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Editorial: उम्मीदों पर खरे नहीं उतरे भारतीय खिलाड़ी, प्रदर्शन में सुधार की जरूरत

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इन खेलों में हमें एक रजत और पांच कांस्य सहित केवल छह पदक मिले जो बताता है कि भारतीय खिलाड़ियों को विश्वस्तरीय बनाने के क्षेत्र में अभी काफी काम करने की आवश्यकता है।

Last Updated- August 11, 2024 | 9:46 PM IST
Many major sports including hockey, shooting, cricket, badminton out of Glasgow Commonwealth Games हॉकी, निशानेबाजी, क्रिकेट, बैडमिंटन सहित कई प्रमुख खेल ग्लासगो राष्ट्रमंडल खेलों से बाहर

पेरिस में आयोजित ग्रीष्मकालीन ओलिंपिक खेलों में भारत के 117 खिलाड़ियों ने 16 खेलों में हिस्सा लिया। माना जा रहा था कि इन खेलों में देश टोक्यो ओलिंपिक के एक स्वर्ण और दो रजत समेत सात पदकों के प्रदर्शन को बेहतर करेगा। परंतु इन खेलों में हमें एक रजत और पांच कांस्य सहित केवल छह पदक मिले जो बताता है कि भारतीय खिलाड़ियों को विश्वस्तरीय बनाने के क्षेत्र में अभी काफी काम करने की आवश्यकता है।

खासकर उन खेलों में जिनके बारे में हमारा दावा है कि हम विश्वस्तरीय सुविधाएं रखते हैं। मनु भाकर द्वारा एक ही ओलिंपिक में दो पदक (कांस्य) हासिल करने और अमन सहरावत के देश का सबसे युवा ओलिंपिक पदक विजेता (कुश्ती में कांस्य) बनने के अलावा भारत के प्रशंसकों को खुशी से अधिक निराशा का सामना करना पड़ा। विनेश फोगाट दुर्भाग्यपूर्ण ढंग से अयोग्य घोषित कर दी गईं जिनकी अपील पर फैसला आना बाकी है। भारत कई अवसरों पर करीबी मामले में पदक पाने से चूक गया।

उदाहरण के लिए भाकर 25 मीटर पिस्टल शूटिंग में बहुत मामूली अंतर से तीसरा पदक पाने से चूक गईं। बैडमिंटन में लक्ष्य सेन सेमीफाइनल में दो बार बढ़त गंवा बैठे और कांस्य पदक के लिए हुए मुकाबले में हार कर चौथे स्थान पर रहे। यह उस खेल में भारत का सर्वश्रेष्ठ प्रदर्शन था जिसके बारे में उसका दावा है कि उसके पास विश्वस्तरीय सुविधाएं हैं।

वेटलिफ्टर मीराबाई चानू जिन्होंने टोक्यो में रजत पदक जीता था, वह महज एक किलोग्राम वजन कम उठाने के कारण कांस्य पदक पाने से चूक गईं। हॉकी में जहां भारत को विश्व में पांचवीं वरीयता हासिल है, टीम ने लगातार दूसरे ओलिंपिक में कांस्य पदक जीता लेकिन यहां भी टीम स्वर्ण या रजत पदक जीत सकती थी। जर्मनी के खिलाफ मुकाबले में ढेर सारे पेनल्टी कॉर्नर को गोल में बदल पाने में नाकामी की शाश्वत समस्या के कारण टीम को 2-3 से हार का सामना करना पड़ा।

भारतीय मुक्केबाजों को हमेशा पदक का दावेदार माना जाता है लेकिन उन्हें भी खाली हाथ लौटन पड़ा। नीरज चोपड़ा भी टोक्यो में स्वर्ण जीतने का कारनामा दोहरा नहीं सके और उन्हें पेरिस में रजत पदक से संतोष करना पड़ा। कुश्ती में भारत को केवल एक कांस्य पदक मिला। फोगाट को दुर्भाग्यपूर्ण ढंग से अयोग्य घोषित किए जाने के बावजूद एक ऐसे खेल में यह कमजोर प्रदर्शन है जिसमें भारत वैश्विक शक्ति होने का दावा करता है।

इस कमजोर प्रदर्शन की वजह निर्धारित कर पाना मुश्किल है। यकीनन सरकार के समर्थन में निरंतरता की कमी एक वजह है। उदाहरण के लिए शूटिंग में पदक जीतने वालों में से अधिकांश अच्छे परिवारों से आते हैं जिनकी वित्तीय स्थिति इतनी मजबूत होती है कि वे प्रशिक्षण और कोचिंग का खर्च उठा सकें। या फिर खिलाड़ी सरकारी सेवा में होते हैं, मसलन नीरज चोपड़ा सेना में जबकि शूटिंग का कांस्य पदक जीतने वाले स्वप्निल कुसाले आदि सरकारी कर्मचारी हैं। देश के अधिकांश खेल संघों के गैर पेशेवर रवैये ने हालात और भी खराब किए हैं।

इन संघों में वरिष्ठ पदों पर राजनेता बैठे हैं जो खिलाड़ियों के कल्याण के बजाय अन्य बातों में रुचि रखते हैं। पिछले वर्ष पहलवानों द्वारा कुश्ती संघ के मुखिया और सत्ताधारी दल के ताकतवर राजनेता बृज भूषण शरण सिंह के खिलाफ प्रदर्शन इसकी बानगी है। फोगाट का अपने वजन को तय सीमा में रखने के लिए संघर्ष आंशिक रूप से उस विरोध प्रदर्शन में हिस्सा लेने का भी परिणाम था।

जैसा कि इस श्रेणी में स्वर्ण पदक हासिल करने वाली पहलवान ने कहा भी कि निचले भार वर्ग में लड़ने की तैयारी कम से कम दो साल पहले शुरू होनी चाहिए। फोगाट के पास तैयारी के लिए एक वर्ष से भी कम समय था। पेरिस में भारत का प्रदर्शन 1900 के बाद से दूसरा सबसे बेहतर प्रदर्शन था। दुनिया की सबसे बड़ी आबादी वाले देश की क्षमताओं को यह सही ढंग से नहीं दर्शाता।

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First Published - August 11, 2024 | 9:46 PM IST

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