facebookmetapixel
डॉलर की गिरती साख ने बदला वैश्विक बाजार का मिजाज: क्या रुपये में आगे भी जारी रहेगी गिरावट?वैश्विक अनिश्चितताओं के बीच SME मार्केट सेंटिमेंट इंडेक्स बढ़ा, बजट से मिलेगा और सहाराEPFO 3.0 के साथ PF सिस्टम में बड़ा बदलाव: नया पोर्टल, कोर बैंकिंग और AI से सेवाएं होंगी आसानGold Jewellery Sales: कीमतों में तेजी के बावजूद सोने की चमक बरकरार, दिसंबर में ज्वेलरी बिक्री 12% बढ़ीSBI MF ने उतारा क्वालिटी फंड, ₹5,000 से निवेश शुरू; किसे लगाना चाहिए पैसा?मर्सिडीज, BMW, ऑडी जैसी प्रीमियम कारें होंगी सस्ती! India-EU FTA का घरेलू ऑटो सेक्टर पर कैसे होगा असर₹2 लाख से ₹12 लाख तक: 2014 में मोदी सरकार के सत्ता में आने के बाद इनकम टैक्स में अब तक क्या बदला?Budget 2026: क्या म्युचुअल फंड पर घटेगा टैक्स?Budget 2026 की इनसाइड स्टोरी: वित्त मंत्री की टीम में शामिल ये 7 ब्यूरोक्रेट्स बनाते हैं ‘ब्लूप्रिंट’Edelweiss MF ने उतारा नया फंड, ₹100 की SIP से फाइनेंशियल कंपनियों में निवेश का मौका

बिहार में बटाईदार, क्या पाएंगे कानूनी अधिकार

महागठबंधन की मजबूत सहयोगी माकपा ने भी अपने घोषणापत्र में बटाईदारों के लिए पहचान पत्र पेश करने, उनके अधिकारों की गारंटी देने और बेदखली पर प्रतिबंध लगाने का वादा किया है।

Last Updated- November 03, 2025 | 10:56 PM IST
Indian Farmers

बिहार में चुनावी सरगर्मियां तेज होने के साथ पट्टेदार और बटाईदार किसानों के मुद्दे एवं उनके कानूनी अधिकार राजनीतिक बहस के केंद्र में आ गए हैं। विपक्ष राष्ट्रीय जनता दल (राजद) के नेतृत्व वाले महागठबंधन ने बटाईदार किसानों को न्यूनतम समर्थन मूल्य (एमएसपी) का दायरा बढ़ाने, किसान क्रेडिट कार्ड के माध्यम से सस्ते ऋण उपलब्ध कराने और अन्य सरकारी योजनाओं के लाभ देने की बात कही है। इसके लिए, उन्होंने ऐसे किसानों को विशेष पहचान पत्र जारी करने का भी प्रस्ताव रखा है।

महागठबंधन की मजबूत सहयोगी माकपा ने भी अपने घोषणापत्र में बटाईदारों के लिए पहचान पत्र पेश करने, उनके अधिकारों की गारंटी देने और बेदखली पर प्रतिबंध लगाने का वादा किया है।

कुछ साल पहले जारी राज्य स्तरीय बैंकर्स समिति की रिपोर्ट में कहा गया था कि बटाईदारी या पट्टेदारी बिहार के कृषि परिदृश्य की विशेषता बनती जा रही है। रिपोर्ट में कहा गया है कि राज्य में बटाईदारी की सीमा 2012-13 और 2018-19 के बीच 22.67 प्रतिशत से बढ़कर 25.1 प्रतिशत हो गई है। राष्ट्रीय स्तर पर इसी अवधि के दौरान यह आंकड़ा कुल परिचालन भूमि जोत के 10.88 प्रतिशत से बढ़कर 13 प्रतिशत हो गया है। लेकिन, विशेषज्ञ लंबे समय से यह तर्क देते रहे हैं कि डेटा पट्टेदारी के आधिकारिक आंकड़ों और वास्तविकता में बड़ा अंतर है। कुछ कहते हैं कि राज्य की 37 प्रतिशत से अधिक कृषि भूमि पट्टेदारी या बटाईदारी के तहत जोती जाती है।

रिपोर्टों से ऐसा संकेत मिल रहा है कि महागठबंधन बटाईदारों पर डी बंद्योपाध्याय आयोग की सिफारिशों को लागू करने के प्रति भी गंभीर है। वर्षों पहले स्थापित इस आयोग ने किरायेदार किसानों की सुरक्षा के लिए एक छत्र कानून और भूमि जोत पर एक सीमा का प्रस्ताव दिया था। हालांकि, महागठबंधन के घोषणापत्र में इन सिफारिशों को पूरी तरह से लागू करने की बात नहीं कही गई है।

इस बीच, सत्तारूढ़ राजग ने ‘कर्पूरी ठाकुर किसान सम्मान निधि’ नामक एक नई योजना के तहत मौजूदा पीएम-किसान भुगतान राशि के साथ राज्य की ओर से अतिरिक्त 3,000 रुपये देने की बात कही है।

पीएम-किसान योजना के तहत किसानों को प्रति वर्ष 6,000 रुपये मिलते हैं, लेकिन बटाईदार या पट्टेदार किसानों को इस योजना का लाभ नहीं मिलता है। आंकड़ों के मुताबिक बीते 7 अगस्त तक राज्य में पीएम-किसान योजना के लाभार्थियों की संख्या लगभग 75 लाख थी। इनमें अधिकांश भूस्वामी ही थे। वास्तविक किरायेदार किसानों की पहचान करना बड़ी चुनौती बनी हुई है। इस कारण उन्हें सरकारी की ऐसी योजनाओं का लाभ नहीं मिल पाता।

हाल ही में केंद्रीय कृषि मंत्री शिवराज सिंह चौहान ने संसद को बताया कि केंद्र ने किरायेदार या पट्टेदार किसानों को प्रधानमंत्री फसल बीमा योजना का लाभ देने का फैसला किया है। बशर्ते भूस्वामी इस बारे में लिखित सहमति दे। उन्होंने कहा कि यही नियम एमएसपी खरीद के लिए भी लागू होगा, जिस पर राज्य सरकार को ही फैसला लेना है। चौहान ने कहा कि हाल के महीनों में फसल बीमा योजना से 6,50,000 पट्टेदार किसानों को लाभ हुआ है, जबकि लगभग 42 लाख बटाईदारों से एमएसपी पर फसल खरीदी गई है। पहले ऐसे किसानों को प्रमुख योजनाओं का लाभ नहीं मिलता था।

बिहार में खेती की स्थिति

राज्य स्तरीय बैंकर समिति की रिपोर्ट में यह भी पता चला है कि 2015-16 में छोटे और सीमांत किसानों का बिहार के कुल परिचालन जोतों का लगभग 97 प्रतिशत हिस्सा था, जबकि राष्ट्रीय औसत 86.1 प्रतिशत था। बिहार में जोतों का औसत आकार 0.39 हेक्टेयर था जबकि राष्ट्रीय औसत 1.08 हेक्टेयर का एक तिहाई से थोड़ा अधिक था। सीमांत किसानों में औसत जोत 0.25 हेक्टेयर थी, जबकि राष्ट्रीय औसत 0.38 हेक्टेयर थी।

First Published - November 3, 2025 | 10:10 PM IST

संबंधित पोस्ट