गरीबी निर्धारित करने वाले 'शर्मनाक' आंकड़ों को लेकर विपक्ष सरकार पर एकजुट होकर बिफर पड़ा है। इस मसले पर भारतीय राजनीति के दो धु्रव भी एक स्वर में बोल रहे है। माक्र्सवादी कम्युनिस्ट पार्टी (माकपा) और भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) ने इस मामले में प्रधानमंत्री से दखल देने को कहा है।
इन दलों ने पीएम से कहा है कि वह योजना आयोग को यह हिदायत दें कि सब्सिडी के लिए लोगों की संख्या कम करने के मकसद से देश में गरीबी निर्धारण को लेकर गलत रवैया न अपनाया जाए और पूरी ईमानदारी के साथ यह निर्धारण किया जाए।
विपक्ष का कड़ा रुख
माकपा द्वारा जारी बयान में कहा गया है कि हाल में घरेलू सुविधा और परिसंपत्ति जनगणना, 2011 के आंकड़े भी यही पुष्ट करते हैं कि देश के विभिन्न इलाकों में अभी भी काफी तादाद में गरीबी मौजूद है लेकिन योजना आयोग ने वर्ष 2009-10 के लिए ग्रामीण इलाकों में प्रतिदिन 22.40 रुपये और शहरी क्षेत्र में 28.65 रुपये प्रति व्यक्ति के हिसाब से गरीबी रेखा तय कर दी है जो 'बेतुके ढंग से कम' निर्धारित की गई है।
पार्टी की ओर से कहा गया है, 'इससे ज्यादा खर्च करने वाला गरीब नहीं माना जाएगा। इन दोषपूर्ण आंकड़ों के सहारे योजना आयोग दावा करता है कि वर्ष 2004-05 से 2009-10 के बीच देश में गरीबी रेखा से नीचे जीवनयापन करने वालों (बीपीएल) की संख्या में 7 फीसदी की कमी आई है।' माकपा का कहना है कि योजना आयोग का यह दावा पूरी तरह से 'गैर ईमानदार प्रयास' है जो लगातार बढ़ती विषमता और गरीबी की हकीकत पर पर्दा डालता है। माकपा ने इस मामले में प्रधानमंत्री के हस्तक्षेप की मांग की है। पार्टी ने कहा, 'प्रधानमंत्री को यह स्पष्ट ऐलान करना चाहिए कि गरीबी निर्धारण के ये दोषपूर्ण आंकड़े आधिकारिक नहीं होंगे और बीपीएल कार्डधारकों और राज्य प्रायोजित कल्याणकारी योजनाओं की पात्रता के लिए इसे कोई पैमाना नहीं माना जाएगा।' योजना आयोग की इस कवायद की कड़े शब्दों में आलोचना करते हुए माकपा ने कहा कि योजना आयोग देश में गरीबी रेखा को कम करने के लिए जानबूझकर ऐसी गलत पद्घतियां अपना रहा है। माकपा ने कहा कि उच्चतम न्यायालय में दायर शपथ पत्र में इससे पहले दिए गए गरीबी के आकलन को लेकर देश भर में हुए विरोध के बावजूद आयोग ने गरीबी के लिए तेंदुलकर समिति की रिपोर्ट को ही पैमाना माना है। पार्टी ने कहा, 'इससे यही नजर आता है कि योजना आयोग के सदस्यों और उन करोड़ों लोगों की हकीकत के बीच भारी अंतर है जो मामूली सी आमदनी में बढ़ी हुई कीमतों का दंश झेलने पर मजबूर हैं। यह और भी शर्मनाक है कि ऐसे बेतुके आंकड़े उस संगठन की ओर से आते हैं जिसके अध्यक्ष प्रधानमंत्री स्वयं हैं।' संसद में प्रमुख विपक्षी पार्टी भाजपा ने भी इस मामले में सरकार को नहीं बख्शा। इस पैमाने को बेतुका करार देते हुए भाजपा ने कहा कि खाने की कैलोरी मात्रा के हिसाब से गरीबों का आकलन किया जाए। भाजपा नेता एसएस अहलूवालिया ने कहा कि गरीबी का निर्धारण करते वक्त सरकार को व्यापक आकलन करना चाहिए और इसमें आमदनी के अलावा पर्यावास और कपड़ों जैसे पैमानों पर भी गौर करना चाहिए।
आयोग भी असहमत
गरीबी के जारी हालिया आंकड़ों पर कड़ी आलोचना झेल रहे योजना आयोग के उपाध्यक्ष मोंटेक सिंह अहलूवालिया ने भी इनमें विसंगति की बात कबूली है। अहलूवालिया ने कहा कि राष्ट्रीय नमूना सर्वेक्षण संगठन (एनएसएसओ) के आंकड़ों और राष्ट्रीय खातों के संयोग से मिले परिणामों कुछ गड़बड़ है।
इसके चलते शहरों में प्रति व्यक्ति 26.65 रुपये तक गरीबी रेखा निर्धारित की गई है। एनएसएसओ आंकड़ों की गुणवत्ता को लेकर पूछे गए सवाल के जवाब में अहलूवालिया ने कहा, 'मैं खुद यह मानता हूं कि उपभोक्ता सर्वेक्षण और राष्ट्रीय आंकड़ों में गंभीर सांख्यिकी समस्या है।'
आयोग ने सोमवार को ही नए आंकड़े जारी किए। ये आंकड़े राष्ट्रीय नमूना सर्वेक्षण (2009-10) के 66वें चरण के उपभोक्ता व्यय सर्वेक्षण पर आधारित हैं। वहीं दूसरी ओर राष्ट्रीय लेखा आंकड़ों को तैयार करने का काम केंद्रीय सांख्यिकी संगठन (सीएसओ) का है। आकलन के अनुसरा वर्ष 2009-10 में देश में गरीबी अनुपात घटकर 29.8 फीसदी रह गया जबकि वर्ष 2004-05 के दौरान यह आंकड़ा 37.2 फीसदी था। ये नवीनतम आंकड़े दैनिक उपभोग पर आधारित हैं। इसके अनुसार यदि शहरी क्षेत्र में कोई व्यक्ति प्रतिदिन 28.65 रुपये और ग्रामीण क्षेत्र में कोई व्यक्ति रोजाना 22.42 रुपये खर्च करता है तो उसे गरीब की श्रेणी में नहीं रखा जाएगा। आयोग का आकलन ऐसे समय में आया है जब संसद का सत्र चल रहा है जिसमें सरकार को इस मसले पर विपक्ष का गतिरोध झेलना पड़ रहा है। वे दलगत सीमा से परे सरकार पर हल्ला बोल रहे हैं।
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