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कर्ज बोझ से निपट लेगा देश!

Last Updated- December 12, 2022 | 6:56 AM IST

संसद में विनियोग  विधेयक पर चर्चा के बीच सरकार पर कर्ज बोझ का मुद्दा एक अहम विषय बन गया है। सरकार कोविड-19 से प्रभावित अर्थव्यवस्था को बढ़ावा देने के लिए व्यय बढ़ा रही है, लेकिन उपलब्ध राजस्व कम पडऩे से बाजार से रकम उधार ले रही है।
हालांकि संसद में बजट के साथ पेश मध्यम अवधि के लिए राजकोषीय नीति में अगले कुछ वर्षों में कर्ज बोझ पर चर्चा करने से परहेज किया गया है क्योंकि इसका आकलन नई राजकोषीय उत्तरदायित्व एवं बजट प्रबंधन (एफआरबीएम) कानून करेगा। मगर 15वें वित्त आयोग की सिफारिशों में केंद्र एवं राज्यों पर वर्ष 2020-25 तक कर्ज बोझ की रूपरेखा का अंदाजा लगाया गया है।
इसमें कहा गया है कि केंद्र और राज्यों पर कर्ज बोझ चालू वित्त वर्ष में सकल घरेलू उत्पाद (जीडीपी) का 89.8 प्रतिशत हो जाएगा और 2025-26 तक कम होकर 85.7 प्रतिशत रह जाएगा। 2020-21 से पहले कर्ज बोझ जीडीपी का 70 प्रतिशत रहा था और इसकी तुलना अगले प्रत्येक वर्ष की जाए तोकर्ज का स्तर 2025-26 के लिए अधिक लगता है।
इससे ऐसी आशंका पैदा होने लगी है कि भारत कहीं कर्ज के जाल में तो नहीं फंस रहा है। जब 15वें वित्त आयोग के चेयरमैन एन के सिंह के सामने यह चिंता रखी गई तो उन्होंने इससे इनकार किया। सिंह ने कहा, ‘मुझे ऐसी आशंका नहीं दिख रही है। देश के सभी राज्यों की वित्तीय स्थिति में सुधार हो रहा है। अगर आर्थिक गतिविधियां मजबूत रहीं तो मुझे लगता है कि कर्ज बोझ से निपटने में किसी तरह की परेेशानी आएगी।’ उन्होंने कहा कि मजबूत वृद्धि का लक्ष्य अगर पूरा होता रहता है तो निर्धारित अवधि के अंतिम पड़ाव पर कर्ज बोझ में बढ़ोतरी के बजाय कमी आएगी। इंडिया रेटिङ्क्षग्स में मुख्य अर्थशास्त्री देवेंद्र पंत ने कहा कि कर्ज बोझ का अंदाजा दो दो महत्त्वपूर्ण संकेतों से लगाया जाता है। इनमें एक जीडीपी वृद्धि दर और कर्ज पर औसत ब्याज के बीच अंतर और दूसरा प्राथमिक घाटा है। राजकोषीय घाटे और कर्ज पर ब्याज भुगतान को प्राथमिक घाटा कहा जाता है। पंत ने कहा, ‘इन दोनों मोर्चों पर पिछले कुछ वर्षों में हमारा प्रदर्शन कमजोर रहा है। अव्वल बात यह कि वित्त वर्ष 2021 में इन दोनों मोर्चों पर हालत खराब हुई है। इससे जीडीपी एवं कर्ज का अनुपात बढ़ गया है।’ उन्होंने कहा कि आने वाले समय में सरकार का मुख्य ध्यान वृद्धि दर तेज करने और प्राथमिक घाटा कम करने पर होना चाहिए। पंत ने कहा, ‘कर्ज पर ब्याज की दर के मुकाबले नॉमिनल वृद्धि दर (महंगाई सहित जीडीपी दर) अधिक रहने से कुछ राहत जरूर मिलेगी लेकिन प्राथमिक घाटा निश्चित तौर पर परेशानी का सबब बना रहेगा।’
उन्होंने कहा, ‘अगर घाटा अधिक रहने और वृद्धि दर कमजोर रहने का सिलसिल लंबे समय तक चला तो देश कर्ज में फंस सकता है। हालांकि फिलहाल वह स्थिति नहीं आई है।’ केयर रेटिंग्स में मुख्य अर्थशास्त्री मदन सबनवीस ने कहा कि काफी कुछ नॉमिनल जीडीपी की विकास दर पर होगा, जो जीडीपी-कर्ज के अनुपात पर असर डालेगा। सबनवीस ने कहा, ‘सरकार का घाटा 2025-26 में धीरे-धीरे 4.5 प्रतिशत पर रहने की बात कर रही है। जाहिर है कर्ज बोझ तो बढ़ेगा। हालांकि वृद्धि दर अगर अनुमान के अनुसार सुधरती गई तो मुझे नहीं लगता कि कर्ज संकट जैसी कोई स्थिति आएगी।’

First Published - March 17, 2021 | 11:29 PM IST

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