facebookmetapixel
GCC बना ग्रोथ इंजन, भारत का ऑफिस मार्केट नई ऊंचाइयों पर, 2026 तक आधे से ज्यादा हिस्सेदारी का अनुमानTata Capital Q3 Results: मुनाफा 16.9% उछलकर ₹1,256.87 करोड़ पर पहुंचा, NII में भी जबरदस्त ग्रोथSEBI का नया प्रस्ताव: ₹20,000 करोड़ AUM वाले इंडेक्स अब नियमों के दायरे में आएंगेSBI YONO यूजर्स को सरकार की चेतावनी: फर्जी आधार APK से रहें सावधान, नहीं तो होगा भारी नुकसानFlexi-Cap Funds: 2025 में रहा सुपरस्टार, AUM ₹5.52 लाख करोड़; फंड मैनेजर पर है भरोसा तो करें निवेशRealty Stock: नतीजों के बाद बनेगा रॉकेट! ब्रोकरेज ने BUY रेटिंग के साथ दिया 61% अपसाइड का टारगेटQ3 रिजल्ट के बाद PNB का शेयर 52-वीक हाई से 5.37% नीचे लुढ़का; जानें क्या है कारणPNB Q3FY26 Results: मुनाफा 11.6% बढ़कर ₹5,189 करोड़ के पार, ब्याज से होने वाली आय भी 3% बढ़ाराहत अब काफी नहीं! एक्सपर्ट की मांग: बजट में प्री-फंडेड क्लाइमेट इंश्योरेंस पॉलिसी पर सोचे सरकार₹3 लाख के पार चांदी, क्या अभी भी कमाई का मौका बचा है, जानें क्या कह रहे हैं एक्सपर्ट

ऋण समाधान की बढ़ती लागत से बैंकर चिंतित

Last Updated- December 15, 2022 | 4:33 AM IST

कई दिवालिया कंपनियों के ऋण समाधान प्रक्रिया की बढ़ती लागत से बैंकरों की चिंता बढऩे लगी है क्योंकि कंपनी की आय का एक उल्लेखनीय हिस्सा समाधान पेशेवरों एवं अन्य सलाहकारों के भुगतान में खर्च हो रहा है। बैंकरों का कहना है कि ऋण समाधान बिल काफी बढ़ रहा है क्योंकि समाधान पेशेवर कंपनी के बाहर से मानव संसाधनों और ऑडिट/कानून सलाहकारों की सेवाएं ले रहे हैं ताकि सभी खामियों को दूर किया जा सके।
दिवालिया कंपनियों को विशेष फोरेंसिक ऑडिट और कानूनी राय लेने के लिए भी भुगतान करना पड़ता है। इस प्रकार की सेवाओं की जरूरत इसलिए पड़ती है ताकि यह देखा जा सके कि पिछले प्रवर्तकों ने कहीं रकम ही हेराफेरी तो नहीं की है। इस प्रकार खर्च बढऩे से अंतत: लेनदारों और पूर्व कर्मचारियों को अपने बकाये के लिए अधिक इंतजार करना पड़ेगा।
आईबीसी 2016 के अनुसार, जब किसी कंपनी को ऋण समाधान के लिए नैशनल कंपनी लॉ ट्रिब्यूनल (एनसीएलटी) में भेजा जाता है तो कंपनी के परिचालन के लिए एक समाधान पेशेवर की नियुक्ति की जाती है। समाधान पेशेवर ही किसी संभावित खरीदार की तलाश करता है जबकि कंपनी के बोर्ड और उसके पूर्व प्रवर्तकों को निलंबित कर दिया जाता है। ऐसे में कंपनी की आय का इस्तेमाल ऋण समाधान की लागत के भुगतान में किया जाता है।
इस मामले के एक करीबी सूत्र ने कहा, ‘यह बड़ी ऑडिट फर्मों के लिए फायदेमंद है क्योंकि उन्हें सभी अनुबंध मिल रहे हैं। पिछले प्रवर्तकों और अन्य परिचालन लेनदारों द्वारा व्यापक मुकदमेबाजी से अंतत: बिल में इजाफा होता है।’ उन्होंने कहा, ‘आमतौर पर मुकदमेबाजी काफी लंबे समय के लिए खिंच जाती है और इस दौरान ऋण समाधान प्रक्रिया से जूझ रही कंपनी को सभी बिलों का भुगतान करना पड़ता जिसमें कानूनी राय लेने की लागत भी शामिल होती है।’
अधिकारी ने कहा, ‘इसका अंतिम नतीजा दिवालिया कंपनियों के लिए भारी घाटे, छंटनी और लेनदारों द्वारा बकाये की मामूली वसूली के रूप में सामने आता है।’ उन्होंने उदाहरण देते हुए कहा कि एयरसेल के ऋण समाधान प्रक्रिया की लागत में करीब 320 करोड़ रुपये समाधान पेशेवर की प्रक्रिया और वेतन मद में खर्च हुए। इसी प्रकार 2017 से ही ऋण समाधान की प्रक्रिया से गुजर रही कंपनी वीडियोकॉन को केवल समाधान प्रक्रिया के लिए सालाना करीब 10 करोड़ रुपये खर्च करना पड़ रहा है।
अधिकारी ने कहा, ‘ऋण समाधान से जूझ रही अधिकतर कंपनियां मुकदमेबाजी में फंसी हुई हैं और मुकदमेबाजी के खत्म होने की कोई स्पष्ट तस्वीर नहीं दिख रही है। ऐसे में समाधान पेशेवरों की लागत में इजाफा हो रहा है और उन्हें प्राथमिकता के आधार पर भुगतान किया जाता है।’
इस बीच, बैंकों को अपनी ब्याज आय भी गंवानी पड़ रही है।
आईबीबीआई के अनुसार, 1 दिसंबर 2016 से कॉरपोरेट दिवालिया प्रक्रिया के प्रावधानों के प्रभावी होने के बाद इस साल मार्च के अंत तक करीब 3,774 सीआईआरपी के मामले सामने आए। इनमें से 312 मामलों को अपील पर निपटा लिया गया जबकि 157 मामलों को वापस ले लिया गया। करीब 914 मामले परिसमापन के आदेश के साथ ही खत्म हो गए जबकि 221 मामलों के लिए समाधान योजनाओं को मंजूरी दी गई। दिवालिया कंपनियों से बैंक अपने बकाये का औसतन 45 फीसदी हिस्सा ही वसूल पा रहे हैं।

First Published - July 21, 2020 | 12:29 AM IST

संबंधित पोस्ट