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रिपोर्ट में दावा: आजीविका के लिए चाहिए अब एक नया मॉडल, सब्सिडी से आगे बढ़ने की जरूरत

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इसके कहा गया है कि 2023-25 के साक्ष्यों से पुष्टि होती है कि भारत की आजीविका नीति के ढांचे से संरक्षण और प्रोत्साहन के बीच बुनियादी तनाव की समस्या का समाधान नहीं हुआ है

Last Updated- December 02, 2025 | 10:57 PM IST
livelihood policy
प्रतीकात्मक तस्वीर | फाइल फोटो

भारत में कोविड के दौरान शुरू की गई गई सब्सिडी और अन्य संबंधित सुविधाएं संकट के दौरान राजनीतिक रूप से आवश्यक और सामाजिक रूप से महत्त्वपूर्ण थीं, लेकिन उत्पादकता से जुड़े बुनियादी ढांचे, उद्यमिता के वातावरण और रोजगार के लिए कौशल विकसित करने पर निवेश किया जाना ढांचागत हिसाब से महत्त्वपूर्ण है।  

एक्सेस डेवलपमेंट सर्विसेस की स्टेट ऑफ इंडियाज लाइवलीहुड  रिपोर्ट 2025 के नवीनतम संस्करण में यह कहा गया है। इस रिपोर्ट में 10 से ज्यादा अध्याय हैं, जिसे देश के जाने माने शिक्षाविदों, अर्थशास्त्रियों व अन्य ने मिलकर तैयार किया है।

इसके एक अध्याय में कहा गया है कि 2023-25 के साक्ष्यों से पुष्टि होती है कि भारत की आजीविका नीति के ढांचे से संरक्षण और प्रोत्साहन के बीच बुनियादी तनाव की समस्या का समाधान नहीं हुआ है।   यह रिपोर्ट 3 दिसंबर को जारी की जाएगी।

रमेश श्रीवास्तव अरुणाचलम द्वारा लिखित आजीविका को पुनर्जीवित करने के लिए नीति और कार्यक्रम का असर 2023-2025: रिकवरी से लचीलेपन तक? नामक अध्याय में कहा गया है कि पीएम-किसान हस्तांतरण सिमटकर सीमांत किसान खेती लागत के केवल 8 प्रतिशत तक रह गया है और सिंचाई व्यवस्था, फसल कटाई के बाद के इन्फ्रा या बाजार तक पहुंच में निवेश इसका पूरक नहीं बन सका है, जिससे किसानों का मुनाफा कई गुना बढ़ सकता था। जलवायु संबंधी संकटों के बावजूद मनरेगा में कार्यदिवस घटे हैं और सिर्फ 12 प्रतिशत कामगार ही कृषि उत्पादकता में सुधार से जुड़़े हैं, जबकि 73 प्रतिशत कामगार कृषि पर निर्भर हैं।

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First Published - December 2, 2025 | 10:29 PM IST

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