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India’s TB cure rate: टीबी उन्मूलन की समयसीमा करीब मगर बीमारू राज्य लड़खड़ाने लगे

भले ही तपेदिक (रोगियों की संख्या कम हो रही है लेकिन 2025 की समयसीमा पूरा करना मुश्किल हो सकता है।

Last Updated- March 29, 2024 | 10:10 PM IST
tuberculosis

India’s TB cure-rate: देश में जैसे-जैसे तपेदिक (टीबी) उन्मूलन की समयसीमा करीब आ रहा है ‘बीमारू’ राज्यों में ठीक होने की दर राष्ट्रीय आंकड़ों से पिछड़ने लगी है। इंडिया टीबी रिपोर्ट 2023 के अनुसार, भारत में टीबी के ठीक होने की दर 27.8 फीसदी है, जबकि 11 राज्य राष्ट्रीय औसत से पीछे चल रहे हैं। बिहार, मध्य प्रदेश, राजस्थान और उत्तर प्रदेश यानी ‘बीमारू’ राज्यों के अलावा महाराष्ट्र, असम, पंजाब और राष्ट्रीय राजधानी दिल्ली भी ऐसे राज्य हैं जो राष्ट्रीय आंकड़ों से पीछे चल रहे हैं।

बिहार में ठीक होने की दर सबसे कम 12.2 फीसदी है। उसके बाद दिल्ली में 19.6 फीसदी, मध्य प्रदेश एवं महाराष्ट्र में 21-21 फीसदी और उत्तर प्रदेश में 23 फीसदी है। टीबी के ठीक होने की दर पहचाने गए प्रति सैकड़ा मरीजों में से पूरी तरह से ठीक हो चुके मरीजों की संख्या है।

स्वास्थ्य एवं परिवार कल्याण मंत्रालय के अधीन केंद्रीय टीबी प्रभाग ने इस पर कोई टिप्पणी नहीं की है। केंद्रीय टीबी प्रभाग को ही राष्ट्रीय टीबी उन्मूलन की देखरेख का जिम्मा दिया गया है। स्वास्थ्य मंत्रालय के एक अधिकारी ने नाम नहीं प्रकाशित करने की शर्त पर कहा कि लंबी उपचार व्यवस्था और ग्रामीण इलाकों से मरीजों के पर्याप्त आंकड़े नहीं मिलने के कारण भी इन राज्यों में राष्ट्रीय आंकड़ों से अंतर संभव है।

लक्षद्वीप, पश्चिम बंगाल, सिक्किम, ओडिशा, तमिलनाडु, तेलंगाना, कर्नाटक, आंध्र प्रदेश, केरल और गुजरात उन 25 राज्यों में शामिल हैं जहां इलाज दर राष्ट्रीय औसत से अधिक है।

भारत ने वैश्विक एसडीजी लक्ष्य से पांच साल पहले ही साल 2025 तक टीबी उन्मूलन उन्मूलन का लक्ष्य रखा है। विश्व स्वास्थ्य संगठन के मुताबिक, वैश्विक महामारी कोविड-19 के बाद संक्रमण से होने वाली मौत का दूसरा बड़ा कारण टीबी है। दुनिया भर में साल 2022 में 1.1 करोड़ लोगों का टीबी उपचार जारी था, जबकि 10 लाख से अधिक लोगों ने इस संक्रामक बीमारी के कारण अपनी जान गंवाई थी।

दुनिया भर में 24 मार्च को रोग का कारण बनने वाले बैक्टीरिया की खोज के कारण विश्व टीबी दिवस के रूप में मनाया जाता है।

भारत में टीबी खत्म करने के लिए केंद्र सरकार ने तपेदिक के लिए राष्ट्रीय रणनीतिक योजना 2017-25 की शुरुआत की थी। इसके तहत सरकार ने कुछ वार्षिक लक्ष्य तय किए थे। पहले साल के तौर पर 2015 में टीबी के मरीज मिलने की दर (प्रति 1 लाख लोगों पर) घटाकर 36 से 158 के बीच करने, मृत्यु दर (प्रति 1 लाख लोगों पर) घटाकर 3 से 4 करने का लक्ष्य रखा गया था, ताकि साल 2025 तक किसी भी परिवार को टीबी की भयावह कीमत नहीं चुकानी पड़े।

साल 2023 के लिए मरीज मिलने की दर 49 से 185 के बीच और मृत्यु दर 5 से 7 के बीच करने की सीमा निर्धारित की गई थी। वैश्विक टीबी रिपोर्ट 2023 के अनुसार, साल 2022 के अंत तक भारत में प्रति एक लाख आबादी पर टीबी के 199 मरीज थे और मृत्यु दर 24 थी।

फोर्टिस अस्पताल, बेंगलूरु के पल्मोनोलॉजी विभाग के सीनियर कंसल्टेंट आनंद पडेगल कहते हैं कि साल 2025 तक बीमारी को खत्म करने का लक्ष्य महत्त्वाकांक्षी हो सकता है, लेकिन मरीजों की ठीक होने की संख्या में सुधार हुआ है। उन्होंने कहा, ‘उपचार की सफलता दर 85 फीसदी के राष्ट्रीय लक्ष्य के करीब पहुंच रही है।’

दुनिया भर में टीबी के कुल मामलों और मौतों में भारत अभी भी तीसरे स्थान पर है। दो दशक पहले तक मिलने वाले 34 लाख टीबी मरीजों की तुलना में साल 2022 में भारत में 28 लाख टीबी के मरीज मिले थे। चीन, फिलिपींस, पाकिस्तान अन्य देश हैं जहां साल 2022 में 10 लाख से कम टीबी मरीज मिले।

साल 2022 में भारत में 3,42,000 लोगों ने टीबी के कारण अपनी जान गंवाई। पडेगल का कहना है कि एनटीईपी और पीएम-निक्षय जैसे कार्यक्रमों के कारण ही टीबी के मरीजों की संख्या और मृत्यु दर में गिरावट आई है। उन्होंने कहा, ‘ये पहल शीघ्र इलाज पर केंद्रित हैं। इसमें यह भी सुनिश्चित करना है कि मरीजों का पूरा उपचार किया जाए और पोषण संबंधी सहायता भी दी जाएगा ताकि ठीक होने की दर बढ़े और टीबी का प्रसार कम करने में भी मदद मिले।’

योजना अनिवार्य रूप से टीबी के मरीजों की जानकारी देने पर भी जोर देती है। इसकी अवहेलना को एक दंडनीय अपराध माना जाता है, जिसमें नोडल सार्वजनिक स्वास्थ्य प्राधिकरण अथवा अधिकारियों को टीबी मामलों की सूचना और उपचार संबंधी जानकारी देना शामिल है।

भारत में टीबी के मरीजों की कम होती संख्या का एक और महत्त्वपूर्ण कारण दवाइयों का आसानी से मिलना भी है।

दिल्ली के बीएलके-मैक्स सुपर स्पेशलिटी हॉस्पिटल के सीना एवं श्वसन रोग विभाग के प्रधान निदेशक और प्रमुख संदीप नायर ने कहा कि टीबी के इलाज के लिए जरूरी सभी प्राथमिक दवाइयां अब दूरस्थ इलाकों में भी आसानी से मिल जाती हैं। उन्होंने कहा, ‘बीडाक्विलिन जैसी महंगी दवाइयां सरकारी अस्पतालों में मौजूद हैं, जिससे मल्टी ड्रग रेसिस्टेंट (एमडीआर-टीबी) टीबी का उपचार किया जाता है।’

एमडीआर-टीबी काफी चिंता का विषय है, क्योंकि इसका बैक्टीरिया इस बीमारी के इलाज के लिए इस्तेमाल की जाने वाली दवाइयों के प्रति प्रतिरोध विकसित कर लेता है। इससे यह जानलेवा साबित हो जाता है। मगर नई दवाइयां तैयार की जा रही हैं।

गुरुग्राम के सीके बिड़ला अस्पताल के क्रिटिकल केयर ऐंड पल्मोनोलॉजी विभाग के प्रमुख कुलदीप कुमार ग्रोवर ने कहा कि फिलहाल कम से कम 16 नई दवाइयों का पहले और दूसरे चरण का नैदानिक परीक्षण चल रहा है। इसके अलावा अतिरिक्त 22 दवाइयां पूर्व नैदानिक चरणों में हैं।

उन्होंने कहा, ‘उपचार के छोटे तरीकों पर भी शोध जारी है। इससे संभावना है कि रोगी अनुपालन में सुधार होगा और दवा प्रतिरोध के जोखिम को भी कम किया जा सकेगा।’

First Published - March 29, 2024 | 10:10 PM IST

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