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डीएचएफएल में अभी दो की ही रुचि

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Last Updated- December 14, 2022 | 10:44 PM IST

दीवान हाउसिंग फाइनैंस कॉरपोरेशन (डीएचएफएल) के लिए बोली जमा करने की समय सीमा इसी सप्ताह खत्म हो रही है और ऐसे में भारतीय ऋणदाताओं को इस आवास वित्त कंपनी की परिसंपत्तियों की बिक्री में निवेशकों की मामूली प्रतिक्रिया मिलने की उम्मीद है।
इस मामले के एक करीबी सूत्र ने कहा कि पूरी कंपनी को एक साथ खरीदने वाला कोई नहीं है। ऐसे में उसकी कुछ परिसंपत्तियों के लिए ही बोली मिलने के आसार हैं। इसलिए लेनदार डीएचएफएल में अपने बकाये पर भारी नुकसान झेलने के लिए तैयार हो रहे हैं। फरवरी में बैंकों ने डीएचएफएल को एकसाथ बेचने के अलावा उसकी परिसंपत्तियों को तीन हिस्सों में बेचने की भी पेशकश की थी। कंपनी में भारतीय ऋणदाताओं, म्युचुअल फंडों और भविष्य निधि का कुल करीब 88,000 करोड़ रुपये का निवेश है। इसमें भारतीय स्टेट बैंक का निवेश 10,000 करोड़ रुपये है।
इस मामले के एक करीबी सूत्र ने कहा, ‘ग्रांट थॉर्नटन की फोरेंसिक ऑडिट रिपोर्ट के अनुकूल न होने और खातों के वर्गीकरण में गड़बड़ी उजागर होने के कारण सभी विदेशी खरीदार अब इस दौड़ से बाहर हो गए हैं।’ उन्होंने कहा, ‘अदाणी समूह और पीरामल समूह डीएचएफएल के लिए बोली लगा सकते हैं लेकिन हमें अंतिम पेशकश के लिए शनिवार तक इंतजार करना होगा।’
पीरामल ने डीएचएफएल के खुदरा पोर्टफोलियो में दिलचस्पी दिखाई थी जबकि अदाणी समूह उसकी थोक और झुग्गी पुनर्विकास परिसंपत्तियों के लिए बोली लगा सकता है।
पीरामल के प्रवक्ता ने इस मुद्दे पर टिप्पणी करने से इनकार किया।
इसी साल फरवरी में लगभग एक दर्जन कंपनियों ने डीएचएफएल में दिलचस्पी दिखाई थी। इनमें एऑन कैपिटल, अदाणी कैपिटल, हीरो फिनकॉर्प, केकेआर क्रेडिट एडवाइजर्स (यूएस) एलएलसी, ओकट्री कैपिटल, मॉर्गन स्टैनली, गोल्डमैन सैक्स ग्रुप, डॉयचे बैंक एजी, वारबर्ग पिंकस, एसएसजी कैपिटल एडवाइजर्स एलएलसी, एडलवाइस, लोन स्टार और ब्लैकस्टोन शामिल हैं।
डीएचएफएल पहली ऐसी कंपनी है जिसे भारतीय रिजर्व बैंक ने ऋण शोधन अक्षमता एवं दिवालिया संहिता की धारा 227 के तहत विशेष शक्ति का इस्तेमाल करते हुए नैशनल कंपनी लॉ ट्रिब्यूनल (एनसीएलटी) में भेजा था। डीएचएफएल के पास फिलहाल 10,000 करोड़ रुपये की नकदी उपलब्ध है। इस रकम का इस्तेमाल छोटे जमाकर्ताओं और पीएफ निवेशकों के बकाये के आंशिक भुगतान में किया जा सकता है।
डीएचएफएल के पूर्व प्रवर्तकों द्वारा रकम की हेराफेरी किए जाने के कारण उसके पोर्टफोलियो में उल्लेखनीय गिरावट आई है। ग्रांट थॉर्नटन द्वारा किए गए फोरेंसिक ऑडिट से पता चलता है कि पिछले प्रबंधन ने 14,500 करोड़ रुपये के लेनदेन में गड़बड़ी को छिपाने के लिए विभिन्न सॉफ्टवेयर का इस्तेमाल किया था। इससे कंपनी को 10 साल तक नियामकों और ऑडिटरों की नजर से बचने में मदद मिली।

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First Published - October 13, 2020 | 11:41 PM IST

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