Economic Survey 2026: आर्थिक समीक्षा 2025-26 के अनुसार, पिछले एक दशक में भारत के घरेलू बचत पैटर्न में बड़ा बदलाव आया है, जिसमें म्युचुअल फंड और इक्विटी से जुड़े निवेशों की हिस्सेदारी काफी बढ़ी है। इस बदलाव के प्रमुख चालक के रूप में सिस्टमैटिक इन्वेस्टमेंट प्लान (SIP) उभरे हैं। पिछले 10 वर्षों में एवरेज मंथली SIP निवेश सात गुना से ज्यादा बढ़ा है। वित्त वर्ष 2017 में यह 4,000 करोड़ रुपये से कम था, जो वित्त वर्ष 2026 में अब तक (अप्रैल से नवंबर) 28,000 करोड़ रुपये से ज्यादा हो गया है। आर्थिक समीक्षा के मुताबिक, यह बढ़ोतरी घरेलू बचत की आदतों में बदलाव को दिखाती है, जहां निवेशक बाजार के उतार-चढ़ाव से घबराने के बजाय नियमित और अनुशासित निवेश कर रहे हैं।
आर्थिक समीक्षा के अनुसार, घर-परिवार अपनी अतिरिक्त बचत को पारंपरिक जमाओं (Savings) पर निर्भर रहने के बजाय तेजी से बाजार से जुड़े इंस्ट्रूमेंट, खासकर इक्विटी, में लगा रहे हैं। यह फाइनैंशियल सिस्टम में स्ट्रक्चरल बदलावों के साथ-साथ लॉन्ग टर्म निवेश जोखिम लेने की घरेलू ट्रेंड में धीरे-धीरे आई बढ़ोतरी को भी दर्शाता है।
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जो इक्विटी पहले घरेलू बैलेंस शीट में सीमित भूमिका निभाती थी, वह अब फाइनैंशियल वेल्थ का एक अहम हिस्सा बन गई है। कुल इक्विटी बाजार स्वामित्व में व्यक्तिगत निवेशकों की हिस्सेदारी वित्त वर्ष 2014 में लगभग 11 फीसदी से बढ़कर सितंबर 2025 तक 18.8 फीसदी हो गई। मूल्य के लिहाज से, व्यक्तिगत निवेशकों की इक्विटी होल्डिंग वित्त वर्ष 2014 के करीब 8 लाख करोड़ रुपये से बढ़कर सितंबर 2025 तक लगभग 84 लाख करोड़ रुपये पहुंच गई है।
इक्विटी बाजार में व्यक्तिगत निवेशकों की सीधी भागीदारी धीरे-धीरे बढ़ी है। यह वित्त वर्ष 2014 में 8 फीसदी से थोड़ी कम थी, जो सितंबर 2025 तक करीब 9.6 फीसदी हो गई। वहीं, इसी अवधि में म्युचुअल फंड जैसे माध्यमों से अप्रत्यक्ष भागीदारी लगभग तीन गुना बढ़कर 9.2 फीसदी तक पहुंच गई। अप्रैल 2020 से सितंबर 2025 के बीच घरेलू इक्विटी संपत्ति में करीब 53 लाख करोड़ रुपये की बढ़ोतरी का अनुमान है, जो यह दर्शाता है कि लगातार निवेश से इक्विटी बाजार में लॉन्ग टर्म में वेल्थ क्रिएशन को मजबूती मिली है।
घरेलू वित्तीय बचत (household financial savings) में यह बदलाव साफ नजर आता है। कुल बचत में इक्विटी और म्युचुअल फंड की हिस्सेदारी वित्त वर्ष 2012 में करीब 2 फीसदी थी, जो वित्त वर्ष 2025 में बढ़कर 15 फीसदी से ज्यादा हो गई। वहीं, बैंक जमा की हिस्सेदारी इसी अवधि में 58 फीसदी से घटकर लगभग 35 फीसदी रह गई, जो वित्त वर्ष 2022 में 31.9 फीसदी के निचले स्तर तक चली गई थी। आर्थिक समीक्षा के अनुसार, इसका मतलब यह है कि लोग पारंपरिक बचत साधनों को पूरी तरह छोड़ नहीं रहे, बल्कि अपने निवेश में विविधता ला रहे हैं।
बैलेंस शीट के नजरिये से देखें तो RBI के आंकड़ों के अनुसार, कुल घरेलू वित्तीय संपत्तियों (household financial assets) में इक्विटी और इन्वेस्टमेंट फंड्स की हिस्सेदारी मार्च 2019 में 15.7 फीसदी थी, जो मार्च 2025 तक बढ़कर 23 फीसदी हो गई।
म्युचुअल फंड के तहत मैनेज होने वाले एसेट्स में भी लगातार इजाफा हो रहा हैं और वित्त वर्ष 2026 तक (नवंबर 2025 तक) यह जीडीपी के करीब 23 फीसदी के बराबर हो गई हैं। कुल एसेट अंडर मैनेजमेंट 80 लाख करोड़ रुपये से ज्यादा हो चुका है।
हालांकि, आर्थिक समीक्षा ने यह भी बताया कि डेट-ओरिएंटेड मार्केट इंस्ट्रूमेंट में घरेलू भागीदारी अभी सीमित बनी हुई है। कॉरपोरेट बॉन्ड अब भी घरेलू वित्तीय संपत्तियों का छोटा हिस्सा हैं, जो भारत के कॉरपोरेट बॉन्ड बाजार की सीमित गहराई को दर्शाता है। यह बाजार जीडीपी के लगभग 16-17 फीसदी के बराबर है, जो अमेरिका और चीन जैसी बड़ी अर्थव्यवस्थाओं की तुलना में काफी कम है।
कुल मिलाकर, आर्थिक समीक्षा के अनुसार एसआईपी और म्युचुअल फंड निवेश में आई तेजी यह संकेत देती है कि भारतीय घर-परिवार बाजार के उतार-चढ़ाव के बावजूद अनुशासित और लंबी अवधि के निवेश की ओर बढ़ रहे हैं।