facebookmetapixel
Advertisement
ऑटो उद्योग में भूचाल! कैफे-3 नियमों पर सायम का विरोधअस्पताल खुद बनेंगे बीमाकर्ता, मरीजों के लिए हो सकती है राहत!एसटीटी में बदलाव, बाजार पर असर या अवसर? निवेशक जान लें ये बातें!डीपीडीपी अनुपालन की समयसीमा घटने से बढ़ेंगी तकनीकी चुनौतियां, Meta ने जताई चिंताStocks To Watch Today: UPL से लेकर RailTel तक, 23 फरवरी को इन शेयरों में दिखेगी हलचल; निवेशक रखें खास नजरसंप्रभुता, व्यावहारिकता और विकल्प: भारत के लिए जोखिम और समझदारी के बीच का संतुलनEditorial: ट्रंप के टैरिफ पर अमेरिकी सुप्रीम कोर्ट का ‘हथौड़ा’ और आगे की राहसुरक्षा के नाम पर अव्यवस्था और ‘चीनी’ रोबोडॉग का स्वदेशी दावा, AI इम्पैक्ट समिट पर उठे गंभीर सवालGDP Rebasing: नए आधार वर्ष से GDP की नई सीरीज तैयार, पर WPI को लेकर अर्थशास्त्रियों में मतभेदEnergy Growth: सरकारी तेल कंपनियों ने खोला खजाना, बीते 10 महीनों में खर्च किए ₹1.07 लाख करोड़

संप्रभुता, व्यावहारिकता और विकल्प: भारत के लिए जोखिम और समझदारी के बीच का संतुलन

Advertisement

ट्रंप के दबाव और बदलते ग्लोबल हालातों के बीच, भारत अपनी संप्रभुता बचाने के लिए अब लचीली और समझदारी भरी कूटनीति पर जोर दे रहा है

Last Updated- February 22, 2026 | 11:17 PM IST
Donald Trump
अमेरिकी राष्ट्रपति डॉनल्ड ट्रंप | फाइल फोटो

अभी 2026 की शुरुआत ही हुई है और ‘संप्रभुता’ शब्द खूब चर्चा में आ चुका है। भारतीय राजनीति में यह चर्चा का विषय है। जब अमेरिकी राष्ट्रपति डॉनल्ड ट्रंप भारत के संदर्भ में इस शब्द का इस्तेमाल करते हैं तब तो यह विस्फोटक ही हो जाता है। या तब भी जब उनके राजदूत सर्जियो गोर का चंडीमंदिर में पश्चिमी कमान मुख्यालय का दौरा करने जैसी कोई सामान्य और पारस्परिक बात होती है।

ट्रंप संप्रभुता को दोबारा चलन में ले आए हैं। उन्होंने तीन दशकों पुरानी वैश्वीकरण की सहमति को भंग कर दिया है जिसने विभिन्न देशों पर दबाव डाला था कि वे अपने दोस्तों और साझेदारों के साथ साझा संप्रभुता से लाभान्वित हों। अब वह दौर खत्म हो चुका है। ट्रंप ने हर देश पर दबाव डाला है। खासतौर पर कनाडा से लेकर भारत तक अपने साझेदारों पर दबाव डाला है ताकि वे संप्रभुता को नए सिरे से परिभाषित करें। भारत में, यह हाल ही में सुप्त भावनाओं को फिर से जगाने वाला साबित हुआ। आप इसे आत्मसंतोष के युग के अंत के रूप में देख सकते हैं, या हमारे राष्ट्रीय विवेक की परीक्षा के रूप में। भारत का संक्षिप्त रणनीतिक व्यवहारवाद का दौर अब कसौटी पर है।

इसकी जड़ें हमारे औपनिवेशिक शासन में हैं। या फिर पाकिस्तान के पश्चिम (अमेरिका) का साझेदार बनने के बाद मिले जख्मों में। समय के साथ ये घाव गहरे होते गए और 1974 तथा 1998 में पोखरण में दो परमाणु परीक्षणों के बाद जब भारत को तमाम प्रतिबंधों और तकनीकी अवरोधों का सामना करना पड़ा तो यह मानसिकता और मजबूत होती गई।

हमारे परमाणु और मिसाइल कार्यक्रम पर कुख्यात ‘कैप, रोलबैक और एलिमिनेट’ युग में जो भी दबाव पड़ा, वह भी अमेरिका से ही आया। इसलिए भारत की संप्रभुता की व्यापक दार्शनिक संकल्पना को अमेरिका के प्रति अवज्ञा के रूप में परिभाषित किया जाने लगा। इस अनुभव ने ऐसा राष्ट्रवाद पैदा किया जो जितना संवेदनशील था, उतना ही अमेरिका के प्रति गहरे संदेह से भरा हुआ था।

‘विदेशी हाथ’ हमेशा अमेरिका का ही माना जाता था। अमेरिका के विरोधी यानी सोवियत संघ और उसके सहयोगी हमारे स्वाभाविक मित्र थे। यह तब तक था जब तक एक दिन 1990-91 में सोवियत संघ का विभाजन नहीं हो गया। तब से भारत इस नए, एकध्रुवीय विश्व की खोज कर रहा है और धीरे-धीरे इस अपरिचित भूभाग में अपनी जगह बना रहा है। इसका बड़ा परिणाम पश्चिम की ओर एक स्थिर लेकिन निर्णायक झुकाव रहा है। पीवी नरसिंह राव से लेकर नरेंद्र मोदी तक (अटल बिहारी वाजपेयी और मनमोहन सिंह समेत) हर भारतीय नेता इसी रणनीतिक दुविधा से जूझता रहा है कि शीत युद्ध के बाद के युग में किसी भी खेमे में शामिल हुए बिना रिश्ते कैसे बनाए जाएं?

भारत के आस-पड़ोस की दिक्कतें उसके रणनीतिक विकल्पों को सीमित करती हैं। व्यापक तौर पर देखें तो दोहरी बाधा है। पाकिस्तान के साथ भारत हमेशा टकराव के हालात में रहता है। वास्तविक नियंत्रण रेखा यानी एलएसी पर चीन की सक्रियता को लेकर भी वह हमेशा चिंतित रहता है। उसके पास आराम करने का वक्त नहीं है। चीन-पाकिस्तान का गठजोड़ भारत के लिए दिक्कतों को और बढ़ा देता है।

हम इसे दोहरी बाधा क्यों कहते हैं? पहली बात, भारत को हमेशा जंग के लिए तैयार रहना पड़ता है और सेना तैनात रखनी पड़ती है। हमारे ढेर सारे रक्षा साजो-सामान अभी भी रूसी दौर के हैं और यह निर्भरता खत्म होती नहीं दिखती। इसके अलावा रूस भारत के कुछ सर्वाधिक संवेदनशील और रणनीतिक कार्यक्रमों (एसएसएन)  मसलन परमाणु पनडुब्बी आदि के लिए भी जरूरी है। दूसरा, दो मोर्चों की चुनौती से बचने के लिए हमें चीन के साथ व्यापार समझौते करने होंगे। इस रिश्ते के प्रबंधन की बात करें तो भारत यूक्रेन को लेकर रूस के बारे में कोई कठोर टिप्पणी नहीं कर सकता, और न ही सार्वजनिक रूप से ट्रंप के इस दावे को स्वीकार कर सकता है कि उसने रूसी तेल खरीदना बंद करने का वचन दिया है।

जटिलता इस तथ्य में स्पष्ट है कि यूक्रेन युद्ध से पहले, जब यूरोप और अमेरिका चाहते थे कि भारत वैश्विक ऊर्जा कीमतों को बनाए रखने में मदद करने के लिए रूसी तेल खरीदे, तब रूस से भारत लगभग कोई कच्चा तेल नहीं खरीद रहा था। भारत की ऊर्जा सुरक्षा के लिए महत्त्वपूर्ण होना तो दूर, यह चर्चा में भी नहीं था। अब लोगों की राय से दबाव है कि खरीद बंद न की जाए। उन्हें बताइए कि आप संप्रभु हैं।

अतीत में भारतीय सरकारों ने अमेरिकी दबाव के प्रति जो अवज्ञा दिखाई थी, उसे अक्सर याद किया जाता है, यह बताते हुए कि इंदिरा गांधी ने रिचर्ड निक्सन और हेनरी किसिंजर को उनकी जगह दिखा दी थी। यह एक वास्तविकता है, लेकिन केवल आधी कहानी है। कहानी का आधा हिस्सा यह है कि जब इंदिरा गांधी एक धड़े की अवज्ञा कर रही थीं तो उसी दौरान उन्होंने भारत को करीब-करीब दूसरे धड़े का हिस्सा बना दिया था।

1969 में जब उन्हें अपनी अल्पमत सरकार को चलाने के लिए रूस समर्थक भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी (भाकपा) के समर्थन की जरूरत पड़ी थी तभी से रूस की ओर उनका झुकाव स्पष्ट हो गया था। 9 अगस्त 1971 को भारत सोवियत समाजवादी गणराज्यों के संघ का संधि से बंधा हुआ साझेदार बन गया। यह कोई साधारण सुरक्षा संधि नहीं थी। प्रशंसात्मक शब्दों के लंबे पाठ में छिपा हुआ अनुच्छेद नौ भी था, जो परस्पर सुरक्षा गारंटी की तरह था। 

यह उस वक्त काम आया जब अमेरिकी सातवां बेड़ा भारत को नाकाम करने के लिए रवाना हुआ, सोवियत संघ ने संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद में वीटो की गारंटी दी और भारत को बहुत तेजी से सैन्य साजो-सामान बनाने में मदद की। इनमें पोलैंड के कई सैकड़ा टी-55 टैंक भी शामिल थे। यह सब तब हुआ जब अमेरिका का नया-नया दोस्त बना चीन, पाकिस्तान को नए सिरे से हथियारबंद बना रहा था।

1971 की जीत इंदिरा और भारत दोनों का शिखर था। वह निक्सन प्रशासन के लिए शर्मिंदगी का सबब था। लेकिन क्या भारत को पूरी संप्रभुता हासिल थी? एक के बाद एक मामलों पर उसे सोवियत धड़े का साथ देना पड़ा। कंबोडिया और अफगानिस्तान में भारत की नैतिकता की परीक्षा हुई। अफगानिस्तान के मामले ने भारत के लिए रणनीतिक दिक्कतें भी पैदा कीं। इसी ने अमेरिका-पाकिस्तान गठजोड़ को नए सिरे से जन्म दिया, जिहादी संस्कृति का बीज रखा और पाकिस्तान को परमाणु हथियार संपन्न होने का अवसर दिया।

तो क्या हमारे इतिहास का 1969 से 1989 तक का दौर संप्रभुता से समझौते का दौर है? जवाब है नहीं। संप्रभुता सोने जैसी हॉलमार्क वाली चीज नहीं है। अमेरिका और चीन समेत किसी भी देश की संप्रभुता सापेक्षिक है। इसका अर्थ है कि किसी राष्ट्र को अपने विकल्प चुनने की, यहां तक कि समझौते करने की भी, स्वतंत्रता होनी चाहिए। शीत युद्ध के दौर में भारत का संप्रभु विकल्प रूस की ओर झुकाव था। उसके बाद से अमेरिका के साथ धीरे-धीरे संबंध बने हैं।

रूस के साथ रिश्तों को संभाला गया, चीन के साथ स्थिरता की कोशिश की गई और पाकिस्तान के साथ प्रतिरोधक क्षमता तैयार की गई। लेकिन उसी समय रूस, चीन का दृढ़ सहयोगी बन गया। इसका कारण यह है कि व्लादीमिर पुतिन भी संप्रभु विकल्प चुनते हैं। कोई भी देश पूरी तरह संप्रभु नहीं होता, यहां तक कि तटस्थ स्विट्जरलैंड भी नहीं। सभी अपने विकल्प और समझौते करते हैं। अवसरवाद बुद्धिमानों के हाथ में एक वैध साधन बन जाता है, और इसमें कोई शर्म नहीं होनी चाहिए।  

शीतयुद्ध के दौर में भारत को सोवियत संघ की गलतियां सहन करनी पड़ीं। उनमें सबसे अहम अफगानिस्तान का मामला था। अमेरिका के साथ मौजूदा रिश्ते की कुछ बातें उसी की प्रतिबिंब हैं।

हमारा अमेरिका विरोध इतना प्रबल था कि भारत के किसी शहर में किसी अमेरिकन के नाम पर कोई लैंडमार्क नहीं था। शायद पहली बार रेवंत रेड्डी ने हैदराबाद में ट्रंप के नाम पर एक सड़क का नाम डॉनल्ड ट्रंप एवेन्यू रखा। नई दिल्ली में आज भी अमेरिकी राजदूत के आवास रूजवेल्ट हाउस के अलावा कोई ऐसी जगह नहीं है। यहां तक कि मार्टिन लूथर किंग के नाम पर भी कोई जगह नहीं है।

आज हम जिस दुनिया में रहते हैं वह परस्पर निर्भर है और यहां संप्रभुता की अवधारणा का अधिक लचीला रखने की जरूरत है। सभी राष्ट्र नए गठबंधन तलाश रहे हैं और साझा हित ही एक मात्र मार्गदर्शक सिद्धांत बन गए हैं। विचारधारा और नैतिकता अब बाहर हैं। इस बदलाव का अच्छा उदाहरण एक सप्ताह में नई दिल्ली में दिखाई देगा, जब कनाडा के प्रधानमंत्री मार्क कार्नी आएंगे ताकि उस रिश्ते को सुधार सकें जिसे उनके पूर्ववर्ती ने बिगाड़ दिया था। उनके पास यही विकल्प है कि या तो कनाडा की संप्रभुता पर ट्रंप की धमकियां सही जाएं या फिर कहीं रिश्ते बनाकर संतुलन कायम किया जा सके।

भारतीय राजनीति के छात्र के रूप में, मेरा सबसे यादगार वॉक द टॉक साक्षात्कारों में से एक मार्क्सवादी कम्युनिस्ट पार्टी के तत्कालीन महासचिव हरकिशन सिंह सुरजीत के साथ था। मैंने उनसे पूछा, ‘आपने उन सरकारों का समर्थन किया जिन्होंने अमेरिका के साथ संबंध सुधारना जारी रखा। आप इसे कैसे उचित ठहराते हैं?’उन्होंने कहा, ‘देखिए, भारत को तकनीक चाहिए। हम इसे सोवियत संघ से लिया करते थे, जो अब अस्तित्व में नहीं है। इसलिए हमें अमेरिका की आवश्यकता है। हमें वही करना होगा जो हमारे राष्ट्रीय हित की मांग है।’ 

यह संप्रभुता पर एक संक्षिप्त सबक था। मैं आपको यह कहानी सीधे बता सकता था, लेकिन आपको पूरा आलेख पढ़ना पड़ा। 

Advertisement
First Published - February 22, 2026 | 11:17 PM IST

संबंधित पोस्ट

Advertisement
Advertisement
Advertisement