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भारत के शहर ‘अत्यधिक शहरी’ लेकिन उत्पादकता में पीछे: आर्थिक समीक्षा में खुलासा

भारत ने अपने सबसे बड़े शहरों और उसके आसपास जनसंख्या का विशाल स्तर तो हासिल कर लिया है, लेकिन इसे उत्पादकता और जीवन स्तर में आनुपातिक रूप से परिवर्तित नहीं कर पाया है

Published by
अमित कपूर   
Last Updated- February 23, 2026 | 10:51 PM IST

इस वर्ष आई आर्थिक समीक्षा में देश के शहरी विकास पथ के बारे में असाधारण रूप से यह स्पष्ट स्वीकारोक्ति की गई है कि भारत ‘आर्थिक दृष्टि से पहले से ही अत्यधिक शहरी’ है। फिर भी यह ‘अधूरे वादों’ की कहानी है। समीक्षा के अनुसार, यह वादा घनी आबादी वाले क्षेत्रों में लोगों और कंपनियों के एकत्रीकरण से होने वाली उत्पादकता वृद्धि से संबंधित है।

अधूरा पहलू यह है कि भारत ने अपने सबसे बड़े शहरों और उसके आसपास जनसंख्या का विशाल स्तर तो हासिल कर लिया है, लेकिन इसे उत्पादकता और जीवन स्तर में आनुपातिक रूप से परिवर्तित नहीं कर पाया है। यह दृष्टिकोण महानगरों को या तो ‘विकास के इंजन’ या ‘शहरी आपदा’ बताने वाले ​घिसे-पिटे वाक्यांशों से परे जाकर बहस में एक अधिक तकनीकी प्रश्न उठाता है: किन परिस्थितियों में शहरों का घनत्व, उत्पादकता में परिवर्तित होता है?

शहरी अर्थशास्त्र में लंबे समय से यह तर्क दिया जाता रहा है कि निकटता से मूल्य उत्पन्न होता है। अनुभव के आधार पर देखें तो विकसित अर्थव्यवस्थाओं में शहर के आकार को दोगुना करने से उत्पादकता में 3 से 8 फीसदी की वृद्धि देखी जाती है, और विकासशील अर्थव्यवस्थाओं में बुनियादी ढांचे और संस्थानों के अनुकूल होने पर यह वृद्धि कभी-कभी इससे भी अधिक होती है।

आर्थिक समीक्षा में वैश्विक मेटा-विश्लेषण का हवाला देते हुए कहा गया है कि भारत में अनुकूल परिस्थितियों में शहर के आकार को दोगुना करने से उत्पादकता में लगभग 12 फीसदी की वृद्धि हो सकती है, जो इस बात को उजागर करता है कि अप्रयुक्त या संभावित लाभ कितने महत्त्वपूर्ण हो सकते हैं।

सैद्धांतिक रूप से भारत को इन लाभों को हासिल करने के लिए अच्छी स्थिति में होना चाहिए। इसके सेवा क्षेत्र के समूह वैश्विक स्तर पर चर्चा में रहते हैं। गुरुग्राम, जो कभी दिल्ली का एक बाहरी हिस्सा हुआ करता था, अब बहुराष्ट्रीय कार्यालयों, वैश्विक क्षमता केंद्रों और फिनटेक फर्मों का एक सघन केंद्र है। यह स्थानीयकरण अर्थव्यवस्थाओं का एक उदाहरण है, जहां कंपनियां साझा प्रतिभा, आपूर्तिकर्ताओं और नेटवर्क प्रभावों का लाभ उठाने के लिए एकत्रित होती हैं। दूसरी ओर यह अनियोजित समूहीकरण की सीमाओं को भी उजागर करता है, जहां ऊंची इमारतें जल निकासी व्यवस्था को चुनौती देती हैं, भीड़भाड़ बढ़ती है और बुनियादी ढांचा पिछड़ जाता है।

भारत के शहरी क्षेत्र सकल घरेलू उत्पाद (जीडीपी) में 60 फीसदी का योगदान करते हैं और अनुमान है कि 2030 से 2036 तक यह हिस्सा 70 फीसदी के करीब पहुंच जाएगा, जबकि शहरी जनसंख्या लगभग 60 करोड़ तक पहुंच जाएगी। फिर भी, राजकोषीय सशक्तीकरण इस गति से नहीं हो पाया है।

शहर अपने राजस्व से जीडीपी का 0.6 फीसदी से भी कम हिस्सा जुटा पाते हैं, और संपत्ति कर संग्रह वैश्विक मानकों से काफी कम, लगभग 0.15 फीसदी ही बना हुआ है। यह असंतुलन उत्पादकता बढ़ाने वाले बुनियादी ढांचे में नए सिरे से निवेश को सीमित करता है। समीक्षा में इस बात को रेखांकित किया गया है कि शहर विकास को गति तो देते हैं लेकिन उनमें राजकोषीय स्वायत्तता और समन्वित महानगरीय शासन का अभाव है।

घनत्व के संदर्भ में वेतन-पारिश्रमिक में लचीलापन उन्नत शहरी प्रणालियों की तुलना में कम प्रतीत होता है, जो यह दर्शाता है कि भारत का घनत्व अभी पूरी तरह से ‘उत्पादक घनत्व’नहीं है। भीड़भाड़, अनौपचारिकता, खंडित योजना और असमान सेवा वितरण, शहरी समूहों से उच्च वेतन की ओर बढ़ने के सिलसिले को कमजोर करते हैं। इससे यह समझने में मदद मिलती है कि भारत के विशाल आकार के बावजूद, इसके शहर न्यूयॉर्क, लंदन, शांघाई या सिंगापुर जैसे वैश्विक उत्पादन, रसद और ज्ञान केंद्रों के रूप में कार्य करने में क्यों जूझ रहे हैं।

भारत के नए मझोले आकार के शहर अभी तक अत्यधिक भीड़भाड़ से प्रभावित हुए बिना शहरीकरण की ओर अग्रसर हैं। कोयंबत्तूर, इंदौर और अहमदाबाद उदाहरण प्रस्तुत करते हैं कि कैसे विविध विनिर्माण और सेवा समूह कम भीड़भाड़ के स्तर पर फल-फूल सकते हैं। इन शहरों में आवागमन का समय कम है और भूमि बाजार अधिक लचीला है।

आर्थिक समीक्षा में जीवन सुगमता के आकलन का उल्लेख किया गया है जिससे पता चलता है कि कई द्वितीय श्रेणी के शहर सेवा वितरण और जीवन स्तर के मामले में बड़े महानगरों से बेहतर प्रदर्शन कर रहे हैं। इससे यह संकेत मिलता है कि जब आकार नियोजन क्षमता के अनुरूप होता है तो समूहीकरण के लाभों को अधिक प्रभावी ढंग से आत्मसात किया जाता है।

अंतरराष्ट्रीय अनुभव से पता चलता है कि जब देश भारत के जितने आकार तक पहुंच जाते हैं, तो विकास शायद ही कभी किसी एक महानगर में केंद्रित रहता है। जर्मनी के विकेंद्रीकृत औद्योगिक केंद्र और चीन के विकसित द्वितीय श्रेणी के समूह यह दर्शाते हैं कि बहुकेंद्रीय प्रणालियां किसी एक केंद्र पर अत्यधिक भार डाले बिना शहरी समूह को कैसे बनाए रख सकती हैं। भारत के लिए, यह मूल रूप से प्रतिस्पर्धा का प्रश्न है। राष्ट्रीय उत्पादकता, निर्यात गतिशीलता और नवाचार की तीव्रता तेजी से शहरों पर निर्भर होती जा रही है। यदि शहरी प्रणालियां कमजोर प्रदर्शन करती हैं, तो राष्ट्रीय प्रतिस्पर्धा भी उसी के अनुरूप प्रभावित होती है।

नीति का निहितार्थ महानगरों को कमजोर करना नहीं, बल्कि शहरी प्रणालियों को गहरा और विविध बनाना है। भूमि को उत्पादकता के एक कारक के रूप में देखा जाना चाहिए, जिसमें रोजगार के निकट आवास होने से प्रभावी घनत्व बढ़ेगा, जबकि सशक्त शहरी प्रशासन और स्पष्ट वित्तीय प्राधिकरण से समन्वय बेहतर होगा।

समीक्षा में विवेकाधिकार को कम करने के लिए वैधानिक स्थानिक योजनाओं और पारगमन से जुड़े एफएसआई के साथ-साथ पूर्व-निर्धारित टियर-2 निवेश की सिफारिश की गई है। इसमें जलवायु संबंधी आयाम भी शामिल है। अत्यधिक गर्मी और बाढ़ से उत्पादकता में कमी आती है, और सभी के लिए सीवेज और सेवा सुविधाएं सुलभ कराने के लिए 2047 तक कई लाख करोड़ रुपये के निवेश की आवश्यकता होगी।

भारत के शहरी विकास की यात्रा शहरी समूह के विफल होने की कहानी नहीं है। यह शहरी समूह की क्षमता से कम प्रदर्शन करने की कहानी है। देश ने वृहद विकास का स्तर हासिल कर लिया है। चुनौती इस वृहद विकास को सतत उत्पादकता और वैश्विक प्रतिस्पर्धा में परिवर्तित करने की है। नीति निर्माताओं को यह बात समझनी चाहिए कि घनत्व स्वतः गतिशीलता उत्पन्न नहीं करता, संस्थाएं करती हैं। शहर तभी सफल होते हैं जब आवागमन विश्वसनीय हो, भूमि उपयोग के नियम लचीले हों, शासन व्यवस्था में समन्वय हो, राजकोषीय प्रणालियां विश्वसनीय हों और पर्यावरणीय जोखिम का प्रबंधन किया जाए।


(लेखक इंस्टीट्यूट फॉर कम्पेटिटिवनेस के अध्यक्ष हैं)

First Published : February 23, 2026 | 10:25 PM IST