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क्या आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस एक दिन इंसान को बेकार बना देगा? जानें एक्सपर्ट इसपर क्या सोचते हैं

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सिस्को के प्रेसिडेंट और चीफ प्रोडक्ट ऑफिसर जितु पटेल का मानना है कि AI के आने से इंसान पूरी तरह बेकार हो जाएंगे, यह डर बिल्कुल बेबुनियाद है

Last Updated- February 21, 2026 | 9:04 PM IST
artificial intelligence
प्रतीकात्मक तस्वीर | फाइल फोटो

क्या AI भविष्य में इंसान को बेकार बना देगा? यह प्रश्न आज के दौर में कई लोगों के मन में घूम रहा है। न्यूज एजेंसी PTI के साथ एक इंटरव्यू में सिस्को के प्रेसिडेंट और चीफ प्रोडक्ट ऑफिसर जितु पटेल ने कहा कि AI के आने से इंसान पूरी तरह बेकार हो जाएंगे, यह डर बिल्कुल बेबुनियाद है। उनका मानना है कि असली कमाल तब होता है जब इंसानी सोच-समझ और फैसला करने की क्षमता को मशीन की तेज रफ्तार वाली ऑटोमेशन के साथ जोड़ा जाए।

पटेल कहते हैं कि ऐसा कोई सीन नहीं दिखता जहां इंसान समाज के लिए वैल्यू ऐड करना पूरी तरह बंद कर दें। यह बात काफी दूर की लगती है। AI चैटबॉट से लेकर अब ऑटोनॉमस एजेंट्स तक पहुंच चुका है जो खुद एक्शन ले सकते हैं, लेकिन ये सब इंसानों की मदद के लिए हैं, उनकी जगह लेने के लिए नहीं।

इंसानी गर्मजोशी की कोई जगह नहीं

पटेल अपनी मां का उदाहरण देते हैं। तीन साल पहले उनकी मां को हॉस्पिटल में आठ हफ्ते भर्ती रखना पड़ा था, उसके बाद उनका निधन हो गया। उन्होंने कहा, “कोई भी AI नर्स की जगह नहीं ले सकता।” इंसानों को प्यार करने, समझने, महसूस करने और देखभाल करने की गहरी चाहत होती है। चैटबॉट से बात कर सकते हो, लेकिन दिल इंसानी स्पर्श की तलाश में रहता है। यह चीज कभी नहीं बदलेगी।

Also Read: TCS के CEO का दावा: AI के आने से सॉफ्टवेयर इंजीनियरिंग की नौकरियों में नहीं होगी कोई कमी

पटेल जोर देकर कहते हैं कि इंसानी जजमेंट और इंस्टिंक्ट हमेशा जरूरी रहेंगे। हर जॉब बदलेगा, कुछ पुरानी भूमिकाएं खत्म भी हो सकती हैं, लेकिन नई इंडस्ट्रीज पैदा होंगी जो पहले कभी नहीं थीं। AI की वजह से पूरी तरह नई संभावनाएं खुलेंगी। इंसान में खुद वैल्यू ऐड करने की प्राकृतिक इच्छा होती है। अगर जिंदगी सिर्फ बीच पर लेटकर गुजारनी पड़ जाए तो उसका मकसद ही खत्म हो जाएगा।

इंसानी क्रिएटिविटी को मशीनें नहीं छीन सकतीं: पटेल

पटेल कहते हैं कि इंसानी क्रिएटिविटी इतनी गहरी है कि मशीनें उसे कभी छीन नहीं सकतीं। भले ही AI कितना भी पावरफुल हो जाए, इंसान की एम्पैथी, क्रिएटिविटी और योगदान देने की भावना को कोई मशीन कॉपी नहीं कर सकती। काम के मैदान में AI को “डिजिटल को-वर्कर” की तरह इस्तेमाल करना होगा, जहां इंसान की निगरानी और साथ हमेशा रहेगा। इससे लोग ऊंचे स्तर के फैसले, क्रिएटिव काम और प्रॉब्लम सॉल्विंग पर फोकस कर पाएंगे।

पटेल साफ तौर पर कहते हैं, “मैं उस विचार को पूरी तरह खारिज करता हूं कि AI के आगे बढ़ने से इंसानी योगदान खत्म हो जाएगा।” उन्हें लगता है कि हमें AI का इस्तेमाल मशीन की बड़ी स्केल पर काम करने के लिए करना चाहिए, लेकिन पूरी तरह इंसान-केंद्रित तरीके से।

अभी दुनिया AI के दूसरे बड़े फेज में है। पहला फेज चैटबॉट्स का था जो सवालों के स्मार्ट जवाब देते थे। तब लगता था जैसे कोई जादू हो रहा हो। लेकिन इंसान बहुत तेजी से नॉर्मल हो जाते हैं। पटेल सैन फ्रांसिस्को के वेमो सेल्फ-ड्राइविंग कार्स का जिक्र करते हैं। पहली बार में लगता है – अरे वाह, अकेले कार में बैठे हो और वो खुद चला रही है! दूसरी बार ईमेल चेक करने लगते हो। तीसरी बार तो सीट्स की शिकायत करने लगते हो। बस, सब नॉर्मल हो गया।

पटेल कहते हैं कि टेक्नोलॉजी जितनी तेज आ रही है, इंसान भी उतनी ही तेजी से उसे अपनी जिंदगी का हिस्सा बना लेते हैं। जो आज बिल्कुल साइंस फिक्शन लग रहा है, वो कुछ ही समय में रोजमर्रा की बात हो जाएगी।

ट्रेनिंग और रनिंग के खर्चे अभी ज्यादा हैं, लेकिन यूनिट इकोनॉमिक्स तेजी से बेहतर हो रही है। पिछले दो साल में इंफरेंसिंग पर टोकन जेनरेशन की लागत 1000 गुना कम हो गई है। इंफ्रास्ट्रक्चर पर खर्च बढ़ेगा, लेकिन हर क्वेरी का खर्च बहुत तेजी से घटेगा।

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First Published - February 21, 2026 | 8:58 PM IST

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