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सुरक्षा के नाम पर अव्यवस्था और ‘चीनी’ रोबोडॉग का स्वदेशी दावा, AI इम्पैक्ट समिट पर उठे गंभीर सवाल

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सबसे यह सवाल उठता है कि क्या भारत के पास इस तरह के आयोजन की मेजबानी के लिए आवश्यक संगठनात्मक कौशल है

Last Updated- February 22, 2026 | 11:08 PM IST
artificial intelligence
प्रतीकात्मक तस्वीर | फाइल फोटो

एआई इम्पैक्ट समिट का उद्देश्य उभरते हुए भारत की प्रतिभा को प्रदर्शित करना था। देश को अपनी संगठनात्मक क्षमता और वर्तमान में चर्चित इस उद्योग में अपनी बहुआयामी भूमिका का प्रदर्शन करना था। लेकिन यह गलत कारणों से चर्चा में रहने वाली एक ऐसी घटना साबित हुई जिसमें बार-बार सफाई देनी पड़ी।  

अनेक प्रतिनिधियों और आगंतुकों ने शिकायत की कि आयोजन स्थल पर मोबाइल फोन ले जाने की अनुमति नहीं थी। वे ‘अत्यंत महत्त्वपूर्ण व्यक्तियों’ (वीआईपी) की आवाजाही के कारण हॉल बंद होने से सामान्य कामकाज में बाधा आने से नाखुश थे। उन्हें वाहन मिलने से पहले कई किलोमीटर पैदल चलना पड़ रहा था, जो उन्हें बिल्कुल पसंद नहीं आया।

कारों और मोबाइलों पर प्रतिबंध संभवतः सुरक्षा कारणों से लगाया गया था। कारों से बम विस्फोट हो सकते हैं, और मोबाइल फोन का इस्तेमाल भी विस्फोट करने के लिए किया जा सकता है। वीआईपी लोगों के आने-जाने वाले हॉल में लोगों के प्रवेश पर प्रतिबंध भी संभवतः सुरक्षा कारणों से ही लगाया गया था।

इन सबसे यह सवाल उठता है कि क्या भारत के पास इस तरह के आयोजन की मेजबानी के लिए आवश्यक संगठनात्मक कौशल है। मामला और भी पेचीदा इसलिए है कि यह भारत द्वारा आयोजित पहला विशाल आयोजन नहीं था। भारत मंडपम में लोगों को लाने-ले जाने के लिए बसों और शटल की व्यवस्था करना कोई असंभव काम नहीं होना चाहिए था।

सुरक्षा व्यवस्था इस तरह की असुविधा पैदा किए बिना भी की जा सकती थी। यह शिखर सम्मेलन पिछले साल पेरिस में हुए एआई ऐक्शन समिट के बाद आयोजित किया जा रहा था। वहां शिखर सम्मेलन बिना किसी अप्रिय घटना के सफलतापूर्वक संपन्न हुआ था। लोग मोबाइल फोन लेकर भी आसानी से कार्यक्रम स्थल तक पहुंच जाते थे। 

यहां एआई इम्पैक्ट समिट की सबसे चटपटी चर्चा गलगोटिया विश्वविद्यालय द्वारा एक चीनी रोबोडॉग की प्रस्तुति के इर्द-गिर्द घूमती रही, जिसकी कीमत 3,000 डॉलर से भी कम थी, और जिसे विश्वविद्यालय ने अपनी एआई-संचालित सृजन के रूप में प्रस्तुत किया था। यह भी बताया गया था कि इसे अनुसंधान एवं विकास (आरऐंडडी) के लिए निर्धारित 3.9 करोड़ डॉलर के बजट पर विकसित किया गया।

इस धोखाधड़ी की क्रूरता ही इसकी सबसे चौंकाने वाली बातों में से एक है। रोबोट के रूप-रंग में कोई बदलाव करने का प्रयास नहीं किया गया, जबकि प्रदर्शकों को व्यापक प्रचार की उम्मीद रही होगी। बॉलीवुड और मॉलीवुड में कई डिजाइनर हैं जो विज्ञान कथाओं से प्रेरित आकर्षक चीजें बनाने और उन्हें पर्दे पर शानदार ढंग से प्रस्तुत करने में अपना समय लगाते हैं। प्रदर्शक 3.9 करोड़ डॉलर की राशि का एक छोटा सा हिस्सा खर्च करके किसी बॉलीवुड डिजाइनर को रोबोट का नया रूप देने के लिए नियुक्त कर सकते थे।

इस तरह की धोखाधड़ी तो आम बात है। कुछ भारतीयों का सूचना प्रौद्योगिकी से संबंधित सामग्री इंटरनेट से चुराकर उसे असली उत्पाद बताकर बेचने का पुराना इतिहास रहा है। उदाहरण के लिए, 2023 के आसपास, आईआईटी मद्रास समर्थित एक कंपनी ने भारओएस नाम से एक ऑपरेटिंग सिस्टम जारी किया, जिसमें भार, भारत का छोटा रूप है। इस ‘नए स्वदेशी सिस्टम’ की धूमधाम से घोषणा के बाद पता चला कि यह ऐंड्रॉयड ओपन सोर्स प्रोजेक्ट का ही एक नया संस्करण था, जो मुफ्त में उपलब्ध था। 

रोबोडॉग की घटना बेहद स्पष्ट होने के बावजूद, सोने और तकनीकी आविष्कार के इतिहास से जुड़ी हुई है। जहां धन की आहट होती है, वहां धोखेबाज भी मौजूद होते हैं। मसलन सोने से जबरदस्त कमाई के चक्कर में नकली सोना बेचने वाले लोग भी मौजूद होते हैं। वे सोने के नाम पर जिस चीज को बेचते हैं वह दरअसल सस्ते लोहे के पाइराइट के टुकड़े होते हैं और कीमती धातु की तरह चमकते हैं।

बिजली और चुंबकत्व की खोज से कई तरह की निरंतर गति वाली मशीनों का विकास हुआ। कहा जाता है कि युवा पेटेंट क्लर्क के रूप में अल्बर्ट आइंस्टाइन ने ऐसी मशीनों के लिए पेटेंट देने से इनकार करके खुद को अलोकप्रिय बना लिया था। जब पेटेंट वाली दवाएं लोकप्रिय हुईं, तो चिकित्सक हर बीमारी का रामबाण बताकर नकली दवाएं बेचने लगे।  वियाग्रा से पहले भारत में ‘सांडे के तेल’ को ऐसी विशेषताओं वाली दवा के रूप में बेचा जाता था।  

कभी लोगों के मन में उस 3.9 करोड़ डॉलर के रोबोडॉग के बारे में प्रासंगिक सवाल आ सकते हैं। क्या वास्तव में इस साइबर एनिमल को विकसित करने में 3.9 करोड़ डॉलर का निवेश किया गया था, या यह महज एक मनगढ़ंत आंकड़ा था क्योंकि यह प्रभावशाली लगता था? यदि वास्तव में इतनी रकम जुटाई गई और खर्च की गई, तो निवेशक यह जानना चाहेंगे कि वह पैसा कहां गया।

व्यापक अर्थों में कहें तो, एक तथाकथित शीर्ष श्रेणी के निजी विश्वविद्यालय से उत्पन्न इस प्रकार की एक हाई-प्रोफाइल घटना, भारत में आर्टिफिशल इंटेलिजेंस (एआई) के संबंध में अनुसंधान और विकास की गुणवत्ता में विश्वास को गंभीर रूप से ठेस पहुंचाती है।

भारत के नीति-निर्माता एआई अनुसंधान एवं विकास के लिए अनुकूल वातावरण बनाने के लिए अथक प्रयास कर रहे हैं, जिसमें कंप्यूटिंग क्षमता और अत्याधुनिक डेटा केंद्र उपलब्ध कराए जा रहे हैं, साथ ही चिप डिजाइन और उत्पादन में एआई को एकीकृत करने के प्रयास भी किए जा रहे हैं। इसमें भारी मात्रा में धन का निवेश किया गया है। गलगोटिया प्रकरण  से यह सवाल उठता है कि आखिर इस धन का उपयोग कैसे किया जा रहा है।

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First Published - February 22, 2026 | 11:08 PM IST

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