इलेस्ट्रेशन- बिनय सिन्हा
सोलहवें वित्त आयोग की रिपोर्ट गत एक फरवरी को 2026-27 के बजट की प्रस्तुति के साथ सार्वजनिक की गई थी। उसकी सिफारिशों के साथ व्यापक रूप से टिप्पणियां भी हैं। हालांकि इन टिप्पणियों में एक समान बात नजर आती है। इनसे संकेत मिलता है कि 16वें वित्त आयोग ने कुछ राज्यों की उस मांग को कोई रियायत नहीं दी है जिसमें या तो उनके लिए केंद्रीय करों के हस्तांतरण को वर्तमान 41 फीसदी से बढ़ाने की बात थी या फिर करों का विभाज्य पूल तय करने में उपकर और अधिभार को शामिल करने की मांग थी।
आयोग ने कुछ राज्यों की उस मांग को भी स्वीकार नहीं किया है कि केंद्र प्रायोजित योजनाओं को समाप्त करके विभाज्य पूल में उनकी हिस्सेदारी बढ़ाई जाए। यह तर्क योजनाओं के क्रियान्वयन के विकेंद्रीकृत तरीके के पक्ष में था ताकि राज्य अपनी खास जरूरतों के मुताबिक उनको अपना सकें। राज्यों का तर्क था कि उन्हें उन केंद्र प्रायोजित योजनाओं के लिए विवश नहीं किया जाना चाहिए जिनमें उनके पास ज्यादा अधिकार नहीं होते लेकिन उनको लागत का करीब 40 फीसदी वहन करना पड़ता है।
ऐसे में केंद्र सरकार इन योजनाओं पर व्यय को कम कर सकती थी और बचे हुए पैसों का इस्तेमाल विभाज्य पूल में राज्यों की हिस्सेदारी बढ़ाने में किया जा सकता था। इन मांगों को स्वीकार करने के बजाय आयोग ने विभाजन के फॉर्मूले में ही कई बदलाव कर दिए हैं। उसने राज्यों को कर विभाजन का एक नया मानक बना दिया है। पहले 2.5 फीसदी का भार रखने वाले कर और राजकोषीय प्रयासों की जगह अब देश के सकल घरेलू उत्पाद में राज्यों के योगदान के लिए 10 फीसदी भार वाला एक नया मानक तय किया गया है।
यह बदलाव क्षेत्रफल को दिए गए भार को 15 फीसदी से घटाकर 10 फीसदी, जनसांख्यिकीय प्रदर्शन को 12.5 फीसदी से घटाकर 10 फीसदी और आय अंतर को 45 फीसदी से घटाकर 42.5 फीसदी करके किया गया है। वर्ष 2011 की जनगणना के आधार पर जनसंख्या का भार 15फीसदी से बढ़ाकर 17.5 फीसदी कर दिया गया है। विकास का एकमात्र मापदंड जो अपरिवर्तित रहा है, वह है वन क्षेत्र, जिसका भार 10 फीसदी पर बरकरार रखा गया है।
इन परिवर्तनों का व्यापक उद्देश्य समानता पर ध्यान केंद्रित रखते हुए, सकल घरेलू उत्पाद (जीडीपी) में योगदान जैसे नए प्रदर्शन-आधारित मापदंड को अधिक महत्त्व देना प्रतीत होता है। ध्यान रहे कि क्षेत्रफल मापदंड किसी राज्य के भू-भाग को संदर्भित करता है। जनसांख्यिकीय प्रदर्शन किसी राज्य की प्रजनन दर को नियंत्रित करने में सफलता को दर्शाता है; और आय अंतर किसी राज्य के प्रति व्यक्ति सकल घरेलू उत्पाद (जीएसडीपी) और शीर्ष तीन राज्यों के औसत जीएसडीपी के बीच के अंतर को दर्शाता है।
किसी भी वित्त आयोग की सिफारिशें अनिवार्य रूप से देश की विकसित होती राजनीतिक अर्थव्यवस्था के लिए एक मजबूत संदेश देती हैं। चाहे वह 14वें वित्त आयोग द्वारा राज्यों के लिए ऊर्ध्वाधर हस्तांतरण में 10 फीसदी अंकों की तेज वृद्धि के रूप में हो, या 15वें वित्त आयोग द्वारा राजस्व घाटा अनुदानों को धीरे-धीरे समाप्त करने के रूप में। इस कसौटी पर, 16वां वित्त आयोग भी अपवाद नहीं है।
करों के राज्यों के बीच वितरण के लिए नए मानदंडों का राज्यों पर जो प्रभाव पड़ा है, वहीं 16वें वित्त आयोग की सिफारिशों के राजनीतिक अर्थशास्त्र के दृष्टिकोण से वास्तविक निहितार्थ निहित हैं। किसी भी वित्त आयोग की सिफारिशें अनिवार्य रूप से देश की विकसित होती राजनीतिक अर्थव्यवस्था के लिए एक मजबूत संदेश देती हैं। चाहे वह 14वें वित्त आयोग द्वारा राज्यों के लिए केंद्र के वितरण में 10 प्रतिशत अंकों की तेज वृद्धि के रूप में हो, या 15वें वित्त आयोग द्वारा राजस्व घाटा अनुदानों को धीरे-धीरे समाप्त करने के रूप में। इस कसौटी पर, 16वां वित्त आयोग भी अपवाद नहीं है।
याद रहे कि जब 16वां वित्त आयोग राज्यों के साथ संवाद कर रहा था, उस समय जिस राजनीतिक अर्थव्यवस्था की चर्चा हावी रही, वह दक्षिणी राज्यों की चिंता और असंतोष की थी। इन राज्यों ने यह जाहिर किया कि अपेक्षाकृत आर्थिक प्रगति के बावजूद उन्हें अनुचित व्यवहार मिला। आय की दूरी और जनसांख्यिकीय प्रदर्शन के मानदंड आर्थिक रूप से अधिक समृद्ध दक्षिणी राज्यों के खिलाफ थे। इसलिए इन राज्यों ने तर्क दिया कि उन्हें केंद्रीय करों के विभाज्य पूल में अपने हिस्से से वंचित नहीं किया जाना चाहिए, केवल इसलिए कि वे वित्तीय और सामाजिक-आर्थिक दृष्टि से अधिक जिम्मेदार और विवेकपूर्ण रहे हैं।
इन सिफारिशों को सार्वजनिक हुए तीन सप्ताह से अधिक समय बीत गया है। दक्षिण भारत के राज्य अब बीच करों के विभाजन को लेकर अनुचित रवैये की आलोचना नहीं कर रहे हैं। 16वें वित्त आयोग की अनुशंसा के मुताबिक 28 राज्यों में से आधे राज्यों को केंद्रीय करों में अधिक हिस्सेदारी मिल रही है। इनमें से करीब पांच राज्य जिनकी हिस्सेदारी बढ़ी है वे दक्षिण भारत से हैं। ये हैं: आंध्र प्रदेश, कर्नाटक, केरल, तमिलनाडु और तेलंगाना। यकीनन अन्य राज्यों मसलन असम, गुजरात, हरियाणा, हिमाचल प्रदेश, झारखंड, महाराष्ट्र, मिजोरम, पंजाब और उत्तराखंड आदि को भी लाभ हुआ है। परंतु पांच दक्षिणी राज्यों का अपना हिस्सा बढ़ाना राजनीतिक रूप से महत्त्वपूर्ण है, खासकर उस बात के संदर्भ में जो सिफारिशें सार्वजनिक होने से पहले प्रचलित थी।
ध्यान दें कि आने वाले पांच साल में पांच उत्तरी राज्यों की केंद्रीय करों में हिस्सेदारी कम रहेगी। ये वे राज्य हैं जहां पिछले कुछ साल में भारतीय जनता पार्टी ने राजनीतिक रूप से बेहतर प्रदर्शन किया है। ये हैं: बिहार, छत्तीसगढ़, मध्य प्रदेश, राजस्थान और उत्तर प्रदेश। यह भी सही है कि जिन राज्यों को नुकसान हुआ है उनमें पश्चिम बंगाल के अलावा अरुणाचल प्रदेश, मणिपुर, मेघालय, नागालैंड, सिक्किम और त्रिपुरा शामिल हैं। परंतु यह भी अहम है कि भाजपा शासित गोवा और ओडिशा की केंद्रीय कर हिस्सेदारी भी कम हुई है।
दक्षिणी राज्यों को 16वें वित्त आयोग के उस निर्णय से कुछ लाभ हुआ है जिसमें उसने पूर्ववर्ती आयोग की व्यवस्था को लागू किया। यानी उन राज्यों के लिए राजस्व-घाटा अनुदानों को धीरे-धीरे समाप्त करना, जिनका राजस्व व्यय और राजस्व प्राप्तियों के बीच अंतर बना रहता है, भले ही उन्हें करों के वितरण के तहत केंद्रीय करों का हिस्सा मिल चुका हो। अप्रैल 2021 से मार्च 2026 के बीच केवल नौ राज्यों ने कुल राजस्व-घाटा अनुदानों (लगभग 2.95 लाख करोड़ रुपये) का 84 फीसदी से अधिक हिस्सा प्राप्त किया है। इस सूची में केवल दो दक्षिणी राज्य शामिल हैं केरल और आंध्र प्रदेश। राजस्व-घाटा अनुदानों की समाप्ति के साथ, स्पष्ट रूप से शेष सात राज्य इस निर्णय से अधिक प्रभावित होंगे। ये हैं पश्चिम बंगाल, हिमाचल प्रदेश, उत्तराखंड, पंजाब, त्रिपुरा, असम और राजस्थान।
16वें वित्त आयोग की सिफारिशों के राजनीतिक अर्थव्यवस्था संबंधी निहितार्थ बहुत स्पष्ट हैं। उत्तरी राज्यों, जिनमें से कई भाजपा-शासित हैं, ने केंद्रीय करों में अपना हिस्सा कम किया है, ठीक वैसे ही जैसे दक्षिणी राज्यों ने विभाज्य पूल में अपने हिस्से में वृद्धि की है। आर्थिक लाभों की इस खींचतान में दक्षिणी राज्य विजेता के रूप में उभरते दिखाई देते हैं। यह आगामी राजनीतिक सत्ता या चुनावी लाभ की लड़ाई के लिए क्या संकेत देता है?
अब जबकि 16वें वित्त आयोग की सिफारिशों ने दक्षिणी राज्यों की आर्थिक हानि की भावना को कम कर दिया है, क्या भाजपा-शासित केंद्र सरकार बहुचर्चित परिसीमन की ओर बढ़ेगी जिसमें एक कानूनी प्रक्रिया के तहत जनसंख्या में हुए बदलावों के आधार पर संसद और विधान सभा निर्वाचन क्षेत्रों की सीमाओं का पुनर्निर्धारण किया जाता है?
वर्ष2002 में एक संविधान संशोधन ने निर्वाचन क्षेत्रों के परिसीमन को 2026 के बाद होने वाली पहली जनगणना के परिणाम उपलब्ध होने तक स्थगित कर दिया था। केंद्र सरकार जल्द ही नई जनगणना का कार्य शुरू करेगी, जो 2027 तक पूरी हो जानी चाहिए, और इससे परिसीमन प्रक्रिया का मार्ग प्रशस्त होगा। 2027 के बाद किया गया कोई भी परिसीमन उत्तरी राज्यों को अधिक चुनावी ताकत देगा, क्योंकि उनकी जनसंख्या दक्षिणी राज्यों की तुलना में कहीं अधिक तेजी से बढ़ी है।
क्या परिसीमन के बाद उत्तरी राज्यों को अधिक चुनावी शक्ति देना अधिक प्रबंधनीय होगा, यह देखते हुए कि दक्षिणी राज्यों को केंद्रीय करों में अधिक हिस्सेदारी देकर अधिक आर्थिक शक्ति पहले ही दी जा चुकी है। यदि ऐसा होता है, तो 16वें वित्त आयोग की सिफारिशों को केंद्र सरकार के लिए एक बड़े राजनीतिक अर्थव्यवस्था संबंधी चुनौती का समाधान माना जाएगा।