तकनीकी नवाचार विकास और पर्यावरण की दृष्टि से टिकाऊ वृद्धि के बीच की खाई को पाटने में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभा सकते हैं, ताकि आने वाली पीढ़ियों को नुकसान न पहुंचे। यह बात विशेषज्ञों ने ‘बिज़नेस स्टैंडर्ड समृद्धि 2025’ के दौरान लखनऊ में आयोजित ‘अधोसंरचना और पारिस्थितिकी संतुलन’ विषय पर आयोजित पैनल परिचर्चा में कही।
परिचर्चा में पैनलिस्ट्स ने यह स्वीकार किया कि प्रदूषण औद्योगिक और अधोसंरचना विकास का अनिवार्य हिस्सा है। उन्होंने कहा कि भारतीय उद्योग जगत धीरे-धीरे लेकिन यकीनी ढंग से केंद्र और राज्य सरकारों की सर्कुलर इकनॉमी की दृष्टि के अनुरूप हो रहा है। उत्तर प्रदेश पॉवर ट्रांसमिशन कॉर्पोरेशन लिमिटेड के प्रबंध निदेशक मयूर माहेश्वरी ने कहा कि सरकार ने उद्योग के लिए एक सर्कुलर इकनॉमी रोडमैप की परिकल्पना की है जो सार्वजनिक और निजी क्षेत्र की इकाइयों को एक साथ लाता है। उन्होंने कहा कि सर्कुलर इकनॉमी जहां प्रदूषण नियंत्रण और पर्यावरण संरक्षण के लिए जरूरी है वहीं यह निजी क्षेत्र की कंपनियों के लिए भी आकर्षक अवसर मुहैया कराती है।
उन्होंने कहा, ‘उदाहरण के लिए, बायोमास पेलेट्स का उपयोग कोयला-आधारित ताप बिजली घरों में किया जाता है, जिनमें पराली जलाने की घटना को कम करने की क्षमता होती है, विशेषकर राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र (एनसीआर) में।’ उन्होंने कहा कि यहां तक कि नगरपालिका के ठोस कचरे का भी ईंधन के रूप में उपयोग किया जा रहा है, यद्यपि वर्तमान में इसकी प्रगति अपेक्षाकृत धीमी है। माहेश्वरी ने कहा, ‘कानपुर ताप विद्युत संयंत्र में हम शीतलन टावरों के लिए 40 एमएलडी उपचारित नगरपालिका सीवेज जल का उपयोग कर रहे हैं।’
बिजली उत्पादन कंपनियां भारतीय राष्ट्रीय राजमार्ग प्राधिकरण यानी एनएचएआई के साथ फ्लाई एश की आपूर्ति को लेकर करीबी से काम कर रही हैं। इसका इस्तेमाल सड़क बनाने में किया जाता है। माहेश्वरी ने कहा कि सभी अंशधारकों के बीच अब यह समझ बन चुकी है कि पर्यावरण संरक्षण और वृद्धि तथा विकास एक दूसरे के पूरक नहीं हो सकते बल्कि इन्हें परस्पर एक दूसरे का सहायक होना होगा। उन्होंने कहा कि अधोसंरचना परियोजनाओं को पर्यावरण की दृष्टि से टिकाऊ बनाने की अनेक तकनीक उपलब्ध हैं लेकिन बदलाव तथा उन्हें अपनाने की गति अपेक्षाकृत धीमी है।
माहेश्वरी ने कहा, ‘हमें इस परिवर्तन की प्रक्रिया को तेज करना होगा, जिसके लिए उद्योगपतियों को बड़े पैमाने पर आगे आना होगा और तकनीकी साझेदारों को शामिल करना होगा तथा इसे एक बड़े निवेश अवसर के रूप में देखना होगा।’
उत्तर प्रदेश प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड (यूपीपीसीबी) के चेयरमैन रवींद्र प्रताप सिंह ने कहा कि जहां उद्योग और विकास अहम हैं, वहीं प्रदूषण, खासकर जल प्रदूषण को नियंत्रित करना भी जरूरी है और इसकी तकनीक मौजूद है। उन्होंने कहा, ‘पहले चीनी उद्योग को सबसे अधिक प्रदूषण फैलाने वाला माना जाता था, लेकिन अब चीनी क्षेत्र का 80-90 फीसदी सर्कुलर इकनॉमी की अवधारणा की ओर चला गया है। अधिकांश चीनी मिलों के अपने निजी बिजली संयंत्र हैं।’
सर्कुलर इकनॉमी एक आर्थिक मॉडल है जिसका उद्देश्य अपशिष्ट और प्रदूषण को समाप्त करना है, जिसमें उत्पादों और सामग्रियों को पुनः उपयोग की प्रक्रिया में शामिल किया जाता है। उन्होंने कहा कि इसी प्रकार जो उद्योग जल प्रदूषण कर रहे हैं, उनके लिए अनिवार्य रूप से ईटीपी (अपशिष्ट उपचार संयंत्र) और एसटीपी (सीवेज उपचार संयंत्र) होना चाहिए ताकि जल प्रदूषण को नियंत्रित किया जा सके। सिंह ने कहा, ‘धीरे-धीरे हम यह भी देख रहे हैं कि अधिक से अधिक उद्योग स्वयं अपने परिसरों में ऐसे संयंत्र स्थापित करने के लिए आगे आ रहे हैं, क्योंकि वे भी पर्यावरण के प्रति जागरूक हो रहे हैं।’
इंडो अमेरिकन चैंबर ऑफ कॉमर्स, उत्तर प्रदेश समन्वय समिति के अध्यक्ष मुकेश बहादुर सिंह ने याद दिलाया कि प्रयागराज महाकुंभ 2025 में 50 करोड़ से अधिक श्रद्धालु आए, फिर भी कोई बीमारी नहीं फैली क्योंकि उचित उपाय लागू किए गए थे। उन्होंने कहा, ‘विकास की प्रक्रिया को रोका नहीं जा सकता, लेकिन लक्षित कदमों से पर्यावरणीय क्षति को न्यूनतम किया जा सकता है और प्रदूषण को नियंत्रित किया जा सकता है।’
यूनियन बैंक ऑफ इंडिया के महाप्रबंधक राजेश कुमार ने कहा कि बैंक बुनियादी ढांचा परियोजनाओं को उदार ऋण प्रदान कर रहा है और हरित परियोजनाओं को बढ़ावा देने के लिए ब्याज सब्सिडी भी दे रहा है। उन्होंने कहा कि बीमा उत्पादों के साथ विकास कंपनियों को पर्यावरणीय रूप से टिकाऊ परियोजनाओं और उद्योगों को अपनाने के लिए प्रोत्साहित करने में बड़ी भूमिका निभा सकता है।
कुमार ने कहा कि उनके बैंक ने अकेले पिछले डेढ़ साल में 700 मेगावाट से अधिक रूफटॉप सौर परियोजनाओं को फंड किया है। उन्होंने कहा कि बुनियादी ढांचा सड़कों के निर्माण से जुड़ा है और उनके बैंक का उत्तर प्रदेश में ऐसी परियोजनाओं में पर्याप्त निवेश है, लेकिन जब हर कोई प्रदूषण की बात कर रहा है तो यह भी याद रखना चाहिए कि एक बार सड़क बन जाने पर वाहनों से होने वाला प्रदूषण काफी हद तक कम हो जाता है।
दिल्ली में निर्मित एक अंडरपास का उदाहरण देते हुए उन्होंने कहा कि अध्ययनों से पता चलता है कि यह न केवल लोगों के लिए आवागमन को आसान बनाता है बल्कि ईंधन की खपत और प्रदूषण में भी उल्लेखनीय कमी लाता है।
कारोबारी रजत मोहन पाठक ने कहा कि प्रदूषण विकास का एक उप-उत्पाद है, और औद्योगिक इकाइयों को पर्यावरणीय क्षति को कम करने के लिए उपचार संयंत्र स्थापित करने की सुविधा दी जानी चाहिए।