अमेरिका और इजरायल की तरफ से ईरान पर पहले मिसाइल हमले के बस एक घंटे बाद ही राष्ट्रपति डॉनल्ड ट्रंप ने एक वीडियो में ईरानी लोगों से अपील की। उन्होंने कहा कि अब वक्त आ गया है जब तुम अपना भविष्य खुद संभालो। ये मौका है काम करने का, इसे मत जाने दो। ये बातें सुनने में आसान लगती हैं, लेकिन हकीकत में ईरान की मौजूदा सरकार को पूरी तरह गिराना इतना आसान नहीं है। हां यह सच है कि वहां की सरकार के प्रति कई लोगों में गुस्सा है, हमलों से उसके बड़े नेता मारे गए या गायब हैं, और अमेरिका का समर्थन भी मिल रहा है। फिर भी, इतिहास बताता है कि ऐसे बदलाव मुश्किल होते हैं।
अमेरिका की ‘रिजीम’ चेंज की कोशिशों का पुराना रिकॉर्ड है। 1960-70 के दशक में वियतनाम, 1989 में पनामा, 1980 में निकारागुआ, 9/11 के बाद इराक और अफगानिस्तान और हाल ही में वेनेजुएला में अमेरिका ऐसा कर चुका है। खुद ईरान में 1953 में CIA ने चुने हुए नेता को हटाकर शाह मोहम्मद रेजा पहलवी को ताकत दी थी। लेकिन 1979 की इस्लामिक क्रांति में शाह को उखाड़ फेंका गया। ऐसे में, अमेरिका की अच्छी नीयत से शुरू होने वाले बदलाव अक्सर गृहयुद्ध, मौतें और अराजकता में बदल जाते हैं।
ट्रंप खुद 2016 में कह चुके हैं कि ‘रिजीम’ चेंज और नेशन-बिल्डिंग की पॉलिसी फेल हो चुकी है। 2025 में सऊदी अरब में दिए स्पीच में उन्होंने अफगानिस्तान और इराक के प्रयासों को बर्बादी बताया। अब सवाल ये है कि क्या अमेरिका ईरान में क्या होने वाला है, ये समझता भी है?
ईरान की अर्थव्यवस्था बर्बाद हो चुकी है। जनवरी में विरोध प्रदर्शनों पर सख्त कार्रवाई हुई, जिसमें हजारों लोग मारे गए और दसियों हजार गिरफ्तार। लेकिन असंतोष अभी भी है। ईरान के बड़े सैन्य सहयोगी जैसे गाजा में हमास, लेबनान में हिजबुल्लाह और सीरिया में असद सरकार कमजोर हो गए या खत्म। रविवार सुबह ईरानी मीडिया ने पुष्टि की कि इजरायल और अमेरिका ने सुप्रीम लीडर अयातुल्लाह अली खामेनी को मार दिया।
अमेरिका ने हमले के बाद का प्लान साफ नहीं किया है कि वो पूरी सरकार गिराना नहीं चाहता, बल्कि वेनेजुएला की तरह कुछ लोग सरकार में ही रहें जो अमेरिका के साथ काम करें। वाशिंगटन के थिंक टैंक फाउंडेशन फॉर डिफेंस ऑफ डेमोक्रेसीज के एग्जीक्यूटिव डायरेक्टर जोनाथन शैंजर कहते हैं कि अभी बहुत कुछ होना बाकी है। ‘रिजीम’ को लगना चाहिए कि उसका बचना मुश्किल है, तभी वो अमेरिका से बात करेगी। लेकिन ईरान में नेता विचारधारा और धर्म से मजबूती से जुड़े हैं, इसलिए ये आसान नहीं। शैंजर का मानना है कि सच्चे विश्वासी कभी नहीं पलटेंगे, बस व्यावहारिक लोग ही कुछ कर सकते हैं।
स्कॉटलैंड की यूनिवर्सिटी ऑफ सेंट एंड्र्यूज के स्ट्रैटेजिक स्टडीज के प्रोफेसर फिलिप्स ओ’ब्रायन कहते हैं कि अभी पता नहीं चलेगा कि तेहरान में राजनीतिक हवाएं कैसे बदल रही हैं। एयर पावर से लीडरशिप को नुकसान पहुंचाया जा सकता है, लेकिन नई व्यवस्था की गारंटी नहीं। अगले नेता भी दमनकारी हो सकते हैं या लोगों की नजर में अमेरिका के पिट्ठू लग सकते हैं। ‘रिजीम’ के अंदर लोग एक-दूसरे के खिलाफ जाते हैं या नहीं, ये देखना बाकी है।
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अमेरिका का लैटिन अमेरिका में हस्तक्षेप का इतिहास बहुत पुराना है। 200 साल पहले राष्ट्रपति जेम्स मुनरो ने मोनरो डॉक्ट्रिन बनाया, जो यूरोपीय देशों को क्षेत्र से दूर रखने के लिए था। लेकिन 20वीं सदी में ये कूप, हमले और दखल का बहाना बन गया। सेंट्रल अमेरिका में तख्तापलट से लेकर 1961 में क्यूबा के बे ऑफ पिग्स इनवेजन तक। इतिहासकार कहते हैं कि ऐसे दखल से हिंसा, मौतें और मानवाधिकार उल्लंघन बढ़े।
चैथम हाउस के लैटिन अमेरिका सीनियर फेलो क्रिस्टोफर सबातिनी बताते हैं कि अमेरिकी दखल से लंबे समय तक लोकतंत्र स्थिर नहीं रहा। ग्वाटेमाला में 1950 के दखल से 40 साल का गृहयुद्ध चला, जिसमें दो लाख से ज्यादा लोग मारे गए। निकारागुआ में 1980 में सैंडिनिस्टा सरकार के खिलाफ कोंट्रा विद्रोहियों को समर्थन दिया, जिससे अर्थव्यवस्था तबाह हुई, हजारों मौतें हुईं और राजनीतिक विभाजन बढ़ा। कोल्ड वॉर के बाद बड़े पैमाने का दखल कम हुआ, लेकिन ट्रंप ने इसे फिर से जिंदा कर दिया।
पिछले साल से ट्रंप ने कैरिबियन में ड्रग ट्रैफिकर्स पर बोट स्ट्राइक्स किए, वेनेजुएला के तेल निर्यात पर नौसेना ब्लॉकेड लगाया, और होंडुरास व अर्जेंटीना के चुनावों में दखल दिया। फिर 3 जनवरी को अमेरिकी फोर्सेस ने वेनेजुएला के तानाशाह निकोलस मादुरो को पकड़ लिया और ड्रग्स व हथियारों के आरोप में अमेरिका ले आए। काराकास में क्या हुआ, वो ईरान के लिए संकेत हो सकता है।
कई लोग सोचते थे कि अमेरिका विपक्षी नेता मारिया कोरिना माचाडो को सपोर्ट करेगा, जो लंबे समय से प्रतिरोध का चेहरा हैं। लेकिन वाशिंगटन ने उसे साइडलाइन कर दिया और मादुरो की सेकंड-इन-कमांड प्रेसिडेंट डेल्सी रोड्रिगेज के साथ काम करने को तैयार दिखा। शैंजर कहते हैं कि वेनेजुएला में जो हुआ, वो ‘रिजीम’ चेंज नहीं कह सकते। ‘रिजीम’ अभी भी है, बस एक आदमी गायब है।
ईरान जैसे देश में जहां नेता मजबूत वैचारिक बंधन से जुड़े हैं, बदलाव लाना कठिन है। अमेरिका को ‘रिजीम’ के उन हिस्सों तक पहुंच बनानी होगी जो व्यावहारिक हैं, न कि कट्टर। लेकिन ये अभी अनिश्चित है। इतिहास से सीखते हुए देखें तो ऐसे प्रयास अक्सर उल्टे पड़ते हैं। लैटिन अमेरिका के उदाहरण बताते हैं कि दखल से स्थिरता नहीं आती, बल्कि लंबी अराजकता फैलती है।
ट्रंप की पुरानी बातें याद करें, जहां उन्होंने ऐसे हस्तक्षेपों को जटिल समाजों में गलत कदम बताया था। अब ईरान में क्या होगा, ये देखना बाकी है, लेकिन इतिहास की मिसालें सावधान रहने को कहती हैं।
एक्सपर्ट्स का मानना है कि एयर स्ट्राइक्स से कमजोरी आ सकती है, लेकिन नई सत्ता की गारंटी नहीं। वेनेजुएला की तरह आंशिक बदलाव हो सकता है, जहां पूरी व्यवस्था नहीं बदलती। लेकिन ईरान की स्थिति अलग है, जहां धर्म और विचारधारा सबकुछ तय करती है।
(एजेंसी इनपुट के साथ)