इक्कीसवीं सदी के तीसरे दशक के मध्य तक पहुंच जाने के बाद भी भारतीय कंपनियों में लैंगिक विविधता यानी महिला और पुरुष का समान प्रतिनिधित्व अभी तक नहीं हो पाया है। कॉरपारेट कार्य मंत्रालय के अनुसार, इस वर्ष जनवरी में पंजीकृत निदेशकों में से 68 फीसदी पुरुष थे। मंत्रालय के नवीनतम बुलेटिन में बताया गया है कि यद्यपि ‘निदेशक पहचान संख्या’ के लिए नए पंजीकरणों की संख्या में प्रति वर्ष वृद्धि हो रही है, फिर भी यह अनुपात पिछले चार वर्षों से एक जैसा है।
इस मामले में निजी कंपनियां सरकारी कंपनियों से बेहतर प्रदर्शन कर रही हैं। सरकारी कंपनियों के निदेशकों में महिलाओं की हिस्सेदारी 20 फीसदी जबकि निजी कंपनियों में 29 फीसदी है। महारत्न और नवरत्न कंपनियों की बात करें तो स्थिति और भी खराब है। एक्सीलेंस एनेबलर्स द्वारा किए गए एक अध्ययन से पता चला है कि वित्त वर्ष 2025 में उच्च प्रदर्शन करने वाली सरकारी कंपनियों की इस श्रेणी में केवल 11 फीसदी महिला निदेशक थीं।
भारत में निजी कंपनियों को सामाजिक प्रगति का प्रतीक नहीं माना जाना जाता है। नियमों के अनुसार, 300 करोड़ रुपये से अधिक के सालाना कारोबार या 100 करोड़ रुपये या उससे अधिक की चुकता पूंजी वाली सूचीबद्ध कंपनियों में कम से कम एक महिला निदेशक का होना अनिवार्य है। कई कंपनियां प्रवर्तकों या उनके रिश्तेदारों को इस पद पर नियुक्त करके कानून का अक्षरशः यानी दिखावटी पालन करती हैं, न कि उसकी भावना के अनुरूप।
बाद में, शीर्ष 1,000 सूचीबद्ध कंपनियों के लिए नियमों को सख्त किया गया ताकि कम से कम एक स्वतंत्र महिला निदेशक की नियुक्ति अनिवार्य हो सके। मार्च 2025 तक नैशनल स्टॉक एक्सचेंज में सूचीबद्ध लगभग 97 फीसदी कंपनियों के बोर्ड में कम से कम एक महिला निदेशक है। हालांकि इसे उत्साहजनक प्रगति के रूप में देखा जाना चाहिए, लेकिन आधे से अधिक कंपनियों में केवल एक महिला निदेशक है।
यह तथ्य नियामकीय अनुपालन के प्रति दिखावटी दृष्टिकोण को दर्शाता है। फिर भी, भारत ने निस्संदेह प्रगति की है। सबसे हालिया आंकड़ों की तुलना वर्ष 2014 से की जानी चाहिए, जब लैंगिक विविधता कानून लागू हुआ था और उस समय महिला निदेशकों की संख्या कॉरपोरेट निदेशकों में केवल 5 फीसदी थी। दिलचस्प यह है कि इस मामले में भारत, चीन से आगे है। चीन में, राज्य के स्वामित्व वाली कंपनियों में बोर्ड की सीटों में महिलाओं की हिस्सेदारी केवल 13 फीसदी और निजी कंपनियों में 18 फीसदी है।
पुरुष निदेशकों की तुलना में महिला निदेशकों की लगातार कमी का एक पहलू कार्य संस्कृति से संबंधित है। कई संगठनों में लैंगिक विविधता की कमी देखी जाती है, जहां प्रतिकूल सामाजिक परिवेश के कारण महिलाएं चुनौतीपूर्ण मध्य-प्रबंधन स्तरों पर भी नौकरी छोड़ देती हैं। यह असमानता स्पष्ट रूप से महिला-विरोधी सोच और महिलाओं को मानव संसाधन या कॉरपोरेट सामाजिक उत्तरदायित्व जैसी ‘नरम’ भूमिकाओं में धकेल दिए जाने में दिखाई देती है।
इनके अलावा ऐसी सामाजिक गतिविधियों, जिनमें महिला सहकर्मियों को शामिल नहीं किया जाता है (उदाहरण के लिए, काम के घंटों के बाद ‘बार’ में बैठक) या कार्य समय के बाद बैठकें आयोजित करने में भी यह असमानता झलकती है। चूंकि अधिकांश भारतीय महिलाएं घरेलू काम, बच्चों की देखभाल और बुजुर्गों की देखभाल का बोझ उठाती हैं, इसलिए इस तरह की भेदभावपूर्ण प्रथाएं कॉरपोरेट जगत में उनकी प्रगति में बाधक साबित होती हैं। ये संरचनात्मक मुद्दे हैं जिनका समाधान कानून द्वारा एक हद तक किया जा सकता है।
अधिक आर्थिक उदारीकरण भी लैंगिक विविधता की गारंटी दे सकता है। सूचना प्रौद्योगिकी क्षेत्र को छोड़कर भारतीय कंपनियां वैश्विक प्रतिस्पर्धा का सामना करने के बजाय अपेक्षाकृत सुरक्षित घरेलू बाजारों पर ध्यान केंद्रित करती हैं। यह कारक अकेले ही प्रतिभा की मांग को कम कर देता है। वैश्विक आपूर्ति श्रृंखलाओं के साथ एकीकरण से प्रतिभाओं के लिए बाजार स्वतः ही विस्तारित हो जाएगा, जिससे योग्य महिलाओं के साथ भेदभाव करना मुश्किल हो जाएगा।