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मझोली आईटी कंपनियां : नतीजों में खुशी कम, ज्यादा गम

Last Updated- December 06, 2022 | 9:41 PM IST

अमेरिकी मंदी की मार, रुपये की मजबूती और मार्क टु मार्केट डेरिवेटिव्स नुकसान ने मझोले आकार की सूचना प्रौद्योगिकी (आईटी) कंपनियों के बहीखातों पर खासा असर डाला है।


पिछले वित्त वर्ष की चौथी तिमाही में इन कंपनियों के वित्तीय नतीजे खासे निराशाजनक रहे हैं। चिंता की बात है कि जानकार अगली दो तिमाहियों में भी हालात ऐसे ही रहने की बात कह रहे हैं। उनका कहना है कि आगे भी रफ्तार धीमी ही रहेगी।


पिंक रिसर्च में शोध विश्लेषक रुचिर देसाई कहते हैं, ‘इस तिमाही में मझोली कंपनियों के विकास की रफ्तार बढ़ने की उम्मीद बिल्कुल नहीं थी। लेकिन कुछ कंपनियों ने हमारे कयासों को उलट दिया। लेकिन असल में मुनाफा बिक्री बढ़ने की वजह से नहीं, बल्कि लागत कम करने के तरीकों से हुआ है।’


बाजार के माहिर यह भी मानते हैं कि कई कंपनियों ने अपने कर्मचारियों की संख्या तो बढ़ाई, लेकिन उनसे काम भी ज्यादा से ज्यादा लेना शुरू कर दिया। मंगल केशव सिक्योरिटीज में अनुसंधान विश्लेषक अश्विन मेहता ने कहा, ‘कुछ कंपनियों ने नए कर्मचारी लेना या तो बंद कर दिया है या फिर वे कुछ ही समय के लिए भर्तियां कर रही हैं।


अगर कर्मचारियों को स्थायी तौर पर लिया गया, तो उन पर ज्यादा ध्यान देना पड़ेगा। साफ है कि कर्मचारियों की संख्या पर दबाव है’ पोलारिस सॉफ्टवेयर लैब इसका उदाहरण है।जहां तक मार्क टु मार्केट घाटे का सवाल है, ज्यादातर विशेषज्ञों के अनुसार मझोली कंपनियां हेजिंग की सही रणनीति नहीं अपना रही हैं।


यूरो और स्विस फ्रांक जैसी विदेशी मुद्राओं में उतार चढ़ाव की वजह से तमाम भारतीय आईटी कंपनियों को डेरिवेटिव घाटे हुए हैं। इसकी शुरुआत हेक्सावेयर टेक्नोलॉजिज को 31 दिसंबर 2007 को खत्म हुई तिमाही में घाटे के साथ हुई। कंपनी ने उस अवधि में 102.9 करोड़ रुपये गंवाए और इस तिमाही में कंपनी ने 5.6 करोड़ रुपये के फॉरेक्स घाटे की घोषणा की है।


नुकसान झेलने वाली कंपनियों की फेहरिस्त में अगला नाम केपीआईटी कमिंस है, जिसे डॉलर की कमजोरी और यूरो की मजबूती का खामियाजा भुगतना पड़ा। इस कंपनी को 89.26 करोड़ रुपये का  चूना लगा है। चूंकि कंपनियों के पास यूरो और रुपये में हेजिंग का विकल्प नहीं है इसलिए ज्यादातर कंपनियां डॉलर-यूरो और डॉलर-रुपये में हेजिंग का रास्ता अपनाती हैं। जब से डॉलर के मुकाबले यूरो के दाम में 1.58 यूरो का इजाफा हुआ है तब से कई कंपनियों को तगड़ी चपत लगी है।


पाटनी कंप्यूटर्स सिस्टम्स को भी हालिया खत्म तिमाही में 8.9 करोड़ रुपये का मार्क टु मार्केट नुकसान झेलना पड़ा है। अमेरिकी एच 1 बी वीजा के लिए आवेदन के खर्च में बढ़ोतरी और नई भर्तियों की वजह से कंपनी के सकल मुनाफे पर भी असर पड़ा है।


खास बात यह रही कि इस तिमाही में ही कुछ मझोली और छोटी आईटी कंपनियों को अपनी अलग रणनीतियों के नतीजे भी देखने को मिले। खासतौर पर मास्टेक, 3आई इंफोटेक, रॉल्टा, जीओडेसिक और  जेन्सार।


3आई इंफोटेक के लिए बीएफएसआई सबसे ज्यादा मुनाफे देने वाला क्षेत्र रहा है। इसी तरह मास्टेक की भी बीमा और आईपी प्लेटफॉर्म में निवेश के जरिये गहरी पैठ होने के आसार हैं।


जहां तक जेन्सार की बात है तो इस कंपनी का अनुभव बताता है कि किस तरह नए बाजारों ने उसे विविधता लाने में मदद की है लेकिन बाजार के जानकारों के मुताबिक धीमी रफ्तार अभी बरकरार रहेगी। एक विश्लेषक हरित शाह कहते हैं कि अगले 3 से 6 महीने तक यह अनिश्चितता बनी रहेगी।

First Published - May 5, 2008 | 11:01 PM IST

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