प्रतीकात्मक तस्वीर | फाइल फोटो
सर्वोच्च न्यायालय ने हाल ही में भारतीय कर प्राधिकरणों और टाइगर ग्लोब एवं अन्य (निर्धारिती) से संबंधित मामले में जो निर्णय दिया है, उसे देश के कर न्यायशास्त्र में एक ऐतिहासिक फैसले के रूप में देखा जा रहा है। इस निर्णय का भारत में मौजूदा विदेशी निवेशों और भविष्य के निवेश प्रवाह पर महत्त्वपूर्ण असर पड़ने की संभावना है। यह मामला टाइगर ग्लोबल की मॉरीशस-स्थित इकाइयों द्वारा फ्लिपकार्ट (जो सिंगापुर में पंजीकृत है और भारत में कारोबार और संपत्तियां रखता है) के शेयरों की बिक्री से संबंधित था।
ये शेयर वॉलमार्ट इंक (जो अमेरिका में पंजीकृत है) द्वारा फ्लिपकार्ट के अधिग्रहण में बेचे गए थे। निर्धारिती ने लाभ पर कर छूट पाने के लिए भारतीय कर प्राधिकरणों से संपर्क किया। हालांकि, कर प्राधिकरणों ने नोट किया कि निर्धारिती भारत-मॉरीशस दोहरा कराधान परिहार समझौता (डीटीएए) के तहत छूट पाने के पात्र नहीं थे। वर्षों की कानूनी लड़ाई के बाद, सर्वोच्च न्यायालय ने पिछले सप्ताह कर प्राधिकरणों के पक्ष में निर्णय सुनाया।
भारत और मॉरीशस के बीच का समझौता, हस्ताक्षर होने के बाद से ही जांच के दायरे में रहा है। इसे कर से बचने का रास्ता माना गया। समय-समय पर कर बचाव को कम करने के लिए डीटीएए और संबंधित प्रावधानों में संशोधन किए गए, लेकिन नवीनतम निर्णय इस राह को पूरी तरह बंद कर सकता है। जब इस मामले में निर्धारितियों ने अथॉरिटी फॉर एडवांस रूलिंग्स (एएआर) से संपर्क किया, तो उसने निष्कर्ष निकाला कि यह लेन-देन कर से बचने के लिए ही डिजाइन किया गया था।
एएआर ने पाया कि संबंधित कंपनियों का प्रबंधन नियंत्रण मॉरीशस में निदेशक मंडल के पास नहीं था। उसने यह भी कहा कि डीटीएए के तहत जब लाभ भारतीय कंपनियों के शेयरों की बिक्री से उत्पन्न होता है तो छूट केवल मॉरीशस के निवासियों को दी जाती है। इस मामले में लाभ सिंगापुर की इकाई की बिक्री से उत्पन्न हुआ था। इसलिए यह छूट के लिए पात्र नहीं था। हालांकि उच्च न्यायालय ने एएआर के निष्कर्षों को खारिज कर दिया था, लेकिन पिछले सप्ताह सर्वोच्च न्यायालय ने कर प्राधिकरणों के पक्ष में फैसला सुनाते हुए उच्च न्यायालय के निर्णय को पलट दिया।
सर्वोच्च न्यायालय के निर्णय के बाद कई मुद्दे उभरे हैं। इसमें कोई संदेह नहीं है कि भारत को अपनी कर संप्रभुता की रक्षा करनी चाहिए, लेकिन यह पूछना उचित है कि क्या मौजूदा कानूनों और संधियों की अलग-अलग व्याख्याएं, या कानूनों में पूर्वव्यापी बदलाव से निवेश माहौल को प्रभावित करने की अनुमति दी जानी चाहिए।
सैद्धांतिक रूप से देखें तो कोई भी संस्था किसी विशेष क्षेत्राधिकार में मौजूदा कानूनों और संधियों के आधार पर निवेश करती है। ऐसे में, क्या तथ्यों की अलग व्याख्या के आधार पर मौजूदा निवेशकों को दंडित करना न्यायसंगत है? निष्पक्ष रूप से देखें तो बड़ी वैश्विक संस्थाएं अपने लेनदेन को इस तरह तैयार करती हैं कि कर देयता कम हो सके। लेकिन यदि कोई देश ऐसी व्यवस्थाओं से सहज नहीं है, तो उसे भविष्य के लिए खामियों को बंद करना चाहिए।
पुरानी तारीख से लागू होने वाले बदलाव कारोबारी माहौल पर गंभीर असर डालते हैं। उदाहरण के लिए वर्तमान मामले में, कर निवास प्रमाणपत्र की वैधता पर प्रश्न उठाया गया है, जिसका अर्थ है कि एक लंबे समय से चली आ रही परंपरा की पुनः समीक्षा की जा रही है। इसके अलावा, ग्रैंडफादरिंग प्रावधानों (नए हालात में पुराने नियम लागू करने के प्रावधान) को भी सर्वोच्च न्यायालय ने यह कहते हुए खारिज कर दिया कि यद्यपि शेयर पूर्व में अधिग्रहीत किए गए थे, लेकिन बिक्री सामान्य कर-परिहार नियम और प्रावधान लागू होने के बाद हुई।
यह भी विवादास्पद है। उल्लेखनीय है कि अपने सहमति वाले निर्णय में एक न्यायाधीश ने कर संप्रभुता पर परामर्श लिखा और इस बारे में भी लिखा कि भारत को अन्य देशों के साथ कर संधियां कैसे करनी चाहिए।
ध्यान देने योग्य है कि कानून द्वारा दी गई शक्तियों के अंतर्गत कार्यपालिका यह तय करने की सबसे अच्छी हालत में होती है कि किसी भी समय किसी देश के साथ किस प्रकार का समझौता करना है। वह निवेश आकर्षित करने और कर राजस्व को अधिकतम करने के बीच सही संतुलन निर्धारित करने के लिए भी सबसे अच्छी स्थिति में होती है। हालांकि समझौतों का पालन शब्दों और भावना दोनों में किया जाना चाहिए, और उन्हें अल्पकालिक राजस्व अधिकतम करने के लिए बलिदान नहीं किया जाना चाहिए।