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Income Tax: देश में उच्च आय वर्ग के कॉरपोरेट अधिकारियों पर आयकर विभाग ने निगरानी तेज कर दी है। मीडिया रिपोर्ट्स के अनुसार, सालाना ₹50 लाख से अधिक आय अर्जित करने वाले कई वरिष्ठ अधिकारियों के आयकर रिटर्न में कथित अनियमितताएं पाई गई हैं। विभाग ने ऐसे मामलों में नोटिस जारी कर संबंधित व्यक्तियों को संशोधित आयकर रिटर्न दाखिल करने का अवसर दिया है। यदि निर्धारित समय में सुधार नहीं किया गया तो सख्त कार्रवाई और जुर्माना लगाया जा सकता है।
प्राथमिक जांच में सामने आया है कि कुछ अधिकारियों ने विदेशी आय और विदेशी संपत्तियों का सही खुलासा नहीं किया। इसके अलावा, शेयर आधारित प्रोत्साहन जैसे ईएसओपी या अन्य स्टॉक लिंक्ड लाभों की आय को कम दिखाने और विभिन्न परिकर सुविधाओं के दावों को बढ़ा-चढ़ाकर प्रस्तुत करने के मामले भी सामने आए हैं।
आयकर विभाग का मानना है कि उच्च आय वर्ग के करदाताओं को अपनी वैश्विक आय और संपत्ति का पूर्ण विवरण देना अनिवार्य है। किसी भी प्रकार की जानकारी छिपाना कानूनन उल्लंघन की श्रेणी में आता है।
भारत में रहने वाले ऐसे व्यक्ति जिन्हें आयकर कानून के तहत रेजिडेंट और ऑर्डिनरी रेजिडेंट की श्रेणी में रखा गया है, उन्हें अपने आयकर रिटर्न में अनुसूची एफए के अंतर्गत सभी विदेशी संपत्तियों की जानकारी देनी होती है। यह नियम केवल उस संपत्ति के कानूनी स्वामित्व तक सीमित नहीं है, बल्कि लाभकारी स्वामित्व और लाभार्थी स्थिति पर भी लागू होता है।
विशेषज्ञों के अनुसार कई करदाता यह मान लेते हैं कि यदि कोई विदेशी संपत्ति पत्नी या नाबालिग बच्चे के नाम पर है तो उसे अपने रिटर्न में दिखाने की आवश्यकता नहीं है। जबकि यदि उस संपत्ति में निवेश संबंधित व्यक्ति ने किया है या उससे उन्हें लाभ प्राप्त हो रहा है, तो उसका खुलासा अनिवार्य है।
Deloitte India की एग्जीक्यूटिव डायरेक्टर राधिका विश्वनाथन के मुताबिक, विदेशी संपत्ति का खुलासा लाभकारी स्वामित्व के आधार पर किया जाता है। यदि किसी व्यक्ति ने धन उपलब्ध कराया है या वह उस संपत्ति से लाभ ले रहा है, तो जानकारी न देना चूक माना जाएगा और यह भविष्य में कानूनी जोखिम पैदा कर सकता है।
आयकर विभाग ने जिन मामलों में विसंगतियां पाई हैं, उनमें संबंधित अधिकारियों को पहले संशोधित रिटर्न दाखिल करने का मौका दिया जा रहा है। यह कदम करदाताओं को स्वेच्छा से त्रुटि सुधारने का अवसर देने के उद्देश्य से उठाया गया है।
हालांकि, यदि निर्धारित समय सीमा के भीतर सुधार नहीं किया गया तो विभाग जुर्माना, ब्याज और अन्य कानूनी कार्रवाई कर सकता है। गंभीर मामलों में जांच और अभियोजन की प्रक्रिया भी शुरू हो सकती है।
इनकम टैक्स विभाग विदेशी संपत्तियों और लेनदेन से जुड़े मामलों पर लगातार निगरानी बढ़ा रहा है। कई करदाता अनजाने में या जानकारी के अभाव में विदेशी शेयर, बैंक खाते, क्रिप्टो आय या भत्तों से जुड़े गलत दावे कर देते हैं, जिससे बाद में नोटिस का सामना करना पड़ता है। विशेषज्ञों का कहना है कि समय रहते सही जानकारी देना और त्रुटियों को सुधारना ही सुरक्षित रास्ता है। आइए समझते हैं किन मामलों में सावधानी जरूरी है और क्या हैं नियम।
कई फ्रीलांसर और पेशेवर विदेशी ग्राहकों से क्रिप्टोकरेंसी में भुगतान प्राप्त करते हैं और उसे औपचारिक आय नहीं मानते। अक्सर इसे केवल पूंजीगत लाभ के रूप में दिखाया जाता है, जबकि नियमों के अनुसार प्राप्ति की तारीख पर उसका उचित बाजार मूल्य भारतीय रुपये में व्यवसाय या पेशेवर आय के रूप में घोषित करना आवश्यक है।
अखिल चंदना, पार्टनर और ग्लोबल पीपल सॉल्यूशंस लीडर, ग्रांट थॉर्नटन भारत, के अनुसार विदेशी क्लाइंट से मिली क्रिप्टो आय को शेड्यूल वी डी ए में दिखाना जरूरी है क्योंकि यह धारा 115BBH के तहत करयोग्य है। साथ ही वर्चुअल डिजिटल एसेट लेनदेन पर धारा 194S के तहत 1 प्रतिशत टीडीएस लागू होता है। विदेशी या पीयर टू पीयर प्लेटफॉर्म पर टीडीएस न कटने की स्थिति में भी करदाता को स्वयं अनुपालन सुनिश्चित करना चाहिए।
यदि पहले क्रिप्टो आय का सही खुलासा नहीं किया गया है, तो संशोधित रिटर्न या आईटीआर यू दाखिल कर अतिरिक्त कर और ब्याज जमा कर सुधार किया जा सकता है।
कुछ वेतनभोगी करदाता किराया रसीदें बढ़ाकर दिखाने, बिना यात्रा किए एलटीए क्लेम करने या फर्जी बिलों के आधार पर प्रतिपूर्ति का दावा करने की गलती कर बैठते हैं। नियोक्ता के रिकॉर्ड और फॉर्म 16 से मिलान के दौरान यह अंतर पकड़ में आ सकता है।
अखिल चंदना का कहना है कि आवास, यात्रा और अन्य भत्तों को आयकर नियमों और नियोक्ता के रिकॉर्ड के अनुसार ही दर्शाना चाहिए। किराया समझौता, बैंक ट्रांसफर का प्रमाण और वास्तविक बिल सुरक्षित रखना जरूरी है। यदि अधिक छूट का दावा हो गया है, तो संशोधित या अपडेटेड रिटर्न के माध्यम से उसे ठीक कर अतिरिक्त कर और ब्याज का भुगतान करना चाहिए।
दान के नाम पर फर्जी लेनदेन भी विभाग की निगरानी में हैं। कई बार दान बैंकिंग माध्यम से किया जाता है और बाद में नकद में रकम वापस ले ली जाती है। ऐसे मामलों में कड़ी कार्रवाई हो सकती है।
नीरज अग्रवाल, पार्टनर, नांगिया एंड कंपनी एलएलपी, का कहना है कि करदाताओं को यह सुनिश्चित करना चाहिए कि जिस संस्था को दान दिया गया है, वह वैध रूप से पंजीकृत हो और धारा 80G के तहत मान्यता प्राप्त हो। दान पर 50 प्रतिशत या 100 प्रतिशत कटौती मिल सकती है, लेकिन इसके लिए वैध रसीद और बैंकिंग माध्यम से भुगतान का स्पष्ट रिकॉर्ड होना चाहिए।
यदि गलत कटौती का दावा किया गया है, तो आईटीआर यू के जरिए सुधार कर कर और ब्याज का भुगतान करना बेहतर विकल्प है।
यदि आयकर विभाग से नोटिस प्राप्त होता है, तो सबसे पहले ई फाइलिंग पोर्टल पर दस्तावेज पहचान संख्या से उसकी पुष्टि करें। इसके बाद वार्षिक सूचना विवरण, करदाता सूचना सारांश और फॉर्म 26एएस से आंकड़ों का मिलान करें।
विश्वास पांजियार, फाउंडर, एसवीएएस बिजनेस एडवाइजर्स, का कहना है कि यदि रिटर्न में त्रुटि है और संशोधित रिटर्न की समय सीमा समाप्त हो चुकी है, तो आईटीआर यू के माध्यम से गलती सुधारी जा सकती है। यदि दावा सही है, तो आवश्यक दस्तावेजों के साथ तथ्यात्मक जवाब देना चाहिए।