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किसानों के विरोध के बीच दबाव का सामना कर रहे दुष्यंत चौटाला

सियासी हलचल
आदिति फडणीस /  September 24, 2020

कांग्रेस नेता एवं हरियाणा के पूर्व मुख्यमंत्री भूपेंद्र सिंह हुड्डा के नजरिये से देखें तो कृषि क्षेत्र में सुधार से संबंधित तीन विधेयकों का आना सबसे अच्छी बात हुई है। इन विधेयकों को तमाम विरोध के बावजूद संसद की मंजूरी भी मिल चुकी है। हरियाणा में लगातार दूसरी बार मिली चुनावी शिकस्त के बीच अपने जाट समर्थकों को दुष्यंत सिंह चौटाला की जननायक जनता पार्टी के हाथों तेजी से खोते जा रहे हुड्डा भ्रष्टाचार के आरोपों का भी सामना कर रहे हैं और उन्हें अपनी ही पार्टी के भीतर प्रतिरोध भी झेलना पड़ रहा है। ऐसी स्थिति में हुड्डा पिछले कुछ महीनों से अपनी खोई हुई राजनीतिक जमीन तलाशने में शिद्दत से लगे हुए हैं। इन कानूनों को लेकर हरियाणा के किसानों का डर एवं असुरक्षा उनके लिए वापसी का अवसर मुहैया करा रहा है।

लेकिन हुड्डा की खराब किस्मत से लाभान्वित होने वाले दुष्यंत चौटाला, जो जाट समुदाय के दिग्गज नेता रहे देवीलाल के खानदान से हैं, इस समय खुद को विश्वसनीयता के संकट से जूझता हुआ महसूस कर रहे हैं। वर्ष 2014 के चुनाव में कोई असर नहीं दिखा पाए दुष्यंत ने 2019 के विधानसभा चुनाव में असरदार प्रदर्शन कर हरियाणा की राजनीति में धमाकेदार प्रवेश किया। इसके पीछे इंडियन नैशनल लोकदल के बचे-खुचे असर को फिर से स्थापित करने में उनकी भूमिका का अहम योगदान रहा। जब भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) 90 सदस्यीय विधानसभा में 40 का आंकड़ा भी नहीं पार कर पाई तो उसने 10 सीटें जीतने वाले दुष्यंत चौटाला से संपर्क साधा। मौके की नजाकत का पूरा फायदा उठाते हुए दुष्यंत ने तगड़ी सौदेबाजी की।

हरियाणा में काफी हद तक जाट-विरोधी मानी जाने वाली भाजपा को दुष्यंत ने समर्थन देने का फैसला किया था। असल में भाजपा ने जाट वर्चस्व वाले हरियाणा में मनोहर लाल खट्टर जैसे गैर-जाट नेता को लगातार दो बार मुख्यमंत्री बनाया है और इसमें गैर-जाट जातियों के बने सियासी समीकरण की अहम भूमिका रही है। बहरहाल दुष्यंत को खट्टर मंत्रिमंडल में उप-मुख्यमंत्री की कुर्सी मिल गई। लेकिन उनकी पार्टी को लगता है कि जाट समुदाय के इस युवा नेता को वह अहमियत एवं सम्मान नहीं मिला जिसके वह हकदार थे।

वह इस सियासी नाटक का वह दौर था जब किसानों को उनकी उपज का समुचित मूल्य दिलाने की मंशा वाले ये तीनों अध्यादेश नहीं लाए गए थे। गत जून में केंद्रीय मंत्रिमंडल ने जब इन अध्यादेशों को मंजूरी दी थी तब किसान व्यस्त एवं काम में लगे हुए थे। लेकिन इन अध्यादेशों के प्रभावों को लेकर आशंकाएं एवं भय से सराबोर आवाजें उठने लगी थीं। लेकिन जब इन अध्यादेशों को कानून का शक्ल देने के लिए संसद में विधेयक पेश करने का वक्त आया तो पंजाब के साथ-साथ हरियाणा के भी किसान उबल पड़े।

हरियाणा सरकार इन प्रदर्शनों से निपटने का केवल एक ही तरीका जानती है और वह है किसानों की भीड़ पर लाठियां बरसाने का। जाट किसानों से भरी इस भीड़ पर जब कुरुक्षेत्र में लाठियां बरसाई गईं तो उन्होंने सरकारी संपत्ति को नुकसान पहुंचाना शुरू कर दिया। हालांकि हरियाणा के गृह मंत्री अनिल विज ने एक ट्वीट में यह दावा किया, 'राज्य में कहीं भी लाठीचार्ज नहीं हुआ है और न ही किसी को चोट लगी है। किसानों पर बलप्रयोग के कोई आदेश नहीं दिए गए थे।'

लेकिन भाजपा के लोकसभा सदस्यों धरमवीर सिंह (भिवाणी-महेंद्रगढ़) एवं बिजेंद्र सिंह (हिसार) ने खुलेआम कहा कि उन्हें गृहमंत्री की बातों पर यकीन नहीं है। धरमवीर ने ट्वीट कर कहा, 'एक लोकतांत्रिक देश में किसानों की आवाज सुने बगैर ही उन पर लाठियां चला देना निंदनीय है। किसानों से बात करना सरकार का दायित्व है।'

अगर दुष्यंत चौटाला चौधरी चरण सिंह या देवीलाल के कद के जाट नेता होते तो वह अपने समुदाय को आश्वस्त करने में सफल रहते। लेकिन यह मुद्दा अब गरम हो चुका है और एकदम दूसरी दिशा में जाता हुआ नजर आ रहा है। अब दांव पर महज किसानों के हित नहीं हैं बल्कि यह जाट समुदाय की इज्जत का भी सवाल बन गया है। जाट समुदाय को हरियाणा की सियासत में केंद्रीय भूमिका से अलग रहते हुए छह साल हो चुके हैं। हरियाणा पिछड़ी जाति आयोग की 2017 की रिपोर्ट कहती है कि जाटों की आबादी करीब 25 फीसदी है और उनमें से 75 फीसदी खेती-किसानी से जुड़े हैं।

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की तरफ से बार-बार दिए जा रहे आश्वासन के बावजूद बहुत कम किसान ही केंद्र एवं राज्य की सरकारों पर यकीन कर पा रहे हैं। सरकार का कहना है कि नया कानून बनने के बाद भी न्यूनतम समर्थन मूल्य (एमएसपी) पर फसलों की खरीद की व्यवस्था जारी रहेगी। लेकिन केंद्रीय खाद्य प्रसंस्करण मंत्री हरसिमरत कौर बादल के इस्तीफे के बाद दुष्यंत चौटाला पर भी दबाव बढ़ गया है।

योजना आयोग के पूर्व सदस्य एवं जाने-माने कृषि अर्थशास्त्री सोमपाल की इस मसले पर अलग राय है। वह कहते हैं, 'यह सच है कि हरियाणा के किसान तय कीमत पर उपज की सरकारी खरीद नहीं होने को लेकर आशंकित हैं। ऐसी स्थिति में उन्हें बाजार की दया पर आश्रित होना होगा जहां उन्हें वाजिब कीमत मिलना संदिग्ध होगा। लेकिन हमें अधिक इंतजार नहीं करना होगा। खरीफ फसलों की सरकारी खरीद 25 सितंबर से शुरू ही होने वाली है। ऐसे में मुझे पूरा यकीन है कि किसानों की चिंताओं से सजग केंद्र एवं राज्य सरकारें फसलों की खरीद के इंतजाम पहले से भी बेहतर रखेंगी। अगर एक बार किसान संतुष्ट हो गए कि सरकार उनकी पैदावार खरीदने के लिए मौजूद है तो कृषि सुधार विधेयकों के खिलाफ जारी अभियान की हवा निकल जाएगी।'

शायद यही वजह है कि दुष्यंत चौटाला के शिरोमणि अकाली दल के रास्ते पर चलते हुए इस्तीफा देने की संभावना कम है। उन्हें बस चुपचाप रहना और खरीफ फसलों की खरीद शुरू होने का इंतजार करना है।

Keyword: किसान, दुष्यंत चौटाला, भूपेंद्र सिंह हुड्डा, कृषि विधेयक, संसद, जननायक जनता पार्टी, भ्रष्टाचार,
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