भारत का दवा नियामक दवाओं की गुणवत्ता निगरानी के तरीके में बड़ा बदलाव कर रहा है। इन कदमों के तहत केंद्रीय औषधि मानक नियंत्रण संगठन (सीडीएससीओ) सिर्फ कारखानों की सख्त निरीक्षण व्यवस्था तक ही सीमित नहीं रहेगा बल्कि अपनी आंतरिक संरचना में क्षमता संबंधी कमियों को भी दूर करने की दिशा में कदम उठा रहा है।
दवा निर्माण इकाइयों का जोखिम-आधारित ऑडिट जारी है। साथ ही, गुणवत्ता विवादों को लेकर चर्चा के केंद्र में रहे कफ सिरप बनाने वाले कारखानों के खिलाफ सख्त कार्रवाई भी की जा रही है। इसके साथ ही सीडीएससीओ अपने भीतर वैज्ञानिक विशेषज्ञता बढ़ाने की दिशा में काम कर रहा है। संसाधनों और कौशल की कमी को दूर करने के लिए संस्था आंतरिक वैज्ञानिक क्षमता का विस्तार कर रही है। इसके अलावा, नियामकीय व्यवस्था में पारदर्शिता और प्रभावशीलता बढ़ाने के लिए थर्ड-पार्टी ऑडिट को भी शामिल किया जा रहा है।
देश के दवा नियामकीय तंत्र में एक बड़ा बदलाव होने जा रहा है। सीडीएससीओ के भीतर एक स्थायी वैज्ञानिक काडर बनाने की प्रक्रिया शुरू की गई है। वरिष्ठ अधिकारियों का कहना है कि इस तरह की आंतरिक वैज्ञानिक संरचना की कमी कई दशकों से महसूस की जा रही थी। इसके लिए लगभग 1,500 वैज्ञानिकों और विशेषज्ञों को नियामकीय संस्था में शामिल करने का प्रस्ताव है।
ये नियुक्तियां क्लिनिकल रिसर्च, बायोलॉजिक्स, सांख्यिकी, इंजीनियरिंग और नियामकीय परियोजना प्रबंधन जैसे क्षेत्रों में की जाएंगी। इनमें से लगभग 40 फीसदी पद लचीले या संविदा आधार पर होंगे। इस कदम को दवा मंजूरी और निगरानी प्रक्रिया को अधिक वैज्ञानिक, तेज़ और प्रभावी बनाने की दिशा में महत्त्वपूर्ण माना जा रहा है।
भारत के औषधि महानियंत्रक (डीसीजीआई) राजीव रघुवंशी ने इंडियन फार्मास्यूटिकल अलायंस के द्वारा आयोजित11वें ग्लोबल फार्मास्यूटिकल क्वालिटी समिट को संबोधित करते हुए कहा, ‘जिस नियामकीय संस्था के पास अपनी वैज्ञानिक विशेषज्ञता नहीं होती वह हमेशा पीछे रह जाती है।’
उन्होंने कहा कि नई दवाओं की मंजूरी के लिए विषय विशेषज्ञ समितियां आगे भी सलाह देती रहेंगी लेकिन नियामकीय संस्था के भीतर वैज्ञानिक क्षमता बढ़ने से अस्थायी और बाहरी विशेषज्ञों पर निर्भरता कम होगी। अधिकारियों का मानना है कि आंतरिक वैज्ञानिक ढांचा मजबूत होने से जटिल उपचारों और क्लिनिकल ट्रायल से जुड़े मामलों में मंजूरी की प्रक्रिया तेज होगी और निर्णय लेने में अधिक स्थिरता आएगी।
आंतरिक ढांचे को मजबूत करने के साथ-साथ सीडीएससीओ अब ऑडिट व्यवस्था में अधिसूचित थर्ड पार्टी एजेंसियों को शामिल करने की तैयारी कर रहा है। रघुवंशी ने कहा, ‘अब तक दवा निर्माण इकाइयों का निरीक्षण केवल केंद्र और राज्य स्तर के निरीक्षकों द्वारा किया जाता रहा है। लेकिन मौजूदा स्टाफ की संख्या काम के बोझ के मुकाबले पर्याप्त नहीं है। इसलिए हम अधिसूचित निकायों को शामिल करने की योजना बना रहे हैं।’
प्रवर्तन के मोर्चे पर सीडीएससीओ ने जोखिम-आधारित निरीक्षण की प्रक्रिया तेज कर दी है। इसमें कार्रवाई खुफिया सूचनाओं, पिछली अनुपालन स्थिति और उत्पाद के जोखिम स्तर के आधार पर तय की जाती है। वर्ष 2022 के अंत से अब तक सीडीएससीओ और राज्य दवा नियामकों ने लगभग 1,250 विनिर्माण इकाइयों का ऑडिट किया है।
जोखिम-आधारित निरीक्षण की यह नीति सबसे स्पष्ट रूप से कफ सिरप निर्माण क्षेत्र में दिखाई दी है। यह क्षेत्र बार-बार गुणवत्ता संबंधी विफलताओं और अंतरराष्ट्रीय चिंता का कारण बना है। सीडीएससीओ के अनुसार, देश में लगभग 1,300 कफ सिरप निर्माता हैं। इनमें से करीब 1,100 इकाइयों यानी 90 फीसदी से अधिक का निरीक्षण किया जा चुका है। जिन संयंत्रों में गंभीर कमियां पाई गईं, उनके खिलाफ सख्त कार्रवाई की गई है। जहां समस्याएं व्यापक थीं वहां इकाइयों को बंद तक किया गया है।