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नेपाल के रास्ते भारत में घुस रहा चीनी इस्पात! जांच में फर्जी सर्टिफिकेट का खुलासा

शिकायत मिली थी कि चीनी लाइसेंस धारक के नाम पर इस्पात का आयात किया जा रहा था, जिसने सही मायने में उस खेप की आपूर्ति तक नहीं की थी

Last Updated- November 16, 2025 | 9:08 PM IST
Steel
प्रतीकात्मक तस्वीर | फाइल फोटो

फर्जी विनिर्माता प्रमाण पत्रों का उपयोग कर नेपाल के रास्ते चीन का इस्पात देश में भेजने का अंदेशा जताया गया है। इस्पात मंत्रालय के एक वरिष्ठ अधिकारी ने बताया कि शुरुआती निष्कर्षों से ऐसे संकेत मिले हैं। उन्होंने कहा कि ये इस्पात इतनी भारी मात्रा में भेजे गए हैं, जितना नेपाल उत्पादन भी नहीं करता है।

अधिकारी ने बताया कि शिकायत मिली थी कि चीनी लाइसेंस धारक के नाम पर इस्पात का आयात किया जा रहा था, जिसने सही मायने में उस खेप की आपूर्ति तक नहीं की थी। उन्होंने कहा, ‘हमारे शुरुआती निष्कर्षों से पता चला है कि नेपाल के जरिये भारत को इतना इस्पात निर्यात किया गया था, जितनी उसकी निर्माण की क्षमता ही नहीं है। इससे पता चलता है कि इस्पात का उत्पादन चीन में हुआ था। फिर उसे नेपाल भेजा गया और एक अलग स्रोत के तहत भारत भेजा गया।’

अधिकारी ने बताया कि मामला आगे बढ़ गया है और मंत्रालय ने सीमा शुल्क, भारत मानक ब्यूरो और राजस्व आसूचना निदेशालय को मामले की तह तक जाकर जांच करने के वास्ते पत्र लिखा है।

अधिकारी ने बताया कि सरकार कार्बन सीमा समायोजन तंत्र (सीबीएएम) पर यूरोपीय संघ के साथ बातचीत में अपनी स्थिति मजबूत कर रही है। यह तंत्र अगले साल जनवरी में लागू होने वाला है और भारत के इस्पात निर्यात को काफी प्रभावित कर सकता है। भारत ने यह भी स्पष्ट कर दिया है कि सीबीएएम में भारतीय विनिर्माताओं द्वारा पहले से ही वहन की जा रही कार्बन लागतों को भी ध्यान में रखा जाना चाहिए, जिनमें से किसी को भी फिलहाल यूरोपीय संघ से मान्यता नहीं मिली है।

अधिकारी ने कहा, ‘भारतीय कंपनियों द्वारा चुकाई जाने वाली किसी भी तरह की प्रत्यक्ष अथवा अप्रत्यक्ष कार्बन लागतों को भी शामिल किया जाना चाहिए। फिलहाल, उनमें से किसी को भी यूरोपीय संघ से मान्यता नहीं मिली है।’ इन लागतों में आने वाली कार्बन क्रेडिट ट्रेडिंग स्कीम (सीसीटीएस) और कई घरेलू शुल्क शामिल  हैं, जो प्रभावी तौर पर कार्बन शुल्क के रूप में काम करते हैं। अधिकारी ने कहा, ‘इन्हें कार्बन कर नहीं कहा जा सकता है मगर ये स्थानीय करों, जल संबंधी शुल्कों और हरित उपकर जैसे कार्बन लागतों के रूप में काम करते हैं। अगर इस तंत्र को निष्पक्ष बनाना है तो इन सभी को सीबीएएम का गणना का हिस्सा होना चाहिए।’

सीसीटीएस यानी सरकार का कार्बन मूल्य निर्धारण ढांचा, जो भारतीय कार्बन बाजार (आईसीएम) का आधार होगा अपनी तैयारी के अंतिम चरण में प्रवेश कर रहा है। अधिकारी ने बताया कि इस्पात क्षेत्र के लिए प्रणाली अप्रैल से लागू होने की उम्मीद है और भारत यूरोपीय संघ पर इसे सीबीएएम के तहत मान्यता देने पर दबाव डाल रहा है। उन्होंने कहा कि यूरोपीय संघ अपने कुछ नियमों की समीक्षा भी कर रहा है।

First Published - November 16, 2025 | 9:08 PM IST

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