भारत का आरंभिक सार्वजनिक निर्गम (आईपीओ) बाजार एक नए मुकाम पर पहुंच गया है। आंकड़ों पर नजर डालें तो पिछले दो वर्षों (2024-25) में कुछ प्रमुख आईपीओ के माध्यम से लगभग 3.4 लाख करोड़ रुपये जुटाए जा चुके हैं। यह रकम 1989 और 2023 के बीच 35 वर्षों में जुटाए गए 6 लाख करोड़ रुपये के आधे से भी अधिक है। आईपीओ का यह कारवां यहीं थमता या कमजोर पड़ता नजर नहीं आ रहा।
कंपनियां करीब 3.5 लाख करोड़ रुपये के आईपीओ के लिए मसौदा पत्र दाखिल कर चुकी हैं। इनमें अगले साल आने वाले रिलायंस जियो, फ्लिपकार्ट और नैशनल स्टॉक एक्सचेंज (एनएसई) के आईपीओ शामिल नहीं हैं। इनके अलाव फोनपे, मणिपाल हॉस्पिटल्स और जेप्टो जैसी कंपनियां कुल 1 अरब डॉलर से अधिक मूल्य के निर्गम ला सकती हैं।
निवेश बैंकरों की नजरों में अब 1.5 से 2.0 लाख करोड़ रुपये सालाना रकम जुटाना अब सामान्य हो गया है। आईपीओ बाजार की यह दमदार तेजी बाजार में चली उठापटक, विदेशी निवेशकों द्वारा बिकवाली, कमजोर रुपया और यहां तक कि कुछ कमजोर आईपीओ जैसे नकारात्मक बातों पर भारी पड़ी है। फिलहाल तो प्राथमिक बाजार एक अजेय योद्धा की तरह हुंकार भरता नजर आ रहा है।
गोल्डमैन सैक्स के इंडिया फाइनैंसिंग ग्रुप के प्रमुख सुनील खेतान ने कहा,‘हमें लगता है कि विदेशी निवेशक भी 2026 में मजबूत घरेलू संस्थागत निवेश के साथ हो लेंगे जिससे भारत में आईपीओ के तहत बेचे गए शेयरों की तादाद (या मूल्य) पिछले दो वर्षों के रिकॉर्ड स्तर से अधिक हो जाएगी। वित्तीय सेवा, उपभोक्ता और तकनीक क्षेत्रों पर केंद्रित क्षेत्रों में कई अरब डॉलर के आईपीओ आएंगे।’
विश्लेषकों के मुताबिक देश में शेयर बाजार में निवेश के प्रति दिलचस्पी बढ़ने, लोगों की बचत बाजार में आने (सालाना लगभग 5 लाख करोड़ रुपये से अधिक) और भारत की तेज आर्थिक तरक्की में निवेशकों के भरोसे के दम पर देश का आईपीओ बाजार लगातार कुलांचे भर रहा है।
विभिन्न क्षेत्रों (नवीकरणीय ऊर्जा, वित्तीय सेवाएं, उपभोक्ता वस्तुएं, औद्योगिक विनिर्माण और तकनीक) की कंपनियों ने इस वर्ष निवेशकों का ध्यान अपनी तरफ खींचा है जिससे आईपीओ सौदों की व्यापकता और गहराई दोनों का पता चलता है।
निवेश बैंकिंग कंपनी जेएम फाइनैंशियल में प्रबंध निदेशक एवं इक्विटी कैपिटल मार्केट्स की प्रमुख नेहा अग्रवाल कहती हैं,‘2025 प्राथमिक बाजार के लिए एक शानदार वर्ष रहा है। आईपीओ में तेज हलचल के पीछे उद्यमशीलता, निवेशकों की ललक और संस्थागत स्तर पर उपलब्ध भरपूर नकदी प्रमुख कारण रहे हैं।’
अग्रवाल के अनुसार निवेशक अब अधिक समझदार हो गए हैं। उन्होंने कहा,‘वे अब विश्वसनीय संचालन व्यवस्था और लगातार विस्तार करने वाले कारोबारी ढांचे वाली कंपनियों का समर्थन करते हैं। अब ध्यान सूचीबद्धता के दिन मुनाफा कमाने के बजाय दीर्घकालिक धन सृजन पर अधिक केंद्रित हो रहा है।’
साल 2025 में विदेशी पोर्टफोलियो निवेशकों (एफपीआई) के बिकवाल बनने के बाद घरेलू संस्थागत निवेशकों (डीआईआई) ने डट कर मोर्चा संभाल लिया और बाजार में रकम झोंकनी शुरू कर दी।
फोनपे वेल्थ की शेयर ब्रोकिंग एवं निवेश इकाई शेयर डॉट मार्केट में बाजार विश्लेषक ओम घवलकर कहते हैं,‘आईपीओ बाजार में ताकत की मुख्य वजह घरेलू निवेशकों से आई भरपूर रकम है। वैश्विक स्तर पर चल रही उठापटक की परवाह किए बिना म्युचुअल फंड कंपनियों ने लगातार निवेश जारी रखा जिससे नए निर्गमों को अपने पांव टिकाने में कोई दिक्कत महसूस नहीं हुई।’
एसोसिएशन ऑफ म्युचुअल फंड्स ऑफ इंडिया (एम्फी) के आंकड़ों से पता चलता है कि इक्विटी म्युचुअल फंडों में 2025 के पहले 11 महीनों में 3.22 लाख करोड़ रुपये शुद्ध निवेश हुए। इनके साथ पेंशन और बीमा फंडों और सीधे खुदरा निवेश ने भी अपनी तरफ से कोई कसर नहीं छोड़ी।
जेपी मॉर्गन में इंडिया इक्विटी कैपिटल मार्केट्स के प्रमुख अभिनव भारती ने कहा,‘घरेलू संस्थागत निवेशक प्राथमिक और द्वितीयक दोनों बाजारों को स्थिरता देने वाले एक प्रमुख कारक रहे हैं। म्युचुअल फंडों के अलावा बीमा कंपनियां और पेंशन फंड अब पहले से कहीं अधिक बड़ी भूमिका निभा रहे हैं।’
सेंट्रम कैपिटल में पार्टनर (निवेश बैंकिंग) प्रांजल श्रीवास्तव का कहना है कि शेयर बाजार में बिकवाली करने के बावजूद विदेशी निवेशकों ने कुछ चुनिंदा आईपीओ में जमकर शिरकत की। यह बाजार में कदम रखने वाले निर्गमों में उनके भरोसे का स्पष्ट संकेत है।
पूंजी बाजार पर केंद्रित प्राइम डेटाबेस के मुताबिक इस वर्ष भारतीय प्रतिभूति और विनिमय बोर्ड (सेबी) के पास लगभग 250 मसौदा रेड हेरिंग प्रॉस्पेक्टस दाखिल किए गए। ये लगभग 3.4 लाख करोड़ रुपये से अधिक के थे जबकि, 2024 में 157 ऐसे दस्तावेज आए जो 2.8 लाख करोड़ रुपये मूल्य के थे। वर्ष 2024-25 में बाजार नियामक के पास आए मसौदा प्रस्ताव 2026 में एक मजबूत सिलसिला जारी रखने की बुनियाद तैयार कर गए हैं।
जेपी मॉर्गन के भारती कहते हैं, ‘नए जमाने की तकनीकी कंपनियां आईपीओ बाजार को अधिक रफ्तार दे रही हैं। ऐसी लगभग 20 स्टार्टअप इकाइयां अगले साल सूचीबद्ध होने की तैयारी में हैं।’
साल की शुरुआत मजबूत नहीं रही। प्राइम डेटाबेस के प्रबंध निदेशक प्रणव हल्दिया कहते हैं,‘2025 में मार्च और अप्रैल के दौरान आईपीओ से जुड़ी शायद ही किसी तरह की हलचल थी। 2024 के अंत से अमेरिकी शुल्कों की आशंका से मची अफरातफरी ने निवेशकों का उत्साह तोड़ दिया। मगर मई के बाद बाजार में चहल-पहल दिखनी शुरू हो गई।’
सबसे पहले छोटे निर्गमों ने बाजार में दस्तक दी जिसके बाद एक के बाद एक बड़े आईपीओ भी आने लगे। साल के मध्य तक उपभोग और वित्तीय क्षेत्र की बड़ी कंपनियां अपने निर्गम ले कर आईं जिससे 2025 की दूसरी छमाही में भारत का पूंजी बाजार काफी सक्रिय हो गया।
हल्दिया कहते हैं,‘यह पहला मौका है जब भारत में लगातार दो साल आईपीओ के लिहाज से धमाकेदार रहे हैं। पहले अक्सर जब किसी साल अधिक निर्गम आते थे तो अगला साल सुस्त रहता था। मगर अब यह पुराना सिलसिला टूट गया है।’
सेबी ने खुलासे, कंपनी संचालन नियमों और मूल्यांकन से जुड़े नियम सख्त बना दिए हैं। इससे केवल विश्वसनीय और ठोस कारोबारी बुनियाद वाली कंपनियां ही बाजार में दस्तक दे रही हैं। हल्दिया का कहना है,‘1990 के दशक और 2000 के दशक के शुरू में कमजोर और कम पारदर्शिता के साथ कारोबार करने वाली इकाइयों का दबदबा था। मगर अब आईपीओ की गुणवत्ता कहीं अधिक मजबूत है।’
बाजार में अब परिवार नियंत्रित व्यवसाय अपने कर्ज बोझ कम कर रहे हैं, स्टार्टअप इकाइयां निवेशकों को बाहर निकलने का विकल्प दे रही हैं और बहुराष्ट्रीय कंपनियां भारत में अपनी पैठ गहरी कर रही हैं। संस्थागत और खुदरा दोनों निवेशकों के पास अब मूल्यांकन से जुड़े नियम सख्त होने के बावजूद अधिक विविध विकल्प हैं।
आईपीओ के जरिये कंपनियों ने भारी भरकम रकम जरूर जुटाई मगर इनसे निवेशकों का मुनाफा मिला-जुला ही रहा। मीशो, एलजी इलेक्ट्रॉनिक्स और ग्रो जैसी कुछ नामी कंपनियों ने सूचीबद्ध होने के बाद मजबूत प्रदर्शन किया जबकि मझोले आकार की कई कंपनियों का कारोबार निर्गम मूल्य से नीचे रहा।
साल 2025 में निफ्टी50 अब तक 9.3 फीसदी ऊपर है। निफ्टी मिडकैप 100 में 5 फीसदी की तेजी आई, जबकि निफ्टी स्मॉलकैप100 में 8 फीसदी से अधिक की गिरावट दर्ज हुई है।
सेंट्रम के श्रीवास्तव कहते हैं,’छोटे और मध्यम आकार के शेयरों के लड़खड़ाने के बावजूद सूचीबद्धता से हुए लाभ ने निवेशकों का उत्साह कमजोर होने नहीं दिया।’ हालांकि, परिपक्व खुदरा निवेशक अब आईपीओ बाजार से इतर दूसरी जगह संभावनाएं तलाशना शुरू कर चुके हैं।
घवलकर कहते हैं,‘निवेशकों के मन में आईपीओ बाजार में तेजी का लाभ लेने से चूक जाने का डर भी कहीं न कहीं था। इस वजह से भी निर्गमों को कहीं अधिक आवदेन मिले। लेकिन अगले साल लॉक-इन एक्सपायरी तरलता को कसौटी पर रख सकती है। यह समझना जरूरी होगा कि कोई कंपनी आखिर किस मकसद से रकम जुटा रही है।’
कोई एक ताकत जो भारत के आईपीओ बाजार को नए मुकाम तक पहुंच रही है तो वह है खुदरा निवेशकों की भागादारी। भारतीय परिवारों में से लगभग 15 से 20 फीसदी अब शेयर बाजार या म्युचुअल फंडों में निवेश कर रहे हैं। हालांकि, यह अनुपात अब भी ब्राजील के 40-45 फीसदी या अमेरिका के 50-60 फीसदी से बहुत कम है मगर इसका यह भी मतलब है कि आने वाले समय में गुंजाइश की कमी नहीं है।
साल 2019 से आईपीओ में खुदरा भागीदारी दोगुनी हो गई है जिसमें नामी एवं बड़ी कंपनियों के निर्गमों के लिए आसानी से दस लाख तक आवेदन आ रहे हैं। यूनिफाइड पेमेंट्स इंटरफेस (यूपीआई) और डिजिटल ट्रेडिंग प्लेटफॉर्म की मदद से लोग अपनी बचत निवेश कर रहे हैं जिससे एक मजबूत सिलसिला शुरू हो गया है। आईपीओ की लिस्टिंग के बाद निकलने वाले शुरुआती निवेशकों के हाथ ठीक-ठाक रकम मिल जाती है जिसे वे स्टार्टअप इकाइयों में निवेश करते हैं।
इसमें कोई शक नहीं कि आईपीओ बाजार में तेजी का सिलसिला बढ़ता ही नजर आ रहा है मगर विशेषज्ञ निवेशकों को जोश में होश गंवाने से भी आगाह कर रहे हैं। उनके अनुसार निवेशकों को निवेश से जुड़ी बुनियादी बातों और सिद्धांतों से नहीं भटकना चाहिए। हल्दिया कहते हैं,‘अगर मूल्यांकन अनुशासन और आईपीओ लाने वाली कंपनियों की गुणवत्ता बरकरार रही तो अगले पांच साल भारत के प्राथमिक बाजार के लिए स्वर्णिम काल साबित हो सकते हैं।’