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Editorial: RBI द्वारा असुरक्षित जोखिम भार में बढ़ोतरी समय से पहले उठाया गया कदम

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बैंकिंग नियामक साफ तौर पर असुरक्षित ऋण के बढ़ने से चिंतित था। क्रेडिट कार्ड से होने वाली प्राप्तियों पर भी ऋण भार बढ़ाया गया है।

Last Updated- November 20, 2023 | 9:11 AM IST
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भारतीय रिजर्व बैंक (आरबीआई) ने गत सप्ताह बैंकों और गैर बैंकिंग वित्तीय कंपनियों दोनों के ​लिए उपभोक्ता ऋण जोखिम भार को 100 फीसदी से बढ़ाकर 125 फीसदी करने का निर्णय लिया है। यह समय से पहले उठाया गया कदम है। हालांकि इसमें आवास ऋण, शिक्षा ऋण, वाहन ऋण और सोने के बदले लिए गए ​ऋण को शामिल नहीं किया गया है।

बैंकिंग नियामक साफ तौर पर असुरक्षित ऋण के बढ़ने से चिंतित था। क्रेडिट कार्ड से होने वाली प्राप्तियों पर भी ऋण भार बढ़ाया गया है। रिजर्व बैंक के गवर्नर शक्तिकांत दास ने अक्टूबर के मौद्रिक नीति दस्तावेज में इन विषयों का उल्लेख किया था और बैंकों तथा एनबीएफसी को सलाह दी थी कि वे आंतरिक निगरानी बढ़ाएं।

बीते दो वर्षों में भारतीय अर्थव्यवस्था में उपभोक्ता ऋण में इजाफा देखा गया है। खुदरा ऋण में मार्च 2021 और मार्च 2023 के बीच 24.8 फीसदी की समेकित वार्षिक वृद्धि दर रही जो समग्र ऋण वृद्धि दर का दोगुना है। इसके अलावा इसी अवधि में सुरक्षित और असुरक्षित बकाया के घटक में भी बदलाव आया और असुरक्षित खुदरा ऋण 22.9 फीसदी से बढ़कर 25.2 फीसदी हो गया।

रिजर्व बैंक की ताजा वित्तीय स्थिरता रिपोर्ट में भी इससे जुड़े जोखिम का उल्लेख किया गया और कहा गया कि 10 फीसदी खुदरा कर्जदार अपना मासिक भुगतान नहीं कर पा रहे हैं। असुरक्षित ऋण में इजाफे की वजह जोखिम लेने की क्षमता में सुधार, डिजिटलीकरण और फिनटेक का इस्तेमाल है। इन सभी बातों ने मिलकर कर्ज लेने की प्रक्रिया को आसान बना दिया है लेकिन इससे जोखिम में भी इजाफा हुआ है।

एनबीएफसी खासतौर पर डिजिटल चैनलों का आक्रामक इस्तेमाल करती रही हैं। सेंटर फॉर एडवांस्ड फाइनैंशियल रिसर्च ऐंड लर्निंग की एक हालिया रिपोर्ट दिखाती है कि एनबीएफसी के ऋण में निरंतर इजाफा हुआ है और यह 2013 के जीडीपी के 8.6 फीसदी से बढ़कर 2022 में 12.3 फीसदी हो गया है। इसके साथ ही बैंकों के ऋण की हिस्सेदारी में कमी आई है। इसके साथ ही एनबीएफसी द्वारा दिए जाने वाले ऋण का बड़ा हिस्सा खुदरा क्षेत्र में है।

खुदरा क्षेत्र में एनबीएफसी की बाजार हिस्सेदारी 2015 से जून 2022 के बीच करीब 1.8 गुना बढ़ी। बहरहाल, एनबीएफसी क्षेत्र के संभावित जोखिम में इजाफा बैंकिंग व्यवस्था को भी मुश्किल में डाल सकता है क्योंकि वह बैंक फंडिंग पर बहुत अधिक निर्भर है। मार्च 2023 तक एनबीएफसी की फंडिंग का करीब 40 फीसदी हिस्सा बैंक ऋण से आ रहा था।

एक ओर जहां उपभोक्ता ऋण की हिस्सेदारी बढ़ी और वित्तीय क्षेत्र मजबूत बना रहा, वहीं आवश्यकता इस बात की भी है कि अर्थव्यवस्था को संभावित खतरों से बचाया जाए। यही वजह है ​कि रिजर्व बैंक ने पूंजी आवश्यकता में इजाफा किया है।

ऊंची पूंजी आवश्यकता अक्सर महंगी उधारी के रूप में सामने आती है जो न केवल ऋण की मांग को प्रभावित कर सकती है बल्कि वित्तीय क्षेत्र के मुनाफे पर भी असर डाल सकती है। यह बात रिजर्व बैंक की घोषणा के बाद बैंकों तथा अन्य वित्तीय संस्थानों के शेयरों की कीमतों में गिरावट के रूप में सामने आई। उधारी में फिनटेक का इस्तेमाल अक्सर छोटे कर्जदारों के नकदी प्रवाह पर निर्भर करता है।

यह संभव है कि डिजिटल स्वरूप में आंकड़ों का उत्पादन और उनका इस्तेमाल बैंक समर्थित फिनटेक तथा एनबीएफसी को इस योग्य बना रहा हो कि वे कर्जदारों के एक हिस्से तक ऋण का विस्तार करें जो औपचारिक वित्तीय क्षेत्र से बाहर रहे हैं। इस बात का भी परीक्षण करना होगा कि अगर ऐसे सभी ऋण खपत की खातिर लिए जा रहे हैं या छोटे घरेलू उपक्रमों द्वारा इस्तेमाल किए जा रहे हैं।

बैंकों और एनबीएफसी द्वारा असुरक्षित ऋण बढ़ाने का अधिक गहराई से अध्ययन किया जाना चाहिए। बहरहाल, नियामकीय दृष्टि से देखें तो उपभोक्ता ऋण में लगातार उच्च वृद्धि रिजर्व बैंक के लिए स्पष्ट चेतावनी है। उसका नियामकीय हस्तक्षेप ऋण वृद्धि और संभावित जोखिमों से बचाव में मदद करेगा।

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First Published - November 20, 2023 | 9:11 AM IST

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