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असमानता भरा विकास

साप्ताहिक मंथन
टी. एन. नाइनन /  September 29, 2017

सकल घरेलू उत्पाद (जीडीपी) की धीमी प्रगति को लेकर मोदी सरकार गंभीर आलोचनाओं के घेरे में है। इस चर्चा से यह भी साफ होता है कि मुखर जनता की राय में जीडीपी वृद्धि ही ïराष्ट्रीय उद्देश्य के लिहाज से केंद्र में होनी चाहिए। बढ़ती असमानता के बारे में हाल में प्रकाशित एक शोधपत्र पर चर्चा न होना भी इतना ही महत्त्वपूर्ण है। थॉमस पिकेटी (कैपिटल के चर्चित लेखक) और सह-लेखक लुकास चैंसेल ने 'फ्रॉम ब्रिटिश राज टू बिलियनरी राज?' शीर्षक वाला यह पत्र पेश किया है। 

 
करीब दो महीने पहले जारी शोधपत्र के मुताबिक भारत में 1980 के बाद हुए सुधारों के अमूमन सारे लाभ समृद्ध लोगों को ही मिले हैं। इसी तरह आबादी के निचले आधे हिस्से की राष्ट्रीय आय वर्ष 2013-14 में महज 15 फीसदी रही थी जबकि 1980 के दशक की शुरुआत में यह 24 फीसदी हुआ करती थी। जहां इस अवधि में औसत आय दोगुनी भी नहीं हुई, वहीं आबादी के शीर्ष पर बैठे एक फीसदी लोगों की आय में आठ गुने से भी अधिक वृद्धि हुई है। संक्षेप में, आर्थिक सुधारों के दौर में समाज के बीच असमानता नाटकीय रूप से बढ़ी है जबकि 1980 से पहले के तीन दशकों में असमानता स्तर में कमी आ रही थी। (जबकि उस समय जीडीपी की वृद्धि दर सुस्त ही थी।)
 
पिकेटी और चैंसेल ने अपने अध्ययन में आर्थिक नीतियों में हुए बदलाव के पहले और बाद के दौर पर ध्यान आकृष्ट करने की कोशिश की है। नीतिगत बदलाव के चलते सरकारी स्वामित्व और भारी कराधान के स्थान पर बाजार एवं निजी क्षेत्र के अनुकूल नीतियों का दौर चला। हालांकि इन विद्वानों ने कार्य-कारण संबंध नहीं लागू किया है लेकिन इस मान्यता को नकारना काफी मुश्किल होगा कि तीव्र आर्थिक वृद्धि के लाभ उठा पाने की स्थिति में मौजूद लोग अपेक्षाकृत संपन्न ही रहे होंगे। हालांकि यह विरोधाभासी आकलन नहीं रखा जा सकता है कि सुधारों के पहले की नीतियां जारी रहने की स्थिति में गरीबों को फायदा हुआ रहता। 
 
पिकेटी और चैंसेल की तरफ से पेश आंकड़े बताते हैं कि आबादी के निचले आधे हिस्से की आय 1980 के पहले और बाद के दौर में भी कमोबेश एक ही तरह बढ़ी। 1951-1980 के पहले दौर में आबादी के इस हिस्से की आय 87 फीसदी बढ़ी थी तो 1980-2014 के दूसरे दौर में उनकी आय 89 फीसदी बढ़ी। इस तरह निरपेक्ष रूप में देखें तो गरीब उस समय भी बदतर हाल में ही थे। हालांकि तुलनात्मक रूप से उनकी हालत पहले भी खराब थी।
 
अगर बढ़ती असमानता के कारण और इसके संभावित समाधान पर गंभीर चर्चा करनी है तो हमारा ध्यान निरोधात्मक श्रम नीतियों की भूमिका और समुचित स्वास्थ्य एवं शिक्षा तक सभी की समान पहुंच सुनिश्चित करने जैसे मुद्दों पर केंद्रित होना चाहिए। हमें गरीबों के लिए न्यूनतम आय समर्थन कार्यक्रम शुरू करने के साथ ही शेयरों पर दीर्घावधि पूंजीगत लाभ कर लगाने और संपदा शुल्क के उन्मूलन जैसे बिंदुओं पर चर्चा कर सकते हैं। अगर दीर्घावधि पूंजीगत लाभ के अन्य सभी स्वरूपों पर कर लगता है तो फिर शेयर पर क्यों नहीं लगना चाहिए? वैसे बाजार को आपाधापी से बचाने के लिए इसकी दर उदार रखी जा सकती है। क्या संपदा शुल्क पर हमें वास्तव में ट्रंप जैसा रवैया अपनाने की जरूरत है?
 
इन विद्वानों ने व्यक्तिगत वयस्क आय स्तरों के आधार पर कहा है कि केवल शीर्ष 10 फीसदी आबादी से ही भारतीय मध्यवर्ग बनता है। इस आकलन की वजह यह है कि वे मध्यवर्ग को परिवार के तौर पर नहीं व्यक्तियों को रूप में देख रहे हैं। जबकि खर्च की इकाई मूलत: परिवार ही है। वर्ष 2013-14 में भारत में वयस्क लोगों की संख्या 77.8 करोड़ थी जबकि परिवारों की संख्या 26 करोड़ ही थी। अगर एक परिवार में तीन वयस्कों का ही अनुपात रखें तो उस परिवार की आय व्यक्तिगत आय की तिगुनी होगी। वर्ष 2013-14 में इस 10 फीसदी आबादी का सीमांत आय स्तर 16,000 रुपये प्रति व्यक्ति प्रति माह था। परिवार में तीन वयस्कों की मौजूदगी से उसकी आय तिगुनी हो जाती और अगर पिछले पांच वर्षों की वृद्धि को भी जोड़ लें तो वह करीब 70,000 रुपये के आसपास होती। असलियत तो यह है कि इस आय स्तर से आधी कमाई वाले परिवार के पास भी फ्रिज, टेलीविजन, रसोई गैस और एक दोपहिया वाहन जैसी बुनियादी सुविधाएं मौजूद हैं। अगर भारत के मध्य वर्ग का आकार 2.5 करोड़ परिवारों से अधिक नहीं होता तो उपभोक्ता उत्पादों का इस तरह विस्तार ही नहीं हुआ रहता।
Keyword: GDP, growth,,
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