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Editorial: विकसित भारत बनाने के लिए स्पष्ट रोडमैप की जरूरत, नीति आयोग के दस्तावेज में काफी आत्मविश्वास

नीति आयोग के पत्र में कहा गया है, ‘हमें 2047 तक 30 लाख करोड़ डॉलर की अर्थव्यवस्था बनना है और उस समय तक हम 18,000 डॉलर वार्षिक की प्रतिव्यक्ति आय का लक्ष्य लेकर चल रहे हैं।’

Last Updated- July 29, 2024 | 9:18 PM IST
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गत सप्ताह नीति आयोग की संचालन संस्था की नौवीं बैठक के बाद एक ‘दृष्टिकोण पत्र’ जारी किया गया। इसमें 2047 तक विकसित भारत बनाने को लेकर विजन पेश किया गया है। यह लक्ष्य चर्चा में है और खुद प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी कई बार इसका उल्लेख कर चुके हैं। यह महत्त्वपूर्ण है कि इस बात का आकलन किया जाए कि सरकार का थिंक टैंक इस बारे में क्या सोचता है कि इसे हकीकत में बदलने के लिए क्या कुछ करना होगा।

दस्तावेज में काफी आत्मविश्वास नजर आता है और वह इस मान्यता पर आधारित है कि भारत ने ‘बदलाव के अपने सफर में कई ऐसे मुकाम हासिल किए जो नजर आते हैं और अब वह उड़ान भरने को तैयार है।’ परंतु कई लोगों का तर्क है कि भारत बीते कम से कम दो दशकों से रनवे पर ही खड़ा है और उसकी उड़ान अभी भी कुछ दूर नजर आती है।

संबंधित दस्तावेज में बीते एक दशक के प्रदर्शन की काफी बात की गई है और यह दर्शाया गया है कि भारत ने तेज छलांग लगाने की क्षमताएं दिखाई हैं। इस बात को जन धन खातों में विस्तार, चंद्रयान की उपलब्धि और एशियाई खेलों में पदक तालिका में स्थान तक के संदर्भ में कहा गया है। ये सभी बातें गर्व करने लायक हैं लेकिन ये तथा ऐसे अन्य उदाहरणों का आवश्यक तौर पर यह अर्थ नहीं हो सकता है कि ये आर्थिक विकास की योजनाओं में भी अनिवार्य तौर पर अपनी भूमिकाएं निभाएं। इसका काफी हिस्सा इस बात की पड़ताल करता है कि विकसित भारत का क्या अर्थ हो सकता है।

यह दावा किया गया है कि राष्ट्रीय स्तर पर 15 लाख लोगों के साथ संवाद करके विकसित भारत 2047 के लिए विजन का प्रारूप तैयार किया गया। बहरहाल इसमें कुछ लोकप्रिय मांगें मसलन स्वच्छ पेय जल, सबके लिए कौशल तथा ग्रामीण अर्थव्यवस्था को जीवंत बनाना आदि शामिल हैं और इस आधार पर लगता है कि इसके लिए इतनी गहन चर्चा की क्या आवश्यकता थी।

‘आंतरिक चुनौतियों’ वाला हिस्सा सबसे अधिक प्रासंगिक है। इसमें ऊर्जा क्षेत्र की दिक्कतें दूर करना, ग्रामीण शहरी असमानता और औद्योगिक प्रतिस्पर्धा जैसे विषय शामिल हैं। हालांकि इन पर कैसे काम होगा, ये सुझाव भी प्राप्त करने होंगे।

आखिर में सबसे अहम हैं आर्थिक लक्ष्य। ऐसा इसलिए कि विकसित भारत के अन्य लक्ष्यों को हासिल करने के लिए जरूरी गति वृद्धि से ही हासिल होगी।

पत्र में कहा गया है, ‘हमें 2047 तक 30 लाख करोड़ डॉलर की अर्थव्यवस्था बनना है और उस समय तक हम 18,000 डॉलर वार्षिक की प्रतिव्यक्ति आय का लक्ष्य लेकर चल रहे हैं।’ हालांकि इसे हकीकत में बदलने के लिए दो अंकों की वृद्धि लगातार बरकरार रखनी होगी। पत्र में ऐसी वृद्धि के उदाहरणों में जापान, जर्मनी, सिंगापुर और कोरिया के साथ चीन का नाम पढ़ना दिलचस्प है। इन देशों ने दशकों तक उच्च वृद्धि हासिल की है और इसे नाटकीय संस्थागत और साामजिक बदलावों से भी मदद मिली है।

सिंगापुर ने अपनी अफसरशाही में सुधार किया, कोरिया ने नए तरह की निजी-सार्वजनिक भागीदारी विकसित की, जापान ने अपने सार्वजनिक क्षेत्र में, नियमन और न्यायपालिका में पूरी तरह पश्चिमी उदारवादी मॉडल अपना लिया। चीन में 1970 के दशक के बाद ऐसा ही बदलाव हुआ और संचालन की प्रक्रिया में खुलापन लाया गया, निजी मुनाफे की इजाजत दी गई और निर्णयों का विकेंद्रीकरण किया गया।

भारतीय संस्थानों में ऐसे बदलाव के बिना लगातार उच्च वृद्धि हासिल करना मुश्किल होगा। उदाहरण के लिए हमारे देश के पुराने और सख्त अफसरशाही ढांचे की वजह से निर्णय प्रक्रिया में देरी होती है और विशेषज्ञता या अनुभव को तवज्जो नहीं दी जाती है। स्पष्ट है कि प्रशासनिक सुधार भी काफी समय से लंबित हैं। कई संस्थानों में बदलाव की आवश्यकता है।

न्यायिक प्रक्रिया में बहुत समय लगता है, कानून का प्रवर्तन करने में मनमानापन है, तीसरे स्तर की सरकार को पर्याप्त फंडिंग नहीं है और उसके यहां जवाबदेही का अभाव है। महिलाओं को श्रम शक्ति में अधिक भागीदारी देने जैसे सामाजिक बदलावों को लागू करना तब और कठिन हो सकता है। इन सभी के लिए राजनीतिक और सामाजिक सहमति की आवश्यकता होगी। नीति आयोग को उसे हासिल करने पर काम करना चाहिए।

First Published - July 29, 2024 | 9:18 PM IST

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