केंद्र सरकार ने 1 से 8 तक के विद्यार्थियों के लिए मध्याह्न भोजन व्यवस्था के तहत खाना बनाने पर आने वाली लागत में केंद्र का हिस्सा लाभार्थियों के बैंक खातों में हस्तांतरित करने का फैसला किया है। इसे उनके बैंक खातों में एकमुश्त कोविड राहत के रूप में भेजा जाएगा।
तमाम सरकारी व सरकार की ओर से वित्तपोषित विद्यालय महामारी के कारण कुछ महीनों से बंद हैं, जिसकी वजह से बच्चों को मध्याह्न भोजन नहीं मिल पाया, जो उन्हें एमडीएम योजना के तहत दिया जाता है। एक आधिकारिक बयान में कहा गया है, ‘इस फैसले से बच्चों में पोषण का स्तर बनाने में मदद मिलेगी और महामारी के चुनौतीपूर्ण दौर में बच्चों में रोग प्रतिरोधक क्षमता बन सकेगी।’
आधिकारिक बयान में कहा गया है कि करीब 11.8 करोड़ बच्चे एकमुश्त राहत पाने के पात्र होंगे और इससे सरकार पर 1,200 करोड़ रुपये लागत आएगी।
बहरहाल सामाजिक कार्यकर्ताओं का कहना है कि हस्तांतरित की जाने वाली राशि बहुत मामूली है और मौजूदा दर पर एकमुश्त हस्तांतरण महज 100 रुपये प्रति बच्चा होगा।
विद्यार्थियों के लिए ताजा भोजन बनाने पर जो लागत आती है, वह गेहूं, चावल पर आने वाले खर्च से अतिरिक्त है। गेहूं और चावल राष्ट्रीय खाद्य सुरक्षा अधिनियम (एनएफएसए) के तहत सस्ती दरों पर मुहैया कराया जाता है।
एमडीएम योजना के तहत खाना बनाने की लागत केंद्र व राज्य सरकार 60:40 के अनुपात में साझा करती हैं। वहीं जम्मू कश्मीर को छोड़कर पूर्वोत्तर भारत और केंद्र शासित प्रदेशों में यह अनुपात 90:10 का है।
अप्रैल में जारी हाल की अधिसूचना के मुताबिक प्रति बच्चा खाना बनाने की प्रतिदिन की लागत प्राथमिक कक्षा में 4.97 रुपये और उससे माध्यमिक कक्षा में 7.45 रुपये है।
राइट टु फूड अभियान की प्रमुख सदस्य और शिक्षाविद दीपा सिन्हा ने बिजनेस स्टैंडर्ड से कहा, ‘यह अच्छा कदम है, लेकिन एकमुश्त राहत के हिसाब से यह राशि बहुत मामूली है।’