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जुबिन गर्ग: एक आवाज जिसने बंटे हुए असम को जोड़ा

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गायक जुबिन गर्ग के निधन पर असम में हर विचारधारा के लोग शोकग्रस्त; उनकी आवाज लोगों की उम्मीदों और बेचैनियों से जुड़ी थी

Last Updated- September 26, 2025 | 8:18 PM IST
Zubeen Garg
फोटो क्रेडिट: Facebook/Zubeen Garg

असम में गायक जुबिन गर्ग का असर इतना गहरा था कि विरोधी भी उनसे सुलह कर लेते थे।

तीन दशकों तक वे राज्य की सांस्कृतिक धड़कन बने रहे। उनके बिहू एल्बम हर घर में गूंजते और अप्रैल के उत्सव महीने में उनके शो हजारों दर्शकों से भर जाते। मंच पर वे अपनी असमिया रचनाओं के साथ हिंदी और अंग्रेजी हिट भी गाते, जिससे कभी-कभी अलगाववादी और परंपरावादी समूह नाराज होते। लेकिन धमकियां न उनकी बिंदास अदाओं को रोक पाईं और न ही उनकी लोकप्रियता को।

“उन्हें धमकी भरे कॉल आते, लेकिन देने वाले भी उनके फैन होते थे,” याद करते हैं गिटारवादक और उनके चचेरे भाई अटोनु गौतम। “गाली भी देते थे, प्यार भी।”

जनता का ‘जुबिन दा’

‘जुबिन दा’ कहे जाने वाले गर्ग को खांचे में बांधना असंभव था। 40 भाषाओं में लगभग 38,000 गीत गाने वाले इस कलाकार ने कभी असम से नाता नहीं तोड़ा।

19 सितंबर को सिंगापुर में 52 वर्ष की आयु में डूबने से हुई उनकी आकस्मिक मृत्यु ने पूरे असम को शोक में डुबो दिया। गुवाहाटी में उनके अंतिम यात्रा में लाखों लोग उमड़े। वहीं, उनका प्रिय गीत ‘मायाबिनी’, जिसे उन्होंने अपनी मृत्यु पर बजाने की इच्छा जताई थी, इन दिनों शोकाकुल जनता का सामूहिक गान बन गया है।

परंपरा और आधुनिकता के बीच पुल

पूर्व नौकरशाह स्वप्ननील बरुआ कहते हैं, “युवाओं की पीढ़ियां परंपरा और बदलती आधुनिकता के बीच उलझी थीं। जुबिन ने उनकी बेचैनियों और सपनों को आवाज दी। वे याद दिलाते थे कि संगीत वहां जोड़ सकता है जहां राजनीति बांटती है।”

1992 में लंबे बाल और फटी जीन्स पहने जब वे 19 साल की उम्र में आए, तो असमिया संगीत जगत हिल गया। उनका डेब्यू एल्बम ‘अनामिका’ रातों-रात हिट हुआ।

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विद्रोही स्वर

अलगाववाद, उग्रवाद और मानवाधिकार संकट के वर्षों में उनके गीत ‘पाखी मेली दिए’ और ‘शांति दिया’ असम की आकांक्षाओं और पीड़ा का प्रतिबिंब बने।

उन्होंने किसी विचारधारा की लाइन नहीं पकड़ी। मंच पर पीते, गालियां देते, ईश्वर-जाति से परे बात करते और पर्यावरण की रक्षा की अपील करते। 2016 में भाजपा के लिए प्रचार गीत गाने के बावजूद उन्होंने 2019 में नागरिकता संशोधन कानून (CAA) का कड़ा विरोध किया।

लोगों से जुड़ा सितारा

फिल्म समीक्षक उत्पल बोरपुजारी कहते हैं, “वे आम लोगों से सीधे जुड़े थे। चाय की दुकानों पर हवाई चप्पल और बरमूडा पहनकर घंटों बैठ जाते। लोग उन्हें अपना मानते।”

असम बाढ़ और कोविड के समय उनकी मदद, छात्रों की पढ़ाई और इलाज के लिए योगदान, और उभरते कलाकारों को मंच देना — इन सबने उन्हें ‘जनता का स्टार’ बना दिया।

असम का गर्व

उनके संगीत ने असमिया सिनेमा को भी नई पहचान दी। ‘मिशन चाइना’ (2017) राज्य की सबसे बड़ी हिट फिल्मों में रही। उनकी आखिरी फिल्म ‘रॉय रॉय बिनाले’, जिसमें वे एक अंधे गायक की भूमिका में हैं, अक्टूबर में रिलीज होगी।

उनकी हिंदी हिट्स में ‘या अली’ (गैंगस्टर) और ‘जाने क्या चाहे मन बावरा’ (प्यार के साइड इफेक्ट्स) शामिल हैं। लेकिन उन्होंने बॉलीवुड में टिकने के बजाय असम लौटना चुना — अपने सिद्धांत और घर के लिए।

बरुआ कहते हैं, “जहां उनके समकालीन मुंबई का रुख कर गए, जुबिन ने गुवाहाटी में रहना चुना। यह प्रांतीयता नहीं, सिद्धांत था।”

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First Published - September 26, 2025 | 8:18 PM IST

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