इलेस्ट्रेशन- बिनय सिन्हा
हमारे समाज और अर्थव्यवस्था का आधुनिकीकरण परस्पर जुड़ा हुआ है लेकिन दोनों समान गति से आगे नहीं बढ़ रहे हैं। अर्थव्यवस्था जहां चार दशकों से मजबूत वृद्धि हासिल कर रही है, वहीं जाति आधारित भेदभाव और अलगाव तथा कम आय वाले नागरिकों के लिए रोजगार के कम अवसर समाज के आधुनिकीकरण की प्रक्रिया को धीमा कर रहे हैं। देश में सामाजिक असमानता की सबसे गहरी जड़ें जाति और धर्म की अनुक्रमिक यानी ऊंच-नीच की व्यवस्था में हैं।
हमारे पारंपरिक समाज में जातियों के बीच एक ऊंच-नीच का क्रम शामिल था। सामाजिक अलगाव जाति के भीतर ही विवाह और जाति-आधारित व्यवसायों के अनुसार श्रम विभाजन में परिलक्षित होता था। एक तरह से इसने ब्रिटिश शासन के दौरान औपचारिक रूप लिया, जब जनगणना में कई हजार जातियों को शामिल किया गया और हिंदू कानून के तहत जाति के भीतर विवाह को न्यायिक रूप से लागू किया गया। अंतरजातीय विवाह केवल हिंदू धर्म का त्याग करके ही संभव था। सबसे हानिकारक बात यह है कि दलितों और आदिवासियों को, जो हमारी जनसंख्या का लगभग 25 फीसदी हैं, जाति पदानुक्रम के सबसे निचले स्तर पर रखा गया।
सामाजिक असमानता का सबसे बुरा स्वरूप था अस्पृश्यता। उसे त्यागना स्वतंत्रता आंदोलन का हिस्सा बन गया। यहां तक कि अंतरजातीय विवाह पर हिंदू कानून के तहत सदियों पुरानी पाबंदी को समाप्त करने का प्रस्ताव विठ्ठलभाई पटेल ने इम्पीरियल लेजिस्लेटिव काउंसिल में प्रस्तुत एक विधेयक में रखा था। यह विधेयक पारित नहीं हुआ, लेकिन आर्य समाज का अंतरजातीय विवाह संबंधी विधेयक, जिसमें उनके सदस्यों के बीच ऐसे विवाह की अनुमति दी गई थी, पारित हो गया। वास्तव में, विवाह कानूनों का आधुनिकीकरण 1955 के हिंदू विवाह अधिनियम के साथ ही पूरी तरह संभव हो सका।
सामाजिक अलगाव और जाति के भीतर ही विवाह अब भी जारी है। 2010 के दशक के बाद हुए अधिकांश सर्वेक्षण दिखाते हैं कि अंतरजातीय विवाहों का प्रतिशत केवल 5-6 फीसदी ही है। ऐसे में हमारे यहां होने वाले अधिकांश विवाह परिवारों के दबाव के चलते जातियों के दायरे में ही होते हैं। अनुसूचित और गैर-अनुसूचित जातियों के बीच विवाह को बढ़ावा देने के लिए बनाई गई डॉ. आंबेडकर सामाजिक एकीकरण योजना का प्रभाव बहुत सीमित रहा है। जाति के भीतर विवाह का लगातार प्रभुत्व इस बात का संकेत है कि सामाजिक अलगाव अभी भी प्रचलित है।
आज जो अंतरजातीय विवाह दिखाई देते हैं, वे मुख्यतः सामाजिक जुड़ाव का परिणाम हैं। ये अधिकतर गैर-अनुसूचित जातियों में होते हैं, विशेषकर शीर्ष तीन जातियों में। इस सामाजिक जुड़ाव का आधार इन उच्च जातियों के बीच आर्थिक स्थिति और गतिविधियों में बढ़ती समानता है। अनुसूचित जातियों का सामाजिक रूप से जुड़ी जातियों के साथ एकीकरण इस बात पर निर्भर करेगा कि अनुसूचित जातियों और यहां तक कि आदिवासियों की आर्थिक स्थिति उच्च जातियों के स्तर तक पहुंच पाती है या नहीं। यही कारण है कि सामाजिक विकास का मुख्य साधन अनुसूचित जातियों और आदिवासियों के लिए शिक्षा और रोजगार है, जो उनके कार्य और आर्थिक स्तर को उच्च जातियों के करीब ला सके।
जातियों के बीच पेशे पर आधारित विभाजन अब कम हुआ है लेकिन पूरी तरह समाप्त नहीं हुआ है। उदाहरण के लिए अभी भी अनुसूचित जाति के लोग हाथ से मैला साफ करते, कचरा ढोते, मुर्दाघरों में शवों को संभालते नजर आते हैं। वहीं आदिवासी अभी भी मोटे तौर पर मुख्य धारा की अर्थव्यवस्था से दूर नजर आते हैं।
वास्तविक चुनौती यह है कि दलितों और आदिवासियों के साथ होने वाले प्रतिकूल व्यवहार को समाप्त किया जाए, जिन्हें जाति पदानुक्रम से बाहर और सबसे निम्न माना जाता है। यह हमारे संवैधानिक प्रावधानों द्वारा आवश्यक है। हालांकि, सामाजिक और राजनीतिक स्तर पर भेदभाव जारी है, जिसमें दलितों पर होने वाले अनेक हमलों की रिपोर्टें और आदिवासियों का मुख्यधारा की राजनीति से अलगाव शामिल है। घरेलू उपभोग व्यय सर्वेक्षण 2022-23, दर्शाता है कि अनुसूचित जाति और अनुसूचित जनजाति का मासिक उपभोग राष्ट्रीय औसत से 7 फीसदी से 20 फीसदी कम है।
अजीम प्रेमजी विश्वविद्यालय के एक अध्ययन से पता चलता है कि अन्य समूहों की तुलना में अनुसूचित जाति और अनुसूचित जनजाति द्वारा अर्जित आय आकस्मिक श्रमिकों के लिए लगभग 10 फीसदी कम, नियमित श्रमिकों के लिए 24 फीसदी कम, और स्वरोजगार करने वालों के लिए 28 फीसदी कम है।
सावधिक श्रम शक्ति सर्वे 2023-24 की बात करें तो नियमित वेतन पाने वालों में महज 12.6 फीसदी आदिवासी, 20.6 फीसदी अनुसूचित जाति और 20.2 फीसदी अन्य पिछड़ा वर्ग के लोग हैं, जबकि उच्च जातियों के लोग 30.3 फीसदी हैं। इन आंकड़ों में वे भी शामिल हैं जो पारिवारिक उपक्रमों में सहायक का काम करते हैं। इन्हें अक्सर वेतन नहीं मिलता। ऐसा करने वालों में 29.7 फीसदी आदिवासी हैं।
समाज के आधुनिकीकरण का मुख्य लक्ष्य भारत की आर्थिक व्यवस्था में निहित स्थायी जातिगत असमानताओं को समाप्त करना होना चाहिए, साथ ही उन संवैधानिक प्रावधानों का सशक्त और प्रभावी क्रियान्वयन करना चाहिए जो जाति या धर्म की परवाह किए बिना समानता सुनिश्चित करते हैं।
मेरे विचार में सबसे महत्त्वपूर्ण आवश्यकता गुणवत्तापूर्ण नौकरियों तक समान पहुंच और स्टार्टअप के लिए समर्थन है। इसका मुख्य आधार गुणवत्तापूर्ण उच्च शिक्षा तक पहुंच है, क्योंकि उच्च शिक्षा प्राप्त निम्न-जाति के व्यक्तियों और आदिवासियों में असमानता उल्लेखनीय रूप से कम दिखाई देती है। चूंकि जाति अनुक्रम की मानसिकता उच्च-जाति के व्यक्तियों में बनी हुई है, जो अब भी वरिष्ठ अफसरशाही और प्रबंधन नौकरियों पर हावी हैं, इसलिए इस उद्देश्य के लिए एक निश्चित अवधि तक जाति-आधारित आरक्षण का प्रावधान अभी भी आवश्यक हो सकता है।
विश्वविद्यालयों में जाति भेद हाल के वर्षों में एक बड़ा मसला रहा है। आत्महत्या करने वाले पीएचडी के छात्र रोहित वेमुला के अंतिम शब्द थे, ‘मेरा जन्म ही मेरे लिए एक घातक दुर्घटना है।’ एक अन्य मेडिकल छात्रा पायल तड़वी ने भी आत्महत्या की और उनकी मांओं की अपील के बाद भारतीय विश्वविद्यालयों में सख्त भेदभाव निरोधक उपाय लागू करने के लिए विश्वविद्यालय अनुदान आयोग ने हाल ही में नियमन प्रस्तुत किए।
सामाजिक नीति और विकास के लिए एक व्यापक मुद्दा भारत में रोजगार की अनौपचारिक प्रकृति है। पीएलएफएस 2023-24 के अनुसार, केवल 21.7 फीसदी श्रमिकों को नियमित वेतन/वेतनभोगी रोजगार प्राप्त है, जबकि 19.8 फीसदी आकस्मिक श्रमिक हैं और 19.4 फीसदी घरेलू उद्यमों में सहायक हैं, जिनके श्रमिक अधिकार बहुत कम हैं या बिल्कुल नहीं हैं।
वास्तव में, नियमित वेतन/वेतनभोगी कर्मचारियों में भी 58 फीसदी के पास कोई नौकरी अनुबंध नहीं है, 47.3 फीसदी भुगतान अवकाश के पात्र नहीं हैं और 53.4 फीसदी किसी विशेष सामाजिक सुरक्षा लाभ के पात्र नहीं हैं। हमें वर्ष 2047 तक विकसित अर्थव्यवस्था बनने की दिशा में रोजगार सृजन में श्रमिक अधिकारों की इस गंभीर कमी को दूर करना होगा।
ध्यान देने योग्य है कि बेहतर शिक्षा, कौशल विकास और रोजगार सृजन केवल कल्याणकारी उपाय नहीं हैं। अधिकाधिक श्रमिकों को औपचारिक रोजगार में और उद्यमियों को निवेश बढ़त में शामिल करके, सामाजिक विकास का यह आयाम आर्थिक वृद्धि को भी तेज करेगा। हालांकि, जाति-आधारित या धर्म-आधारित पूर्वग्रहों को कम करने और समाप्त करने की मुख्य प्रेरक शक्ति हमारे समाज का आधुनिकीकरण होना चाहिए।
प्राथमिक दृष्टिकोण यह होना चाहिए कि सामाजिक और आर्थिक रूप से वंचित वर्गों के लिए उच्च-गुणवत्ता वाली शिक्षा, कौशल विकास और स्टार्टअप के लिए समर्थन तक पर्याप्त पहुंच सुनिश्चित की जाए। लेकिन हमारे समाज का अधिक पूर्ण आधुनिकीकरण तब होगा जब ये विकास अंतरजातीय विवाहों में वृद्धि करेंगे, जो भारत में सामाजिक समानता की कुंजी हैं।