केंद्रीय मंत्रिमंडल ने भारत के साथ जमीनी सीमा साझा करने वाले देशों से आने वाले निवेश के संचालन संबंधी नियमों में बदलाव को मंगलवार को मंजूरी दे दी। यह एक समझदारी भरा निर्णय है। बहरहाल, बदलती वैश्विक अर्थव्यवस्था और भू-राजनीतिक माहौल के साथ देश की प्रत्यक्ष विदेशी निवेश (एफडीआई) व्यवस्था में भी बदलाव की आवश्यकता है। केंद्र सरकार ने वर्ष 2020 में प्रेस नोट 3 के माध्यम से उन देशों से आने वाले प्रत्यक्ष विदेशी निवेश पर कड़ा अंकुश लगाया था जिनकी सीमा भारत से लगती है।
उस समय दलील दी गई थी कि ऐसा कोविड-19 महामारी के बीच भारतीय कंपनियों के अधिग्रहण को रोकने के लिए किया गया। इसके परिणामस्वरूप भारत के साथ भू-सीमा साझा करने वाले देशों को केवल सरकारी रास्ते से निवेश की इजाजत दी गई। नीति में बदलाव की एक वजह चीन से आने वाले निवेश को सीमित करना भी था।
ऐसा इसलिए क्योंकि सीमा पर तनाव के हालात थे। जब तनाव में कमी आई और महामारी का असर कम हुआ तो भारतीय व्यवसायों ने प्रतिबंधों में ढील की मांग शुरू कर दी। अपनी ओर से, सरकार ने भू-सीमा साझा करने वाले देशों विशेषकर चीन से ऐसे निवेशों की अनुमति दी। ऐपल इंक के लिए एक पारिस्थितिकी तंत्र विकसित करने में मिली सफलता इसका उल्लेखनीय उदाहरण है।
पिछले कुछ वर्षों में आर्थिक वातावरण में हुए बदलावों को देखते हुए सरकार ने नीति की समीक्षा करने का उचित कदम उठाया है। अब इन देशों से 10 फीसदी तक की गैर-नियंत्रक लाभकारी हिस्सेदारी वाले निवेश स्वचालित मार्ग के तहत अनुमति पा सकते हैं, बशर्ते कि लागू क्षेत्रीय सीमा और अन्य शर्तों का पालन किया जाए। निवेशों के लिए उद्योग संवर्धन और आंतरिक व्यापार विभाग को संबंधित जानकारी और विवरण देना भी आवश्यक होगा।
आगे, भारत से भू-सीमा साझा करने वाले देशों की संस्थाओं से पूंजीगत वस्तुएं, इलेक्ट्रॉनिक घटक, इलेक्ट्रॉनिक पूंजीगत वस्तुएं और पॉलिसिलिकन जैसे विशिष्ट क्षेत्रों से जुड़े निवेश प्रस्तावों पर निर्णय प्रक्रिया को 60 दिनों के भीतर पूरा किया जाएगा। कैबिनेट सचिव के अधीन सचिवों की समिति को इस सूची में संशोधन करने का अधिकार है। दिशानिर्देशों में उल्लेख है कि निवेश प्राप्त करने वाली इकाई में बहुल हिस्सेदारी और नियंत्रण निवासी भारतीय नागरिकों या निवासी भारतीय नागरिकों द्वारा नियंत्रित भारतीय संस्थाओं के पास होना चाहिए।
इन संशोधित दिशानिर्देशों की मदद से कारोबारी सुगमता में सुधार और विदेशी निवेश की आवक बढ़ने की उम्मीद है। नीतिगत नजरिये से किसी भी बड़े देश के लिए चीन को बाहर रखना आसान नहीं है। वह दुनिया की दूसरी सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था है। यह निर्णय एक और अहम मोड़ पर आया है क्योंकि भारत को प्रत्यक्ष विदेशी निवेश की आवश्यकता है। वैश्विक वित्तीय तंत्र की अनिश्चितता को देखते हुए भारत को पूंजी के बहिर्गमन का सामना करना पड़ रहा है और देश भुगतान संतुलन में घाटे का भी सामना कर रहा है। पूंजी खाते में निरंतर घाटे के हालात बाह्य क्षेत्र के प्रबंधन को जटिल बना सकता है।
हालांकि, भू-राजनीतिक संवेदनशीलताओं को देखते हुए प्रत्यक्ष विदेशी निवेश की पूरी व्यवस्था की समीक्षा करने की आवश्यकता है। निस्संदेह, चीन को लेकर वाजिब चिंताए हैं और दुनिया के कई देश उसके साथ अपने संबंधों को पुनर्संतुलित कर रहे हैं। वर्तमान संदर्भ में, केवल कुछ विशेष देशों से आने वाले निवेशों की जांच पर्याप्त नहीं हो सकती। लाभकारी स्वामित्व संबंधी दिशा-निर्देशों के बावजूद, हमेशा यह निर्धारित करना संभव नहीं होता कि, उदाहरण के लिए सिंगापुर या यूरोप से आने वाले निवेश, चीनी पूंजी द्वारा नियंत्रित संस्थाओं से नहीं हैं।
इसके अलावा, यह तर्क दिया जा सकता है कि केवल चीनी पूंजी के खिलाफ ही हितों की रक्षा क्यों की जाए। भारत को उन क्षेत्रों की भी पहचान करनी चाहिए जिन्हें वह रणनीतिक मानता है और जिन्हें कोई शत्रुतापूर्ण देश उसके हितों को कमजोर करने के लिए इस्तेमाल कर सकता है। दूसरे शब्दों में, भारत को उन क्षेत्रों की पहचान करनी चाहिए जहां वह खुद की क्षमताएं विकसित करेगा या चुनिंदा विश्वसनीय देशों के साथ साझेदारी के माध्यम से उन्हें मजबूत करेगा।
बाकी क्षेत्रों को विदेशी निवेश के लिए उदारतापूर्वक खोला जा सकता है। भारत को उच्च विकास दर हासिल करने के लिए घरेलू बचत के पूरक के रूप में बड़े पैमाने पर विदेशी निवेश की आवश्यकता है। लेकिन एक ऐसी दुनिया में जो दिन-ब-दिन अधिक अप्रत्याशित होती जा रही है, उसे अपने रणनीतिक हितों की भी रक्षा करनी होगी।