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नए नियमों से विश्वविद्यालयों को झटका

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Last Updated- December 15, 2022 | 4:54 AM IST

पार्थ मेहता (बदला हुआ नाम) ने अमेरिका के एक प्रमुख विश्वविद्यालय को अपने प्रवेश और पहले साल की फीस के रूप में 22,500 डॉलर का भुगतान नहीं करने का फैसला किया है। मेहता को लगता है कि जब तक उन्हें अपना छात्र वीजा नहीं मिल जाता और यह पता नहीं चल जाता कि वह अमेरिका में ठहर और अध्ययन कर पाएंगे या नहीं, तब तक फीस का भुगतान करने का कोई मतलब नहीं है। भारत में विदेशी शिक्षा सलाहकारों का कहना है कि ऐसे कई विद्यार्थी, जो अमेरिकी विश्वविद्यालयों में प्रवेश ले चुके हैं और अगले सत्र में शामिल होना है, उन्हें भी यही लग रहा है। विद्यार्थी शुल्क भुगतान न करने का यह इरादा अमेरिकी सरकार के उस आदेश के मद्देनजर बना रहे हैं जिसमें कहा गया है कि ऐसे विद्यार्थियों को देश छोड़कर जाना होगा जो केवल ऑनलाइन कक्षाओं में भाग ले रहे हैं। विशेषज्ञों का मानना ​​है कि अमेरिकी विश्वविद्यालयों को राजस्व में तत्काल रूप से प्रति विदेशी छात्र लगभग 20,000 डॉलर या 15 लाख रुपये का नुकसान होगा। सामान्यत: छात्र वर्ष की इस अवधि में अपने वीजा के लिए आवेदन करना शुरू कर देते हैं और अपनी फीस की पहला किस्त का भी भुगतान कर देते हैं।
विदेशी शिक्षा सलाहकार कंपनी ईएसएस ग्लोबल के निदेशक रोहित सेठी ने कहा कि छात्र दुविधा में हैं और वे आशंकित हैं। अगर विश्वविद्यालय उन्हें ऑनलाइन अध्ययन करने के लिए कह रहे हैं, तो छात्र सवाल कर रहे हैं कि वे अभी भुगतान क्यों करें। इसके अलावा ऐसे कई छात्र जो प्रवेश के लिए आवेदन कर चुके हैं, अब आव्रजन और सीमा शुल्क प्रवर्तन (आईसीई) के आदेश के बाद अमेरिका जाने को लेकर अनिश्चितता की स्थिति में हैं। एमआईटी और हार्वर्ड जैसे अमेरिका के शीर्ष विश्वविद्यालय पहले ही आईसीई के आदेश के संबंध में अमेरिकी सरकार पर मुकदमा दायर कर चुके हैं। एमआईटी ने एकईमेल के जवाब में बिजनेस स्टैंडर्ड को बताया कि सोमवार को आईसीई के एक प्रभाग ने घोषणा की थी कि वह इस बार एफ-1 वीजा के आधार पर अंतरराष्ट्रीय विद्यार्थियों को किसी संपूर्ण ऑनलाइन पाठ्यक्रम की अनुमति नहीं देगा। प्रतिक्रिया स्वरूप एमआईटी और हार्वर्ड ने संयुक्त रूप से मैसाचुसेट्स कीसंघीय अदालत में आईसीई और यूएस डिपार्टमेंट ऑफ होमलैंड सिक्योरिटी (डीएचएस) के खिलाफ मुकदमा दायर किया है। इस मुकदमे में हमने अदालत से मांग की है कि आईसीई और डीएचएस को नया दिशानिर्देश लागू करने से रोका जाए और इसे गैरकानूनी घोषित किया जाए।
यूनिवर्सिटी ऑफ कैलिफोर्निया, बर्कले जैसे अन्य विश्वविद्यालय भी कानूनी कदम उठाने की योजना बना रहे हैं। ऐसे समय में जब अमेरिकी विश्वविद्यालयों के सरकारी वित्त पोषण और कुल नामांकन पर असर पड़ा है, तब ऐसे मामलों में विदेशी छात्रों को देश छोडऩे के लिए कहा जाना काफी मायने रखता है जिनमें उनकी कक्षाएं पूरी तरह से ऑनलाइन हों। एक ओर जहां व्यक्तिगत रूप से कक्षाएं लेने में सार्वजनिक स्वास्थ्य का जोखिम है, वहीं दूसरी ओर आशंकित विदेशी छात्र प्रवेश के संबंध में फिर से विचार कर रहे हैं।
विश्वविद्यालय ने बिजनेस स्टैंडर्ड को बताया कि बजट अनुमानों से लगता है कि बर्कले के राजस्व पर 24 से 34 करोड़ डॉलर का नुकसान होगा जो सरकार के वित्त पोषण, नामांकन में गिरावट और अन्य कारकों पर निर्भर करेगा। ईएसएस ग्लोबल के सेठी ने बताया कि इस अनिश्चितता के कारण छात्र 200 से 300 डॉलर के आवेदन शुल्क के अलावा कोई पैसा देने को तैयार नहीं हैं। अगर विद्यार्थी अपने अध्ययन स्थलों में परिवर्तन कर लेते हैं, तो मुझे हैरानी नहीं होगी।
विदेश में अध्ययन करने वालों के लिए सबसे बड़े नेटवर्क में शुमार यॉकेट के सह-संस्थापक और उच्च शिक्षा विशेष सुमित जैन ने कहा कि अमेरिकी विश्वविद्यालयों पर तत्काल 15 लाख रुपये का लागत प्रभाव पड़ सकता है। इतनी बड़ी संख्या में विदेशी छात्रों को स्थानांतरित करना लॉजिस्टिक रूप से संभव नहीं है। इसके अलावा छात्र उन विश्वविद्यालयों में स्थानांतरण चाहेंगे जो मिश्रित और हाइब्रिड कक्षाओं की पेशकश कर रहे हैं या जो परिसर खोल रहे हैं।
जैन ने कहा कि अमेरिका में अंतरराष्ट्रीय छात्रों का बाजार मोटे तौर पर 40 अरब डॉलर का है। विदेशी छात्र विश्वविद्यालयों के राजस्व का एक प्रमुख स्रोत होते हैं और अंतरराष्ट्रीय छात्रों की फीस घरेलू छात्रों की तुलना में आम तौर पर दोगुनी होती है। भारतीय छात्र अमेरिका में अध्ययन करने के लिए सामान्यत:  30 से 40 लाख रुपये देते हैं। विदेशी छात्रों में चीन और भारत का बड़ा हिस्सा शामिल रहता है। ओपन डोर रिपोर्ट के अनुसार हर साल 2,00,000 भारतीय छात्र अमेरिका पहुंचते हैं। एमआईटी में स्नातक और स्नातकोत्तर कार्यक्रमों में भारतीय छात्रों की हिस्सेदारी क्रमश : चार प्रतिशत और 10 प्रतिशत रहती है, जबकि यूसी बर्कले में कुल छात्रों की संख्या का 10 प्रतिशत हिस्सा भारतीय छात्रों का होता है। चीन के बाद इनकी संख्या दूसरे स्थान पर आती है। अमेरिकी विश्वविद्यालय अब विदेशी छात्रों से संपर्क कर रहे हैं और प्रवेश बनाए रखने के लिए उन्हें शुल्क छूट प्रदान कर रहे हैं। लेकिन संभवत: यह पर्याप्त न हो। सलाहकारों का कहना है कि ब्रिटेन, ऑस्ट्रेलिया, न्यूजीलैंड और कनाडा जैसे अन्य विदेशी शिक्षा गंतव्य छात्रों को रहने और ऑनलाइन कक्षाएं करने की अनुमति दे रहे हैं। यह बात अमेरिकी विश्वविद्यालयों के खिलाफ जा सकती है।

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First Published - July 13, 2020 | 11:48 PM IST

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