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कृषि शोध: 1 रुपये निवेश में 13.85 का मिलता है रिटर्न, मगर 2012 से 2022 के बीच घटा रिसर्च पर खर्च

व्यापक कृषि और इससे जुड़ी गतिविधियों के बारे में पेपर में कहा गया है कि कृषि संबंधी निचले स्तर की गतिविधियों में निवेश पर मिलने वाले रिटर्न में भारी भिन्नता पाई गई है।

Last Updated- May 08, 2024 | 11:31 PM IST
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कृषि में शोध पर प्रत्येक रुपये के खर्च से 13.85 रुपये का रिटर्न मिलता है। यह कृषि से जुड़ी अन्य गतिविधियों से मिलने वाले लाभ से कहीं अधिक है। यह खुलासा हाल ही में जारी एक अध्ययन रिपोर्ट से हुआ है। गौर करने की बात यह कि साल 2012 से 2022 के बीच कृषि शोध पर निवेश लगातार घटा है।

यह वर्किंग पेपर भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद(आईसीएआर) के अंतर्गत संचालित राष्ट्रीय कृषि अर्थशास्त्र और नीति अनुसंधान संस्थान (एनआईएपी) में पिछले महीने छपा है।

इस रिपोर्ट में कहा गया है कि खाद्य एवं अन्य कृषि उत्पादों की बढ़ती मांग तथा कृषि भूमि के विस्तार की बहुत कम संभावनाओं को देखते हुए कृषि उत्पादों के उत्पादन को लेकर भविष्य की चुनौतियों के मद्देनजर यह जरूरी है कि कृषि शोध पर अधिक से अधिक खर्च किया जाए। यही नहीं, खेती से जुड़े अन्य क्षेत्रों से अधिक से अधिक आर्थिक, सामाजिक और पर्यावरणीय लाभ उठाने के लिए प्राथमिकता के आधार पर इनमें काम करने की जरूरत है।

शोध के बाद कृषि से जुड़ी अन्य गतिविधियों में सबसे अधिक एक रुपये के निवेश पर 7.40 रुपये का लाभ मिलता है। व्यापक कृषि और इससे जुड़ी गतिविधियों के बारे में पेपर में कहा गया है कि कृषि संबंधी निचले स्तर की गतिविधियों में निवेश पर मिलने वाले रिटर्न में भारी भिन्नता पाई गई है।

पशु विज्ञान शोध पर प्रत्येक एक रुपये के निवेश पर 20.81 रुपये का लाभ अर्जित होता है जबकि पूरे फसल विज्ञान क्षेत्र से केवल 11.69 रुपये का रिटर्न ही मिलता है। इसके अलावा इस अध्ययन में यह भी पाया गया है कि कृषि शोध पर निवेश में अलग-अलग जगहों पर भी अंतर दिखता है।

अध्ययन से पता चलता है कि वर्ष 2011-2020 के बीच देश का कुल 43 फीसदी बोआई क्षेत्रफल कवर करने वाले ओडिशा, राजस्थान, मध्य प्रदेश, पश्चिम बंगाल और उत्तर प्रदेश ने शोध कार्यों पर अपनी कृषि जीडीपी का 0.25 प्रतिशत फीसदी से भी कम खर्च किया।

दूसरी ओर, जम्मू-कश्मीर, हिमाचल प्रदेश, बिहार, उत्तराखंड, केरल और असम ने अपनी कृषि जीडीपी का 0.80 फीसदी से अधिक खर्च किया। अध्ययन से यह भी पता चला कि ज्यादातर शोध केवल फसलों से संबंधित ही रहा। पशुधन और प्राकृतिक संसाधनों पर अपेक्षाकृत कम खर्च किया गया। वैसे, दक्षिणी राज्यों में हर क्षेत्र में निवेश काफी संतुलित नजर आता है।

भारत में कृषि शोध और विकास पर निवेश मुख्यत: सार्वजनिक स्तर पर होता है। वर्ष 2011 से 2020 के बीच केंद्र और राज्य सरकारों ने शोध पर कुल निवेश का क्रमश: 33.8 फीसदी और 58.5 फीसदी योगदान किया, जबकि निजी क्षेत्र की भागीदारी केवल 8 फीसदी ही रही। हाल के वर्षों में यह बढ़ी जरूर है, परंतु अभी भी यह वैश्विक औसत से कम ही है। भारत ने वर्ष 2011 से 2020 के बीच शोध पर अपनी कृषि जीडीपी का 0.61 फीसदी खर्च किया है। यह वैश्विक औसत (0.93 फीसदी) का दो-तिहाई है।

कृषि के साथ विस्तारित सेवाओं पर कृषि जीडीपी का खर्च मात्र 0.16 फीसदी ही रहा। वर्ष 2020-21 में भारत ने शोध पर कृषि जीडीपी का 0.54 फीसदी खर्च किया जबकि विस्तारित गतिविधियों पर यह खर्च 0.11 फीसदी रहा।

पिछले चार दशक में भारत में कृषि शोध और विकास पर निजी एवं सार्वजनिक निवेश लगभग पांच गुना बढ़ा है। इस क्षेत्र में 2011 से 2020 के बीच वार्षिक वृद्धि 4.4 फीसदी दर्ज की गई। वर्ष 1981 से 1990 के बीच यह वृद्धि दर 6.4 फीसदी दर्ज की गई थी।

First Published - May 8, 2024 | 11:06 PM IST

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