घरेलू आसमान में इंडिगो की पकड़ वैश्विक विमानन क्षेत्र में एक दुर्लभ बात है। उसकी अक्टूबर में भारत में 65.6 प्रतिशत हिस्सेदारी थी। अमेरिका, चीन, ब्रिटेन, ब्राजील, जापान, थाईलैंड और फ्रांस जैसे प्रमुख बाजारों की विमानन कंपनियों में कोई भी ऐसी नहीं है, जिसका इतना ज्यादा दबदबा हो जैसा इंडिगो का दुनिया के तीसरे सबसे बड़े विमानन बाजार भारत में है।
इतना ही नहीं, दो कंपनियों के दबदबे वाला भारतीय विमानन क्षेत्र काफी बेढंगा है। इसमें इंडिगो और एयर इंडिया के पास मिलाकर 91.3 प्रतिशत बाजार हिस्सेदारी है। इसकी वजह से नई कंपनियों के लिए बहुत कम गुंजाइश बचती है जबकि ज्यादातर दूसरे देशों में ऐसा नहीं है, सिवाय ऑस्ट्रेलिया के (जहां कैंटास और वर्जिन के पास 98 प्रतिशत नियंत्रण है)। इससे नियामकीय और प्रतिस्पर्धा-विरोधी चुनौतियां पैदा होती हैं।
अमेरिका में वहां की सबसे बड़ी देसी विमानन कंपनी अमेरिकन एयरलाइंस की केवल 21 प्रतिशत हिस्सेदारी है और शीर्ष तीन कंपनियों के पास केवल 58 प्रतिशत हिस्सेदारी है, जिनमें साउथवेस्ट और डेल्टा शामिल हैं। यह भारत में एक ही विमानन कंपनी के पास मौजूद हिस्सेदारी से बहुत कम है। भारत में बाजार पर दो कंपनियों के एकाधिकार की तुलना में अमेरिका में शीर्ष चार कंपनियों की (यूनाइटेड को मिलाकर) सामूहिक रूप से 75 प्रतिशत हिस्सेदारी है, जिससे सात से आठ अन्य विमानन कंपनियों को परिचालन और फलने-फूलने की गुंजाइश है।
चीन में विमानन कंपनियों को सरकार द्वारा नियंत्रित किया जाता है। वहां सबसे बड़ी घरेलू कंपनी चाइना सदर्न के पास बाजार का केवल 16 प्रतिशत हिस्सा है। इसके बाद चाइना ईस्टर्न के पास 14 प्रतिशत और शीर्ष तीन कंपनियों (एयर चाइना) सहित) की सामूहिक रूप से 58 प्रतिशत हिस्सेदारी है, जो भारत में अकेले इंडिगो की हिस्सेदारी से कम है। वहां का बाकी बाजार छोटी और क्षेत्रीय विमानन कंपनियों और किफायती विमानन कंपनियों के बीच विभाजित है, जो महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाती हैं।