपरेटर चीनडेटा को करीब 4 अरब डॉलर में बेच दिया। इस डील में खरीदार ज्यादातर चीनी औद्योगिक कंपनियां और सरकार से जुड़े निवेशक थे। यह करीब दो साल में किसी वैश्विक फर्म का चीन में पहला बड़ा एग्जिट था। फिर भी, ध्यान देने वाली बात यह है कि इस सौदे में विदेशी निवेशक शामिल नहीं थे, जो चीन में कम होती क्रॉस-बॉर्डर डील्स को दिखाता है।
चीन में फंसे निवेश और एग्जिट की दिक्कतों ने प्राइवेट इक्विटी फर्म्स को अपनी रणनीति बदलने के लिए मजबूर कर दिया है। अब वे अपना पैसा भारत और जापान जैसे दूसरे एशियाई बाजारों में लगा रही हैं।
इन देशों में तेज आर्थिक विकास, गवर्नेंस में सुधार और मजबूत पूंजी बाजारों की वजह से निवेशकों को वहां से बाहर निकलना अपेक्षाकृत आसान दिख रहा है।
हालांकि, एशिया को लेकर निवेशकों का लंबी अवधि का भरोसा कायम है, लेकिन चीन की मौजूदा परिस्थितियों ने निवेश को वास्तविक मुनाफे में बदलना पहले से ज्यादा चुनौतीपूर्ण बना दिया है।