facebookmetapixel
Advertisement
SBI का जून तिमाही में नेट प्रॉफिट 10% बढ़ा, ब्याज से कमाई ₹46,992 करोड़; लोन ग्रोथ भी तेज180 रुपये तक जाएगा Motherson का शेयर? 3 ब्रोकरेज को इन 5 वजहों से दिख रहा दमBajaj Finance Share Price: 5.5% की गिरावट से ₹33,500 करोड़ डूबे, RBI के इस प्रस्ताव से मचा हड़कंपAI ट्रेड में पिछड़ा भारत, लेकिन लंबी अवधि में निवेश का अच्छा मौका: रिपोर्टTrent Share Price: शेयर में अभी कमाई का मौका या महंगा वैल्यूएशन बनेगा मुसीबत? जानिए ब्रोकरेज की रायFusion Klassroom IPO Listing: GMP ने नहीं दिया था मुनाफे का संकेत, फिर भी 7% प्रीमियम पर लिस्ट हुआ शेयरUS Birthright Citizenship: ट्रंप का नया दांव, भारतीयों पर क्या होगा असर? H-1B और Visitor Visa का समझें पूरा ग​णितनए ग्राहक जोड़ने की तैयारी में Swiggy, Toing के जरिए Gen Z पर दांव; शेयर पर 54% तक का टारगेटMDR लागू हुआ तो UPI से लेनदेन होगा महंगा? ग्राहक या दुकानदार किस पर पड़ेगा बोझ, वित्त मंत्री ने क्या कहाLIC के नए कारोबार से मुनाफा 61% उछला, ब्रोकरेज बुलिश; शेयर में 42% तक तेजी की उम्मीद

डूबते कर्जों ने परेशान किया कई बैंकरों को

Advertisement
Last Updated- December 07, 2022 | 10:03 AM IST

महंगाई के चलते बने कठिन कारोबारी माहौल के कारण बैंकों की दुश्वारियां बढ़ गई हैं उनके लिए मौजूदा माहौल में काम करना बेहद मुश्किल हो चला है।


महंगाई बढ़ने और इस पर नकेल कसने के लिए रिजर्व बैंक द्वारा रेपो और सीआरआर दरों में बढ़ोत्तरी के कारण बैंकों के लिए पर्सनल लोन और क्रेडिट कार्डों के एनपीए में तब्दील होने की चिंता सताने लगी है। पिछले पांच सालों के दरम्यान क्रेडिट ग्रोथ में सबसे अहम भूमिका रिटेल लोनों की रही है।

बल्कि आलम यह है कि कंपनियों को भी दिए गए कुछ कर्जों के बैड लोन में तब्दील होने के डर से बैंक खासे चिंतित है।  यहां काबिलेगौर बात यह भी यह है कि बॉन्ड की कीमतों में भी गिरावट देखने को मिली है। इसका मतलब यह है कि बैंकों के द्वारा बॉन्डों के निवेश में कमी आई है और नतीजतन उन्हें अपने पहले तिमाही परिणामों इनके लिए प्रोविजन्स करने पड़ सकते हैं। लिहाजा बैंकों के सामने कुछ ऐसे मसले हैं जिनपर कदम लिए बिना काम नही बनने वाला है।

उन मसलों में सबसे अहम है कच्चे तेल की कीमतों में इजाफा होना क्योंकि इनकी कीमतों में इजाफों के कारण ही महंगाई दरों में इजाफा देखने को मिला है। इसके चलते बैंकों को एनपीए समेत मार्जिन पर दवाब बढ़ने के आसार साफ लग रहे हैं। एक बैंक प्रमुख का कहना है कि महंगाई के  बढ़ने के चलते हमने जमा दरों में इजाफा तो किया है ताकि एकत्रित स्रोतों को बेहतर रिटर्न प्रदान कि या जा सके। हालांकि इस बाबत एक बैंक प्रमुख एच एस सिनॉर का कहना है कि जमा दर तो बढ़ा दिए गए हैं लेकिन लेंडिंग दरों में इजाफा करना फिलहाल मुमकिन नही है।

सिनॉर आगे कहते हैं कि इंट्रेस्ट मार्जिन के चलते भी कुछ एडवांसेज एनपीए में तब्दील हो सकते हैं क्योंकि लागत में इजाफा हो रहा है जबकि मांग में खासी गिरावट। हालांकि भारतीय अर्थव्यवस्था के फंडामेंटल्स पर ज्यादातर बैंकरों का कहना है कि भारतीय अर्थव्यवस्था के फंडामेंटल्स मजबूत हैं और यह साल 2008-09 के दरम्यान आठ फीसदी की रफ्तार से अपनी विकास दर जारी रख सकता है।

इस बारे में सरकार के कदमों का जहां तक सवाल है तो सरकार ने पहले तो लेंडिंग दरों में इजाफे का विरोध किया लेकिन बाद में बेकाबू हो रही महंगाई को काबू में करने का भार आरबीआई को सौंप दिया और कहा कि महंगाई को काबू में करने के लिहाज से मौद्रिक नीति की समीक्षा पहला कदम है। आरबीआई ने बारबार लोगों को आगाह किया है कि वो अब बढ़ती वैश्विक कीमतों के साथ रहना सीख लें क्योंकि अभी कुछ महीनों तक इसका कोई हल नही है। यह ऊंची महंगाई दर का ही तकाजा था जिसने आरबीआई को रेपो रेट में इजाफे पर मजबूर किया।

रेपो रेट में कुल 75 बेसिस प्वाइंट का इजाफा किया गया है। जबकि सीआरआर दरों में अप्रैल से अब तक कुल 125 बेसिस प्वांइटों का इजाफा किया जा चुका है जो इस महीने के अंत तक कुल 8.75 फीसदी पर पहुंच जाने की उम्मीद है। लिहाजा बाजार को साफ लग रहा है कि मौद्रिक नीति को और सख्त किया जाएगा। गौरतलब है कि 29 जुलाई को भारतीय रिजर्व बैंक की मुद्रानीति की तिमाही समीक्षा का नतीजा आने वाला है। बैंकरों को आशा है कि इसके बाद रिजर्व बैंक अपने प्रावधानों को और कड़ा कर सकता है।

Advertisement
First Published - July 9, 2008 | 10:55 PM IST

संबंधित पोस्ट

Advertisement
Advertisement
Advertisement