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कोविड के बाद दुनिया का बदला नजरिया

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चुनौतियों का सामना करते हुए नवाचार: कोविड महामारी ने बदल दिया कारोबार और जीवनशैली

Last Updated- March 18, 2024 | 11:38 PM IST
BS Opinion: A wiser world after Covid, Preserving the magic & more कोविड के बाद दुनिया का बदला नजरिया
Illustration: Binay Sinha

यह बात वर्ष 2008 की है जब शतरंज खिलाड़ी विश्वनाथन आनंद जर्मनी के बॉन में व्लादीमिर क्रैमनिक से लोहा ले रहे थे। इसी दौरान उनके सहयोगी सूर्यशेखर गांगुली चिकन पॉकस से संक्रमित हो गए।

मगर इसके बाद भी गांगुली काम करते रहे और होटल के कमरे से स्काइप पर आनंद और अपनी टीम के अन्य सदस्यों से जुड़े रहे। चूंकि, गांगुली संक्रमित थे, इसलिए भोजन एवं जरूरत का अन्य सामान उनके कमरे के आगे छोड़ दिया जाता था।

उस समय वह संभवतः दुनिया के पहले ऐसे व्यक्ति होंगे जो इस अवस्था से गुजरे होंगे। मगर अक्टूबर 2020 आते-आते दुनिया के ज्यादातर लोग ऐसा ही कर रहे थे। चार वर्ष पहले भारत में भी दुनिया के अन्य देशों की तरह लॉकडाउन लग गया।

कोविड-19 महामारी ने लोगों का जीवन पूरी तरह बदल दिया। हम यह नहीं जानते कि इस महामारी से प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष रूप से कितने लोगों की मौत हुई। हमें यह भी नहीं पता कि कितने लोगों की जान गई या इस महामारी के दीर्घकालीन असर से कितने लोगों की जान और जाएगी। शायद हम यह जान भी नहीं पाएंगे। जब लाखों-करोड़ों की संख्या में लोग प्रभावित होते हैं तो अत्याधुनिक प्रणाली से लैस एवं सक्षम स्वास्थ्य प्रणाली भी विश्वसनीय एवं अधिक से अधिक प्रामाणिक जानकारियां एकत्र नहीं कर पाती है।

यहां तक कि सर्वाधिक उदार एवं खुले समाज में भी जहां असहज जानकारियां देना कोई अपराध नहीं समझा जाता है, वहां भी मौत या हताहत हुए लोगों की वास्तविक संख्या बताने में राजनीतिक विवशता सामने आ जाती है। बस इतना समझ लें कि कोविड ने दुनिया की आबादी के एक बड़े हिस्से को प्रभावित किया है।

वर्ष 2000 के दशक की शुरुआत में कई वैज्ञानिक खोज हुई थीं जिनकी मदद से दुनिया को कोविड जैसी महामारी से निपटने का साहस भी मिल पाया। अगर कोविड या इसी तरह की कोई दूसरी महामारी 20 वर्ष पहले आई होती तो केवल विषाणु (वायरस) का पता लगाने और प्रभावी टीके एवं इनका उत्पादन करने में ही पांच वर्ष लग जाते।

मगर वैज्ञानिक प्रगति से कोविड महामारी कुछ महीनों के अंदर ही समझ में आ गई और इसे नियंत्रित करने के उपाय होने लगे। नई तकनीक आने का यह भी मतलब होगा कि दुनिया की प्रयोगशालाएं अगली ऐसी किसी महामारी से निपटने में सक्षम होंगी। कुछ खास क्षेत्रों, जैसे सिंथेटिक स्नेक ऐंटीवेनीन (संश्लेषित सर्प विषनाशक) आदि बनाने में इन तकनीकों की मदद से और अधिक प्रगति होगी।

अगर कोविड महामारी नहीं होती तो कारोबारों को भी कई चीजों के बारे में नए सबक नहीं मिलते। ये ऐसे सबक हैं जिनके बारे में कारोबारी जगत ने कल्पना भी नहीं की होगी। वैश्विक स्तर पर सप्लाई व्यवस्था चरमरा गई क्योंकि कई प्रमुख क्षेत्रों में लॉकडाउन हो गया।

इसके बाद यूक्रेन युद्ध और फिर इजरायल तथा हमास में युद्ध के कारण लाल सागर में जहाजों का आवागमन बाधित होने से सप्लाई व्यवस्था बाधित ही रही। यह तो कारोबारों की खूबी ही मानी जाए कि इन तमाम चुनौतियों के बीच वे सप्लाई तंत्र में विविधता लाने में सफल रहे और मजबूती से डटे रहे। सप्लाई तंत्र से जुड़े जोखिम कम करने में मददगार तकनीक भी पहले से काफी बेहतर हो गई हैं।

कारोबारी जगत ने यह भी सीख लिया कि कर्मचारियों को कार्यालय बुलाए बिना भी कारोबार कैसे संचालित किए जा सकते हैं। लॉकडाउन के कुछ ही हफ्तों के अंदर गांगुली-आनंद मॉडल (अगर इसे यह नाम दिया जाए तो) बड़े स्तर पर अपनाया जाने लगा।

कारोबारी जगत ने यह भी समझ लिया कि अगर कर्मचारियों के पास सक्षम ब्रॉडबैंड सुविधा हो उन्हें कार्यालय बुलाए बिना ही सभी काम कराए जा सकते हैं। हालांकि, 4जी के पहले यह करना तो ढांचागत रूप से संभव नहीं हो पाता।

दूर से काम और कार्य के समय को लेकर लचीलापन तो पहले से मौजूद था मगर कोविड ने कंपनियों को इन्हें नए स्तर तक ले जाने के लिए विवश कर दिया। इस महामारी से कुछ खास हुनर से लैस लोगों को कई तरह के काम एक साथ करने के अवसर मिलने लगे। आर्टिफिशल इंटेलिजेंस और 5जी खंड में होने वाली प्रगति से भविष्य में यह और भी आसान हो सकता है।

बेशक इससे कुछ संगठनों को कुछ बातें परेशान भी करने लगीं। इससे हितों के टकराव से संबंधित कुछ वास्तविक चिंताएं भी उठने लगीं। मसलन, कोई खास हुनर रखने वाला सूचना-प्रौद्योगिकी (आईटी) क्षेत्र में काम करने वाला कर्मचारी दो प्रतिस्पर्द्धी कंपनियों के लिए एक ही तरह का काम कैसे कर सकता है और कुछ गोपनीय सूचनाएं सार्वजनिक हो जाएं तो उस स्थिति में कैसे निपटा जाएगा?

इसका असर यह हुआ है कि इस समय जो उठापटक हो रही है उसमें कंपनियां घर से काम के चलन (डब्ल्यूएचओ) को समाप्त करने की पूरी कोशिश कर रही हैं। दूसरी तरफ, कई कर्मचारी इसका विरोध कर रहे हैं या इस्तीफा दे रहे हैं।

ये चीजें आंशिक रूप से आर्थिक हालात से जुड़ी होती हैं और श्रम बाजार की स्थितियों पर निर्भर करती हैं। मगर संरचनात्मक बदलाव तो दिखने लगे हैं। कुछ संगठनों ने समय की चाल भांपते हुए कार्यालय की जगह या इसकी कितनी जरूरत है इसका आकलन करने लगे हैं। वे जरूरत के हिसाब से ही कर्मचारियों को कार्यालय बुला रहे हैं। कर्मचारियों ने स्वयं को खुशहाल बनाने के नए तरीके खोज लिए हैं।

वे औपचारिक रोजगार छोड़कर विभिन्न प्रकार के गिग कार्यों से जुड़ गए हैं। कार्यालय से दूर रहकर भी काम करने की तकनीक विकसित होने से उत्पादकता बढ़ाने में मदद मिली है। सैम्यूल जॉनसन ने एक बार लिखा कि मुसीबत के समय लोगों का मस्तिष्क अधिक एकाग्रचित हो जाता है। कोविड जैसी भीषण महामारी से दुनिया पहले से अधिक चौकन्नी हो गई है। यह तय है कि आगे भी कोई न कोई महामारी जरूर आएगी और दुनिया में कई आपदाएं भी आएंगी। मगर कोविड महामारी से जो अनुभव मिले है वे इन परिस्थितियों से निपटने में हमारी काफी मदद करेंगे।

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First Published - March 18, 2024 | 11:30 PM IST

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