रुपये की कमजोरी और विदेशी निवेशकों के पलायन के बीच लॉन्ग टर्म कैपिटल गेन टैक्स (LTCG) को फिलहाल हटाने की मांग तेज हो रही है। एमके ग्लोबल (Emkay) ने अपनी एक रिपोर्ट में इस मुद्दे को आगे बढ़ाते हुए कहा कि जब तक भारत का करंट अकाउंट (CAD) संतुलित नहीं होता और रुपया स्टेबल नहीं बनता, तब तक कैपिटल पर भारी टैक्स अर्थव्यवस्था के लिए खास लाभकारी नहीं हो सकता है। रिपोर्ट का साफतौर पर मानना है कि इक्विटी गेन पर टैक्स लगाने का समय जरूर आएगा, लेकिन सीक्वेंसिंग सबसे जरूरी है।
एमके इंस्टीट्यूशनल इक्विटीज के सीईओ नीरव सेठ ने रिपोर्ट में कहा कि करंट अकाउंट डेफिसिट (CAD) किसी कंपनी के घाटे की तरह होता है, जो समय के साथ देश की नेटवर्थ को कमजोर करता है। लंबे समय तक घाटा रहने पर कर्ज देने वाले देश की प्रोडक्टिव एसेट्स में बड़ी हिस्सेदारी के मालिक बनते जाते हैं। कोई भी संप्रभु देश इस स्थिति को लंबे समय तक स्वीकार नहीं कर सकता। अमेरिका में राष्ट्रपति डॉनल्ड ट्रंप की नीतियां इसी हकीकत की उपज मानी जा सकती हैं।
भारत मैन्युफैक्चरिंग को बढ़ाकर अपने व्यापार संतुलन को सुधारने की कोशिश कर रहा है, लेकिन इसकी रफ्तार बेहद धीमी रहने वाली है। जब तक करंट अकाउंट में लगातार घाटा रहेगा, तब तक भारत विदेशी पोर्टफोलियो निवेश (FPI) के अस्थिर इनफ्लो को लेकर ज्यादा संवेदनशील बना रहेगा। इसका सीधा असर अर्थव्यवस्था और रुपये पर पड़ता है।
एमके सीईओ डेस्क की रिपोर्ट में कहा कि पिछले 12 महीनों में भारतीय रुपया करीब 5% कमजोर हुआ है, जबकि इसी अवधि में डॉलर भी कमजोर रहा। इसकी सबसे बड़ी वजह लगातार विदेशी निवेशकों (FPI) का पलायन है। 2018 में लॉन्ग टर्म कैपिटल गेन टैक्स (LTCG) लागू होने के बाद से अब तक कुल एफपीआई इनफ्लो केवल 18 अरब डॉलर रहा है, जबकि इससे पहले के आठ वर्षों में यह आंकड़ा 100 अरब डॉलर था।
एमके का मानना है कि टैक्स से होने वाली राजस्व बढ़ोतरी, रुपये को बचाने की लागत और महंगाई पर पड़ने वाले अप्रत्यक्ष असर के मुकाबले बेहद कम है। इसलिए नीति स्तर पर ठोस कदम जरूरी हैं। इसकी शुरुआत टैक्स स्ट्रक्चर में बदलाव से करनी होगी। रिपोर्ट का कहना है कि LTCG को पूरी तरह खत्म किया जाए। वहीं, शॉर्ट टर्म कैपिटल गेन टैक्स (STCG) को घटाकर 10% किया जाए। यह बदलाव कम से कम 5 साल या उससे ज्यादा के एक स्पष्ट रोडमैप के साथ लागू किया जाए। बेहतर स्थिति यह होगी कि LTCG तभी लगाया जाए, जब भारत का ट्रेड बैलेंस बेहतर हो जाए और रुपया विदेशी निवेश को लेकर कम संवेदनशील बने।
रिपोर्ट के मुताबिक, मजबूत करेंसी के दम पर ही देश अमीर बनते हैं। करेंसी की ताकत फास्ट रीयल ग्रोथ और हाई प्रोडक्टिविटी से आती है। जो देश जितना ज्यादा उत्पादन करता है और कम खपत करता है, वह करंट अकाउंट सरप्लस (CAS) में रहता है और हर साल विदेशी संपत्तियों में अपनी हिस्सेदारी बढ़ाता है। असल यही एसेट और इनकम में बढ़ोतरी का दर्शाता है।
इसके उलट, करंट अकाउंट घाटे वाला देश हर साल अपनी कुछ एसेट्स कर्ज देने वालों को सौंपता जाता है। अमेरिका एक अमीर देश है, लेकिन संपत्ति के मामले में कमजोर माना जाता है। भारत अभी न तो आय के लिहाज से समृद्ध है और न ही संपत्ति के मामले में सशक्त है।
आमतौर पर विदेशी निवेश (FDI और FPI) की दिशा करंट अकाउंट की स्थिति से तय होती है। कम महंगाई और तेज रीयल जीडीपी ग्रोथ अर्थव्यवस्था बेहतर करंट अकाउंट दिखाती है, जिससे विदेशी निवेश आकर्षित होती है और करेंसी मजबूत होती है।
हालांकि भारत में फिलहाल यह रिश्ता कमजोर दिख रहा है। पिछले कुछ वर्षों में भारत का CAD औसतन GDP का 0.6% रहा है, जो 15 साल में सबसे कम है। सेवा निर्यात और मैन्युफैक्चरिंग में सुधार हुआ है। सोने के आयात को हटाएं तो स्थिति और भी संतोषजनक है। इसके बावजूद रुपया कमजोर है, क्योंकि उसकी चाल कैपिटल इनफ्लो पर निर्भर हो गई है।
एमके का कहना है कि नेट एफडीआई पिछले 3 साल में लगभग शून्य हो गया है। ग्रॉस एफडीआई थोड़ा घटा है, लेकिन विदेशी कंपनियों की रीपैट्रिएशन, और भारतीय कंपनियों का विदेश में निवेश ने कुल आंकड़े कमजोर किए हैं। सबसे चिंताजनक स्थिति FPI आउटफ्लो की है। पिछले 22 महीनों में भारतीय शेयर बाजार से करीब 25 अरब डॉलर निकाले जा चुके हैं।
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रिपोर्ट कहती है कि विदेशी निवेशक भारतीय शेयरों से करीब 12% रुपये में रिटर्न की उम्मीद करते हैं। लेकिन टैक्स से यह 1.5% घटता है। रुपये की गिरावट से 3–4% और घट जाता है। डॉलर में रिटर्न 7–8% रह जाता है, जो अमेरिकी बाजार जितना ही है, लेकिन जोखिम कहीं ज्यादा।
एमके का मानना है कि भारत में फिलहाल AI जैसे बड़े निवेश वाली थीम की कमी भी एफपीआई आउटफ्लो की एक वजह है, लेकिन इससे यह फैक्ट नहीं बदलता कि नीतियों को निवेश आकर्षित करने वाला होना चाहिए।