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एसबीआई के नए अध्यक्ष के समक्ष चुनौतियां

Last Updated- December 14, 2022 | 11:02 PM IST

रजनीश कुमार ने 7 अक्टूबर, 2017 को जब देश के सबसे बड़े सरकारी बैंक, भारतीय स्टेट बैंक के अध्यक्ष का पद संभाला, तब वह साफ-सफाई के इरादे से वहां पहुंचे थे। अगली तीन तिमाहियों में बैंक को करीब 15,010 करोड़ रुपये का घाटा हुआ। यह इसके 215 वर्ष के इतिहास का पहला ऐसा असाधारण अवसर था। अपने 40 वर्ष के करियर में कुमार केवल एक बार पदोन्नति से चूके लेकिन यह बात उन्हें शीर्ष पद पर पहुंचने से नहीं रोक सकी। एक बात जो कुमार को अपने समकक्षों से अलग करती है वह है बैंकिंग को लेकर उनका रुख। वह कोई बड़े दूरदर्शी व्यक्ति नहीं दिखते लेकिन उन्हें पता है कि फंसे कर्ज की गड़बडिय़ों को कैसे दूर करना है और नई पहलों के साथ कैसे आगे बढऩा है।
कुमार के पद संभालने के समय एसबीआई का जमा पोर्टफोलियो 26.24 लाख करोड़ रुपये का था। मार्च 2017 में भारतीय महिला बैंक के विलय के बाद इसमें जबरदस्त इजाफा हुआ था। बहरहाल जून 2020 में यह बढ़कर 34.19 लाख करोड़ रुपये हो चुका है। इस अवधि में ऋण पोर्टफोलियो 18.92 लाख करोड़ रुपये से बढ़कर 23.86 लाख करोड़ रुपये हो गया। बीते तीन वर्ष में जमा के प्रतिशत में कम लागत वाले चालू और बचत खातों (सीएएसए) की हिस्सेदारी 45 प्रतिशत बनी रही परंतु विशुद्ध ब्याज मार्जिन यानी फंड की लागत और फंड पर मिलने वाले ब्याज का अंतर 2.43 फीसदी से बढ़कर 3.24 फीसदी हो चुका है। इस समय एसबीआई की जमा दर अधिकांश बैंकों से कम है।
सितंबर 2017 में बैंक का फंसा हुआ कर्ज 1.86 लाख करोड़ रुपये था जो मार्च 2018 तक 2.23 लाख करोड़ रुपये हो गया। परंतु उसके बाद से इसमें गिरावट आ रही है और जून 2020 में यह मात्र 1.3 लाख करोड़ रुपये रह गया। प्रतिशत में देखें तो सितंबर 2017 में यह 9.83 फीसदी था जो मार्च 2018 में 10.91 प्रतिशत पहुंचा और जून 2020 में गिरकर 5.44 फीसदी रह गया। इसी प्रकार विशुद्ध फंसा हुआ कर्ज सितंबर 2017 में 97,896 करोड़ रुपये था जो मार्च 2018 में 1.11 लाख करोड़ रुपये तक पहुंचा और जून 2020 में घटकर 42,703 करोड़ रुपये रह गया। प्रतिशत में फंसा हुआ कर्ज सितंबर 2017 में 5.43 फीसदी था जो मार्च 2018 में 5.73 फीसदी तक पहुंचने के बाद जून 2020 में यह 1.86 फीसदी रह गया।
ऐसे में प्रॉविजनिंग कवरेज रेशियो जो सितंबर 2017 में 65.1 फीसदी था वह जून 2020 तक बढ़कर 86.32 फीसदी तक जा पहुंचा। कुमार ने फंसे कर्ज की पहचान करके बैलेंस शीट को साफ करने की लड़ाई लड़ी। उन्होंने डिफॉल्टरों से इसकी वसूली शुरू की। एसबीआई की ऋण पुस्तिका में 42 फीसदी ऋण कॉर्पोरेट और 52 फीसदी खुदरा हैं। योनो ऐप के जरिये कुमार ने बैंक में डिजिटलीकरण की एक लहर चलाई। इरादा साफ है, बैंक को केवल लोगों की ऋण जरूरतें पूरा करने वाले बैंक से हटकर एक लाइफस्टाइल बैंक में तब्दील करना। स्टेट बैंक के 100 बैंकिंग लेनदेन में से केवल सात ही शाखाओं में होते हैं। देश में 2.8 करोड़ योनो ग्राहक बनाने के बाद बैंक इसे विदेशों में शुरू करने की योजना बना रहा है। तेज डिजिटलीकरण ने लागत-आय अनुपात तो बीते तीन वर्ष में 10 प्रतिशत कम किया और यह 57 प्रतिशत से 47 प्रतिशत कर दिया। कुमार येस बैंक लिमिटेड को उबारने में भी अहम साबित हुए। अब एसबीआई उन बड़े निजी बैंकों में अपने निवेश से आय अर्जित करने को तैयार है जो बुरे दौर से गुजरे।
प्रश्न यह है कि उनके उत्तराधिकारी के लिए आगे क्या काम शेष हैं? बैंक बोर्ड ब्यूरो (बीबीबी) ने प्रबंध निदेशक दिनेश कुमार खारा को शीर्ष पद के लिए चुना है लेकिन औपचारिक घोषणा अभी होनी है, हालांकि मंगलवार को कुमार के कार्यकाल का अंतिम दिन था। हर तीन में से एक भारतीय का एसबीआई में खाता है या उसका उससे काम पड़ता है। इसका प्रबंधन आसान नहीं लेकिन खारा भी कोई बाहरी व्यक्ति नहीं हैं। वह पहले दिन से काम पर लग सकते हैं। दिल्ली स्कूल ऑफ इकनॉमिक्स के छात्र रह चुके खारा बीते चार वर्ष से बैंक के प्रबंध निदेशक हैं। उन्हें खुदरा, छोटे और मझोले उपक्रम और कॉर्पोरेट ऋण, जमा प्रवाह, अंतरराष्ट्रीय बैंकिंग कारोबार और शाखा बैंकिंग में काम का अनुभव है। उन्होंने बैंक की विदेशी अनुषंगियों का काम भी संभाला और इंडोनेशिया के एक बैंक के अधिग्रहण में अहम भूमिका निभाई।
वह अन्य बैंकों के एसबीआई में विलय की निगरानी कर चुके हैं, यूटीआई म्युचुअल फंड में उसकी हिस्सेदारी टी रो प्राइस को बेचने में शामिल रहे और बैंक के खुद के म्युचुअल फंड कारोबार को प्रबंधन अधीन परिसंपत्ति के मामले में छठे स्थान से शीर्ष पर ले आए। वह चुपचाप रहने वाले अंतर्मुखी व्यक्ति हैं और दूसरों के सुझावों की कद्र करते हैं। यदि वह हमेशा की तरह लोगों को साथ रखें, उपभोक्ताओं (बैंक के 80 प्रतिशत ग्राहक 20 से 40 की उम्र के हैं) पर ध्यान दें और तकनीक से नजर न हटाएं तो उनका काम आसान हो जाएगा। परंतु इससे तो बैंक वहीं रहेगा जहां कुमार ने उसे पहुंचाया। उसे और आगे ले जाने के लिए एसबीआई को एक ऐसे बाजार में बदलना होगा जहां कॉर्पोरेट ग्राहकों की सभी वित्तीय जरूरतों को पूरा किया जा सके। दूसरी प्राथमिकता होनी चाहिए कृषि क्षेत्र को सार्थक मदद पहुंचाना। डिजिटलीकरण को अपनाकर कुमार ने आधार तैयार किया है। खारा उसमें बीज बो सकते हैं और आपूर्ति चैनलों की किफायत बढ़ाकर लाभ अर्जित कर सकते हैं। इसके लिए बैंक के दो लाख से अधिक कर्मचारियों को विपणन शक्ति में बदला जा सकता है। आंकड़ों का बेहतर इस्तेमाल करके लागत-आय अनुपात को कम किया जा सकता है ताकि बैंक का मुनाफा बढ़े। कुमार के उत्तराधिकारी के लिए तात्कालिक चुनौती होगी कोविड से प्रभावित और पुनर्गठित ऋण की गुणवत्ता का बचाव। परंतु यह चुनौती तो समूचे बैंकिंग उद्योग के सामने है। यदि खारा इस पर खरे उतरते हैं तो एसबीआई सुरक्षित हाथों में है। हाल के दिनों में उनके आठ सहकर्मी अन्य बैंकों के मुखिया बनकर जा चुके हैं। अंदरूनी लोगों को बीबीबी का शुक्रिया अदा करना चाहिए कि उसने खारा को किसी अन्य बैंक के लिए नहीं चुना।
(लेखक बिज़नेस स्टैंडर्ड के सलाहकार संपादक, लेखक एवं जन स्मॉल फाइनैंस बैंक के वरिष्ठ परामर्शदाता हैं)

First Published - October 6, 2020 | 11:09 PM IST

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