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IDFC Bank Fraud Case: निजी क्षेत्र के आईडीएफसी फर्स्ट बैंक ने 22 फरवरी 2026 को एक बड़ी वित्तीय अनियमितता का खुलासा किया है। बैंक के अनुसार, चंडीगढ़ स्थित उसकी एक शाखा में लगभग 590 करोड़ रुपये की संदिग्ध धोखाधड़ी सामने आई है। यह मामला हरियाणा सरकार से जुड़े कुछ खातों के समूह से संबंधित बताया जा रहा है।
बैंक ने शेयर बाजारों को दी गई अपनी नियामकीय सूचना में बताया कि शुरुआती जांच में कुछ शाखा कर्मचारियों द्वारा अनधिकृत और धोखाधड़ीपूर्ण गतिविधियों की आशंका सामने आई है। बैंक का कहना है कि इन कर्मचारियों ने बाहरी व्यक्तियों या संस्थाओं के साथ मिलकर गड़बड़ी को अंजाम दिया हो सकता है। फिलहाल जांच जारी है और पूरे मामले की गहराई से पड़ताल की जा रही है।
यह अनियमितता उस समय उजागर हुई जब हरियाणा सरकार के एक विभाग ने अपना खाता बंद कर शेष राशि किसी अन्य बैंक में स्थानांतरित करने का अनुरोध किया। जब बैंक ने प्रक्रिया शुरू की तो विभाग द्वारा बताए गए बैलेंस और बैंक के रिकॉर्ड में दर्ज राशि के बीच अंतर पाया गया। इसी विसंगति ने पूरे मामले को उजागर किया।
इसके बाद अन्य सरकारी विभागों ने भी अपने खातों का मिलान करना शुरू किया। जांच के दौरान पाया गया कि उसी शाखा में मौजूद कुछ अन्य सरकारी खातों में भी इसी तरह की गड़बड़ियां हैं। इससे स्पष्ट हुआ कि मामला एकल खाते तक सीमित नहीं है, बल्कि खातों के एक विशेष समूह से जुड़ा है।
बैंक ने स्पष्ट किया है कि यह मामला फिलहाल चंडीगढ़ शाखा में मौजूद हरियाणा सरकार से जुड़े कुछ विशेष खातों तक सीमित प्रतीत होता है। बैंक ने यह भी कहा है कि शाखा के सभी ग्राहकों के खाते इस अनियमितता से प्रभावित नहीं हैं। हालांकि, अंतिम निष्कर्ष तक पहुंचने के लिए विस्तृत आंतरिक जांच और ऑडिट की प्रक्रिया जारी है।
बैंक की ओर से जारी आधिकारिक जानकारी के अनुसार, आंतरिक जांच के दौरान कुछ संदिग्ध लेनदेन सामने आए, जिनमें सरकारी खातों से जुड़ी धनराशि शामिल बताई जा रही है।
बैंक ने प्रारंभिक जांच में संलिप्तता के शक के आधार पर अपनी एक शाखा के चार कर्मचारियों को निलंबित कर दिया है। यह कदम जांच प्रक्रिया को निष्पक्ष और पारदर्शी बनाए रखने के उद्देश्य से उठाया गया है। बैंक का कहना है कि जांच पूरी होने तक इन कर्मचारियों को कार्य से दूर रखा जाएगा।
मामले की गंभीरता को देखते हुए बैंक ने पुलिस में शिकायत दर्ज कराई है और संबंधित कानून प्रवर्तन एजेंसियों को सूचित किया है। साथ ही, पूरे घटनाक्रम की जानकारी नियामक संस्थाओं और वैधानिक लेखा परीक्षकों को भी दे दी गई है ताकि प्रक्रिया नियमों के अनुरूप आगे बढ़ सके।
लेनदेन की गहराई से जांच के लिए बैंक ने एक स्वतंत्र बाहरी एजेंसी को फोरेंसिक ऑडिट का जिम्मा सौंपा है। इस एजेंसी का काम संदिग्ध खातों, ट्रांजैक्शन पैटर्न और आंतरिक नियंत्रण प्रणाली की विस्तृत जांच करना होगा। जांच रिपोर्ट के आधार पर आगे की कार्रवाई तय की जाएगी।
बैंक ने उन खातों की पहचान करने की कोशिश शुरू कर दी है जिनसे कथित तौर पर धनराशि स्थानांतरित हुई। इसके तहत अन्य बैंकों को रिकॉल अनुरोध भेजे गए हैं ताकि संदिग्ध खातों में मौजूद राशि पर रोक लगाई जा सके और उसे सुरक्षित रखा जा सके।
जानकारी के अनुसार, जिन खातों में अनियमितता पाई गई वे हरियाणा सरकार के विभिन्न विभागों से संबंधित थे। ये सार्वजनिक धन चंडीगढ़ स्थित शाखा में सरकारी उपयोग के लिए जमा थे। गड़बड़ी का पता तब चला जब संबंधित विभागों ने बैंक से अपनी राशि अन्यत्र स्थानांतरित करने की प्रक्रिया शुरू की।
घटना के सामने आने के बाद हरियाणा सरकार ने सख्त रुख अपनाया है। राज्य के वित्त विभाग ने निर्देश जारी कर सभी विभागों को IDFC फर्स्ट बैंक और AU स्मॉल फाइनेंस बैंक के साथ सरकारी लेनदेन तुरंत प्रभाव से रोकने को कहा है। आदेश में स्पष्ट किया गया है कि अगली सूचना तक इन बैंकों में कोई भी सरकारी धन जमा, निवेश या ट्रांजैक्ट नहीं किया जाएगा। साथ ही, विभागों को अपने मौजूदा शेष धन को अन्य बैंकों में स्थानांतरित करने के निर्देश भी दिए गए हैं।
खबर सामने आते ही बैंक के शेयरों में तेज बिकवाली शुरू हो गई और दिन के कारोबार के दौरान स्टॉक करीब 20 प्रतिशत तक टूटकर 66.8 रुपये प्रति शेयर के स्तर पर पहुंच गया। यह जून 2025 के बाद का सबसे निचला स्तर माना जा रहा है।
इसके विपरीत, व्यापक बाजार में सकारात्मक रुझान देखने को मिला। प्रमुख सूचकांक Nifty 50 सुबह 9 बजकर 48 मिनट पर लगभग 0.65 प्रतिशत की बढ़त के साथ कारोबार कर रहा था। इस साल अब तक बैंक का शेयर करीब 22 प्रतिशत गिर चुका है, जबकि इसी अवधि में निफ्टी 50 में लगभग 1.6 प्रतिशत की गिरावट दर्ज की गई है।
शेयर में आई तेज गिरावट का असर बैंक के बाजार पूंजीकरण पर भी पड़ा। कंपनी का कुल मार्केट कैप घटकर करीब 57,485.6 करोड़ रुपये रह गया। निवेशकों के बीच अनिश्चितता और जांच प्रक्रिया को लेकर बनी चिंता ने स्टॉक पर दबाव बनाए रखा।
बाजार विशेषज्ञों का मानना है कि इस मामले का वास्तविक वित्तीय प्रभाव अभी स्पष्ट नहीं है। यह काफी हद तक फॉरेंसिक ऑडिट, संभावित कानूनी कार्रवाई और रिकवरी प्रक्रिया के नतीजों पर निर्भर करेगा। विशेष रूप से यह देखना महत्वपूर्ण होगा कि संदिग्ध 590 करोड़ रुपये में से कितनी राशि का पता लगाया जा सकता है और कितनी रकम की वसूली संभव हो पाती है।
विश्लेषकों के अनुसार, यदि जांच में सीमित दायरे की गड़बड़ी सामने आती है और बैंक प्रभावी रिकवरी कर लेता है, तो निवेशकों का भरोसा धीरे-धीरे लौट सकता है। हालांकि, यदि मामला व्यापक स्तर पर फैला हुआ पाया जाता है, तो इसका असर लंबी अवधि तक रह सकता है।
बैंक के प्रबंध निदेशक और मुख्य कार्यकारी अधिकारी वी. वैद्यनाथन ने इस मामले को एक अलग और सीमित घटना बताया है। उन्होंने कहा कि यह मामला बैंक की एक शाखा और एक ग्राहक समूह से जुड़ा हुआ है। उनके अनुसार, ग्राहकों से कथित रूप से डेबिट निर्देश प्राप्त हुए थे, जिनके आधार पर बैंक कर्मियों ने एंट्री प्रोसेस की और संबंधित राशि ग्राहक के खाते से बाहर अन्य पक्षों को ट्रांसफर कर दी।
बैंक प्रबंधन का कहना है कि प्रथम दृष्टया यह मामला धोखाधड़ी का प्रतीत होता है और आंतरिक स्तर पर इसकी गहन जांच की जा रही है। साथ ही, बैंक ने यह भी संकेत दिया है कि नियामकीय प्रक्रियाओं का पालन करते हुए आवश्यक कदम उठाए जाएंगे।
आईडीएफसी फर्स्ट बैंक से जुड़ा कथित ₹590 करोड़ का घोटाला बैंकिंग प्रणाली, सार्वजनिक धन की सुरक्षा और कॉर्पोरेट गवर्नेंस पर कई गंभीर सवाल खड़े करता है। प्रारंभिक जांच में सामने आए तथ्यों ने यह स्पष्ट किया है कि वित्तीय संस्थानों में आंतरिक निगरानी तंत्र कितना महत्वपूर्ण होता है और उसमें छोटी सी चूक भी बड़े नुकसान का कारण बन सकती है।
बैंकिंग क्षेत्र सख्त नियमों और नियामकीय निगरानी के तहत काम करता है। इसके बावजूद यदि किसी स्तर पर निगरानी में कमी रह जाए या कर्मचारियों के बीच मिलीभगत हो जाए तो बड़ी वित्तीय गड़बड़ी संभव हो सकती है। इस मामले ने दिखाया है कि केवल नियम होना पर्याप्त नहीं है, बल्कि उनका प्रभावी क्रियान्वयन और नियमित ऑडिट भी उतना ही आवश्यक है। समय पर खातों का मिलान, लेनदेन की पारदर्शिता और जवाबदेही तय करना ऐसे मामलों को रोकने में अहम भूमिका निभाते हैं।
रिपोर्टों के अनुसार मामला सरकारी खातों से जुड़े लेनदेन से संबंधित है। ऐसे खातों में किसी भी तरह की विसंगति सीधे तौर पर सार्वजनिक धन को प्रभावित करती है। इसलिए सरकारी फंड के संचालन में दोहरी जांच, स्वतंत्र ऑडिट और नियमित समन्वय बेहद जरूरी है। सार्वजनिक संसाधनों की सुरक्षा केवल बैंक की जिम्मेदारी नहीं, बल्कि व्यापक वित्तीय व्यवस्था की विश्वसनीयता से भी जुड़ी होती है।
बैंकिंग कंपनियों में निवेश करने वाले शेयरधारक और निवेशक प्रबंधन की पारदर्शिता और जोखिम प्रबंधन क्षमता को बेहद गंभीरता से देखते हैं। जब भी किसी बैंक में संचालन संबंधी जोखिम या अनियमितता सामने आती है, तो इसका असर निवेशकों के भरोसे पर पड़ता है। ऐसी घटनाएं शेयर बाजार में उतार चढ़ाव का कारण बन सकती हैं और संस्थान की साख को भी प्रभावित कर सकती हैं।
फिलहाल सामने आया ₹590 करोड़ का आंकड़ा प्रारंभिक मिलान और जांच पर आधारित बताया जा रहा है। विस्तृत फोरेंसिक ऑडिट और कानूनी प्रक्रिया के बाद ही वास्तविक राशि, जिम्मेदार पक्ष और संभावित दायित्वों की स्पष्ट तस्वीर सामने आएगी। जांच एजेंसियां लेनदेन के स्रोत, प्रक्रिया और संबंधित अधिकारियों की भूमिका की गहराई से पड़ताल कर रही हैं।
यह मामला एक बार फिर याद दिलाता है कि वित्तीय संस्थानों में पारदर्शिता, जवाबदेही और मजबूत निगरानी तंत्र ही सार्वजनिक विश्वास की असली नींव हैं। बैंक ग्राहकों और निवेशकों दोनों के लिए यह आवश्यक है कि वे संस्थान की गवर्नेंस संरचना और जोखिम प्रबंधन नीतियों को समझें, क्योंकि अंततः वित्तीय स्थिरता सभी हितधारकों के हित में है।
शुरुआती जानकारी के अनुसार यह कोई साइबर हैकिंग या बाजार में हुए नुकसान का मामला नहीं है, बल्कि आंतरिक स्तर पर हुई गड़बड़ी से जुड़ा प्रतीत होता है। आशंका है कि कुछ कर्मचारियों की मिलीभगत या अंदरूनी लापरवाही के कारण सरकारी खातों में जमा धनराशि के रिकॉर्ड और वास्तविक रकम के बीच बड़ा अंतर पैदा हुआ।
बैंक प्रबंधन ने इस घटना को गंभीरता से लिया है और इसे एक आंतरिक सुरक्षा उल्लंघन के रूप में देखा जा रहा है। मामले की सूचना नियामकीय संस्थाओं को दी जा चुकी है। संबंधित अधिकारियों के पास शिकायत दर्ज कराई गई है और स्वतंत्र ऑडिट एजेंसियों को भी जांच की जिम्मेदारी सौंपी गई है, ताकि पूरे प्रकरण की निष्पक्ष जांच हो सके और जिम्मेदार व्यक्तियों की पहचान की जा सके।
अब तक उपलब्ध आधिकारिक जानकारी के आधार पर यह मामला केवल कुछ सरकारी खातों तक सीमित बताया जा रहा है, जो चंडीगढ़ की एक विशेष शाखा से जुड़े हैं। बैंक की ओर से ऐसा कोई संकेत नहीं मिला है कि देशभर में मौजूद बचत खाते, फिक्स्ड डिपॉजिट या आम ग्राहकों के खाते सीधे तौर पर प्रभावित हुए हों।
भारत में सभी बैंक भारतीय रिजर्व बैंक की निगरानी में काम करते हैं। साथ ही, डिपॉजिट इंश्योरेंस एंड क्रेडिट गारंटी कॉरपोरेशन योजना के तहत प्रत्येक जमाकर्ता को प्रति बैंक पांच लाख रुपये तक की जमा राशि पर बीमा सुरक्षा मिलती है। इस कारण छोटे और मध्यम स्तर के जमाकर्ताओं के लिए एक अतिरिक्त सुरक्षा कवच उपलब्ध रहता है।
फिलहाल किसी भी नियामकीय संस्था या बैंक की ओर से यह सलाह जारी नहीं की गई है कि आम ग्राहक अपने पैसे निकाल लें या किसी तरह की घबराहट दिखाएं।
यदि आप आईडीएफसी फर्स्ट बैंक के ग्राहक हैं तो घबराने की जरूरत नहीं है, लेकिन सतर्क रहना हमेशा समझदारी होती है। बैंक की आधिकारिक वेबसाइट, प्रेस विज्ञप्ति या विश्वसनीय समाचार स्रोतों से ही जानकारी लें। सोशल मीडिया पर चल रही अपुष्ट खबरों या अफवाहों पर भरोसा करने से बचें।
सामान्य वित्तीय सुरक्षा के लिहाज से अपनी जमा राशि अलग अलग बैंकों में रखना एक अच्छी रणनीति मानी जाती है। यदि आप जोखिम से बचने वाले निवेशक हैं तो यह भी सुनिश्चित करें कि किसी एक बैंक में आपकी कुल जमा राशि बीमा सीमा के भीतर रहे।
इस समय बैंकिंग सेवाओं या निकासी पर किसी प्रकार का प्रतिबंध नहीं लगाया गया है। बैंकिंग प्रणाली सामान्य रूप से काम कर रही है।
शुरुआती जानकारी के अनुसार यह कोई साइबर हैकिंग या बाजार में हुए नुकसान का मामला नहीं है, बल्कि आंतरिक स्तर पर हुई गड़बड़ी से जुड़ा प्रतीत होता है। आशंका है कि कुछ कर्मचारियों की मिलीभगत या अंदरूनी लापरवाही के कारण सरकारी खातों में जमा धनराशि के रिकॉर्ड और वास्तविक रकम के बीच बड़ा अंतर पैदा हुआ।
बैंक प्रबंधन ने इस घटना को गंभीरता से लिया है और इसे एक आंतरिक सुरक्षा उल्लंघन के रूप में देखा जा रहा है। मामले की सूचना नियामकीय संस्थाओं को दी जा चुकी है। संबंधित अधिकारियों के पास शिकायत दर्ज कराई गई है और स्वतंत्र ऑडिट एजेंसियों को भी जांच की जिम्मेदारी सौंपी गई है, ताकि पूरे प्रकरण की निष्पक्ष जांच हो सके और जिम्मेदार व्यक्तियों की पहचान की जा सके।
अब तक उपलब्ध आधिकारिक जानकारी के आधार पर यह मामला केवल कुछ सरकारी खातों तक सीमित बताया जा रहा है, जो चंडीगढ़ की एक विशेष शाखा से जुड़े हैं। बैंक की ओर से ऐसा कोई संकेत नहीं मिला है कि देशभर में मौजूद बचत खाते, फिक्स्ड डिपॉजिट या आम ग्राहकों के खाते सीधे तौर पर प्रभावित हुए हों।
भारत में सभी बैंक भारतीय रिजर्व बैंक की निगरानी में काम करते हैं। साथ ही, डिपॉजिट इंश्योरेंस एंड क्रेडिट गारंटी कॉरपोरेशन योजना के तहत प्रत्येक जमाकर्ता को प्रति बैंक पांच लाख रुपये तक की जमा राशि पर बीमा सुरक्षा मिलती है। इस कारण छोटे और मध्यम स्तर के जमाकर्ताओं के लिए एक अतिरिक्त सुरक्षा कवच उपलब्ध रहता है।
फिलहाल किसी भी नियामकीय संस्था या बैंक की ओर से यह सलाह जारी नहीं की गई है कि आम ग्राहक अपने पैसे निकाल लें या किसी तरह की घबराहट दिखाएं।
यदि आप आईडीएफसी फर्स्ट बैंक के ग्राहक हैं तो घबराने की जरूरत नहीं है, लेकिन सतर्क रहना हमेशा समझदारी होती है। बैंक की आधिकारिक वेबसाइट, प्रेस विज्ञप्ति या विश्वसनीय समाचार स्रोतों से ही जानकारी लें। सोशल मीडिया पर चल रही अपुष्ट खबरों या अफवाहों पर भरोसा करने से बचें।
सामान्य वित्तीय सुरक्षा के लिहाज से अपनी जमा राशि अलग अलग बैंकों में रखना एक अच्छी रणनीति मानी जाती है। यदि आप जोखिम से बचने वाले निवेशक हैं तो यह भी सुनिश्चित करें कि किसी एक बैंक में आपकी कुल जमा राशि बीमा सीमा के भीतर रहे।
इस समय बैंकिंग सेवाओं या निकासी पर किसी प्रकार का प्रतिबंध नहीं लगाया गया है। बैंकिंग प्रणाली सामान्य रूप से काम कर रही है।