कांग्रेस के दो शीर्ष नेताओं ने पार्टी की सेहत पर चिंता जताई है। पूर्व केंद्रीय मंत्री अखिलेश दास ने तो पार्टी ही छोड़ दी है।
उनके वरिष्ठ सहयोगी अर्जुन सिंह पार्टी में तो हैं, लेकिन उन्होंने भी संगठन और सरकार की कार्यशैली की कड़ी आलोचना की है। अखिलेश दास के बारे में कहा जा रहा है कि उन्हें केंद्रीय मंत्रिमंडल से हटा दिया गया, इसीलिए वह क्षुब्ध हैं।
उनकी राज्यसभा की सदस्यता अक्टूबर में चली जाएगी। जाते-जाते उन्होंने राहुल गांधी के इर्द-गिर्द की चौकड़ी का उल्लेख किया है, जो उनके कान भरती रहती है। अखिलेस दास उत्तर प्रदेश के पूर्व मुख्यमंत्री बनारसी दास के पुत्र हैं। लखनऊ के महापौर रह चुके हैं। राजनीति के हथकंडे अच्छी तरह समझते हैं। उत्तर प्रदेश कांग्रेस की प्रमुख रीता बहुगुणा से नहीं बनती थी। न सलमान खुर्शीद (जो इससे पूर्व राज्य कांग्रेस के अध्यक्ष थे) ने कभी उन्हें तव्वजो दिया।
कुल मिलाकर जल-भुन कर दास अब पार्टी को भला-बुरा कह रहे हैं। इससे राहुल गांधी की छवि या सेहत पर कोई असर भले ही न पड़े, लेकिन नुकसान तो होता ही है। कांग्रेस ने लखनऊ में उनके बारे में अपने विचार रखे हैं। जिससे कटुता बढ़ गई है। आरोप है कि जब वह महापौर थे, तो उन्होंने जमीन-जायदाद हथिया ली थी। इस बात की कोई पुष्टि नहीं की जा सकती। बहरहाल, दास ने यह तय कर लिया है कि वह कांग्रेस को ठिकाने लगाकर रहेंगे।
उन्होंने राज्यसभा और लोकसभा, दोनों चुनाव लड़ने की ठानी है – बहुजन समाज पार्टी (बसपा) के टिकट पर। मुख्य रूप से राज्यसभा चुनाव जीतने की रणनीति बना रहे हैं। फिर साल भर बाद लोकसभा चुनाव लड़ेंगे, जहां अटल बिहारी वाजपेयी के बाद उनकी चोटी का कोई नेता ही नहीं है – न कांग्रेस के पास और न भाजपा के पास।
दास यह मानकर चल रहे हैं कि वह सीट उन्हीं की होगी और फिर कांग्रेस खिसियानी बिल्ली की तरह खंभा नोचेगी। शायद इसीलिए वह यह बात बोलकर चुप हैं – ‘कौन चौकड़ी का हिस्सा है, उन्होंने पहले कभी चौकड़ी का उल्लेख क्यों नहीं किया।’ लेकिन उससे भी ज्यादा दिलचस्प है अर्जुन सिंह का किस्सा। उन्होंने बड़ी कुशलता से पूरी बात अखबारनवीसों पर डाल दी है।
सिंह ने कहा है कि उन्हें गलत समझा गया, ‘मिसकोट’ किया गया। पर वह इस सरकार के बड़े आलोचकों में से एक है, यह बात किसी से छिपी नहीं है। यदि अर्जुन सिंह पार्टी पर निशाना साधते, तो शायद किसी को कोई दिक्कत नहीं होती। पार्टी की आलोचना का मतलब है सोनिया गांधी की आलोचना। लेकिन यह मामला तो ‘कहीं पे निगाहें, कहीं पे निशाना’ वाला है।
अर्जुन सिंह ने कहा है कि सरकार ठीक नहीं चल रही है। संगठन और सरकार में सही तालमेल नहीं है। यानी प्रधानमंत्री और कांग्रेस अध्यक्ष में मनमुटाव है, और इसे दूर किया जाना चाहिए। अर्जुन सिंह के लिए आरोप लगाना कि संगठन को दरकिनार कर सरकार जमीन से कटती चली जा रही है, कोई नई बात नहीं है।
अर्जुन सिंह ने नरसिंह राव को (जब राव प्रधानमंत्री थे) यह बताने के लिए कि राजीव गांधी हत्याकांड की खोज ठीक तरह से नहीं चल रही है, एक दर्जन चिट्ठियां लिखी थीं। इससे पहले कमलापति त्रिपाठी ने भी गांधी को सुझाना चाहा कि सरकार और संगठन कैसे चलाया जाए। कहने का मतलब था – ‘हमारी सुनिए, हम समझाते हैं कि सत्ता का मतलब क्या होता है।’
अपनी बात को सही परिप्रेक्ष्य में रखने के लिए अर्जुन सिंह ने फिर सफाई देनी चाही -‘मैं चाटुकार नहीं, गांधी परिवार का हितैषी हूं और जीवन भर रहा हूं।’ उन्होंने कहा बहरहाल, कम से कम राजनीति के गलियारों में जरा भी शक नहीं है कि अर्जुन सिंह कहना क्या चाहते हैं। लोग समझ रहे हैं, अर्जुन कहना चाहते हैं – ‘मनमोहन सिंह को हटाओ, राहुल गांधी को लाओ।’
यही हुआ था जब नरसिंह राव प्रधानमंत्री थे और मांग उठी थी कि सोनिया गांधी को राजनीति में आना चाहिए। क्या इस बार भी ऐसा होगा? जब अर्जुन सिंह से पूछा गया कि वे ऐसा मानते हैं कि मनमोहन सिंह भारत के प्रधानमंत्री फिर बनेंगे, तो उनका जवाब था कि इसके लिए चुनाव का इंतजार करना चाहिए। उन्होंने इस बात से इनकार नहीं किया कि अगली सरकार कांग्रेस के नेतृत्व में ही बनेगी। फिर प्रधानमंत्री? ‘बाद में देखेंगे।’
कुल मिलाकर कांग्रेस में सुगबुगाहट का दौर शुरू हो गया है। प्रधानमंत्री ने तो इस पर कोई टिप्पणी नहीं की है, लेकिन उनके परिवार के सदस्यों ने जरूर मित्रों को बताया है कि वे बहुत आहत हैं। इसीलिए सोनिया गांधी ने यह जताया है कि उन्होंने अर्जुन सिंह की बातों को सुना ही नहीं।
आगे क्या होगा? देखते जाइए। अर्जुन सिंह नपे तुले शब्दों में अपनी बात कहते हैं। लेकिन डरकर चुप बैठने के आदी भी नहीं हैं। देखा जाए तो अर्जुन और अखिलेश दास एक ही बात कह रहे हैं, भले ही उनके शब्द अलग-अलग हों। अब बारी है आर्थिक नीति पर बोलने की। दाम बढ़ रहे हैं। गरीबों पर मार पड़ रही है और सरकार में इसके बारे में पर्याप्त चर्चा नहीं हुई है…अगला अध्याय रजत पट पर।