Value Funds Outlook: 2025 में शेयर बाजार सीमित दायरे (रेंज-बाउंड) में रहा, इसके बावजूद वैल्यू फंड्स ने डायवर्सिफाइड इक्विटी फंड्स के बीच अपनी मजबूत पकड़ बनाए रखी। पिछले एक साल में वैल्यू फंड्स ने औसतन 8.6 फीसदी रिटर्न दिया। रिटर्न के मामले में वे लार्ज-कैप फंड्स के बाद दूसरे स्थान पर रहे। लार्ज-कैप फंड्स का औसत रिटर्न 9.7 फीसदी रहा।
वैल्यू फंड्स उन शेयरों में निवेश करते हैं जिनकी कीमतें आकर्षक होती हैं और जिनसे यह उम्मीद होती है कि समय के साथ उनकी बाजार कीमत उनके वास्तविक मूल्य के अनुरूप बढ़ेगी। सर्टिफाइड फाइनेंशियल प्लानर पारुल महेश्वरी कहती हैं, “वैल्यू इन्वेस्टिंग का मूल विचार यह है कि बाजार अंततः इन शेयरों की असली कीमत को पहचान लेता है, जिससे उनकी कीमतों में बढ़ोतरी होती है।”
एसोसिएशन ऑफ म्युचुअल फंड्स इन इंडिया (AMFI) के आंकड़ों के अनुसार, 30 नवंबर 2025 तक 25 वैल्यू फंड्स के पास कुल 2.17 लाख करोड़ रुपये की एसेट अंडर मैनेजमेंट (AUM) थी।
2026 में कंपनियों की आय में व्यापक सुधार से बाजार के लिए अनुकूल माहौल बन सकता है। सही वैल्यूएशन पर शेयरों को जमा कर रहे वैल्यू फंड्स को इसका फायदा मिल सकता है।
आईसीआईसीआई प्रूडेंशियल एसेट मैनेजमेंट कंपनी (AMC) के सीनियर फंड मैनेजर धर्मेश कक्कड़ कहते हैं, “भले ही व्यापक सूचकांक (broader indices) हाई वैल्यूएशन पर कारोबार कर रहे हों, लेकिन कई व्यक्तिगत शेयर कमजोर प्रदर्शन के दौर से गुजरते हैं। इससे अच्छी कंपनियों को सही कीमत पर खरीदने के मौके बनते हैं।”
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वैल्यू फंड्स तब अच्छा प्रदर्शन करते हैं जब बाजार में लीडरशिप बदलती है। बड़ौदा बीएनपी पारिबा म्युचुअल फंड के सीनियर फंड मैनेजर जितेंद्र श्रीराम के अनुसार, “जब सेक्टर रोटेशन शुरू होता है और बाजार किसी थक चुके थीम से बाहर निकलता है, तब वैल्यू फंड्स खास तौर पर उपयोगी होते हैं। फिलहाल हम ऐसे ही एक दौर में हो सकते हैं, क्योंकि टैक्स कटौती, वस्तु एवं सेवा कर (GST) में तर्कसंगत बदलाव और भारतीय रिजर्व बैंक (RBI) की नीतिगत ढील के प्रयासों ने निवेशकों का फोकस पूंजीगत खर्च से हटकर उपभोग आधारित क्षेत्रों की ओर मोड़ा है।”
वैल्यू इन्वेस्टिंग में धैर्य जरूरी होता है, क्योंकि किसी शेयर की असली कीमत सामने आने में समय लग सकता है। कक्कड़ कहते हैं, “ऐसे दौर भी आते हैं जब वैल्यू थीम से रिटर्न नहीं मिलता।”
बाजार के अलग-अलग चरणों में अलग-अलग इन्वेस्टमेंट स्टाइल (निवेश शैलियों) को फायदा मिलता है। वह आगे कहते हैं, “पूरे बाजार चक्र के दौरान ऐसे समय भी होते हैं जब मोमेंटम, ग्रोथ और क्वालिटी जैसी शैलियों को बेहतर रिटर्न मिलता है। ऐसे चरणों में वैल्यू फंड्स का प्रदर्शन कमजोर रह सकता है।”
एक्टिव रूप से मैनेज वैल्यू फंड्स में फंड मैनेजर की भूमिका बेहद अहम होती है। असली वैल्यू की पहचान करना, उसका सही आकलन करना और सही कीमत पर निवेश करना नतीजों को तय करता है। जो निवेशक फंड मैनेजर से जुड़े जोखिम और लागत को कम करना चाहते हैं, वे ज्यादा एसेट अंडर मैनेजमेंट (AUM) वाले और कम ट्रैकिंग एरर वाले वैल्यू इंडेक्स फंड्स में निवेश का विचाप कर सकते हैं।
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वैल्यू फंड्स उन निवेशकों के लिए सबसे बेहतर होते हैं जिनका निवेश लक्ष्य लंबी अवधि का हो। इन फंड्स में निवेश आदर्श रूप से सिस्टमैटिक इन्वेस्टमेंट प्लान (SIPs) के जरिए करना चाहिए। महेश्वरी के अनुसार, “जो निवेशक पांच साल से ज्यादा समय तक निवेश बनाए रख सकते हैं, वे वैल्यू फंड्स में निवेश कर सकते हैं। ट्रेंड के पीछे चलने वाले और एक से तीन साल की छोटी अवधि के निवेशकों को इन फंड्स से दूरी बनानी चाहिए।”
कक्कड़ का कहना है कि वैल्यू फंड निवेशकों के लिए भी लंबी अवधि का नजरिया जरूरी है। उन्होंने कहा कि बाजार अलग-अलग समय पर अलग-अलग निवेश शैलियों को इनाम देता है, इसलिए धैर्य रखना बेहद अहम है।
वैल्यू फंड्स में निवेश का आवंटन निवेशक की जोखिम सहने की क्षमता के आधार पर होना चाहिए। श्रीराम के अनुसार, “वैल्यू फंड्स साफ तौर से पोर्टफोलियो के सहायक (एंसिलरी) हिस्से होते हैं। एक आम निवेशकों के लिए सहायक निवेश 15 से 25 फीसदी के बीच हो सकता है, जबकि हाई नेटवर्थ इंडिविजुअल्स (HNIs) के लिए यह नेटवर्थ का बड़ा हिस्सा भी हो सकता है।” ज्यादा जोखिम उठाने वाले आक्रामक निवेशक बाजार में गिरावट के दौरान चल रहे एसआईपी के साथ-साथ एकमुश्त (लंपसम) निवेश भी कर सकते हैं।
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निवेश के दौरान कुछ आम गलतियों से बचना जरूरी है। महेश्वरी कहती हैं, “सबसे बड़ी गलती यह होती है कि कम प्राइस-टू-अर्निंग (P\E) वाले फंड को ही वैल्यू फंड समझ लिया जाए, जिससे वैल्यू ट्रैप में फंसने का खतरा रहता है। निवेशकों को फंड में शामिल शेयरों की क्वालिटी जरूर जांचनी चाहिए। इसके अलावा, निवेशक अक्सर तब वैल्यू फंड खरीदते हैं जब वे पहले ही शानदार रिटर्न दे चुके होते हैं और फिर जल्दी मुनाफे की उम्मीद करते हैं। यहां SIP के जिरिए निवेश मददगार हो सकती है।”
इन फंड्स को सामान्य बाजार निवेश की तरह नहीं देखना चाहिए। श्रीराम के अनुसार, “वैल्यू थीम को सामान्य बाजार निवेश की तरह न देखें और इसके प्रदर्शन की तुलना लोकप्रिय इंडेक्सों से न करें। बिना सही समझ के इनमें ज्यादा निवेश करना ठीक नहीं है। ऐसा करने से निवेशक निराश हो सकते हैं और जल्दबाजी में निवेश से बाहर निकल सकते हैं।”