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जगदीप धनखड़ के इस्तीफे पर सरकार की खामोशी से अटकलें तेज, विपक्ष ने कहा- मामला सिर्फ सेहत से जुड़ा नहीं

जगदीप धनखड़ के इस्तीफे के बाद प्रधानमंत्री के अलावा किसी नेता ने उन्हें सार्वजनिक रूप से नहीं सराहा, जिससे राजनीतिक संदेश और अटकलें तेज हो गईं।

Last Updated- July 22, 2025 | 11:01 PM IST
Jagdeep Dhankhar
जगदीप धनखड़

सोमवार की शाम को जगदीप धनखड़ के अपना त्याग पत्र सोशल मीडिया पर पोस्ट करने के लगभग 15 घंटे बाद सरकार की ओर से केवल प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ऐसे व्य​क्ति रहे जिन्होंने इस 74 वर्षीय नेता को विदाई दी। राष्ट्रपति को लिखे अपने पत्र में धनखड़ ने कहा था कि वह स्वास्थ्य कारणों से उपराष्ट्रपति पद से इस्तीफा दे रहे हैं। 

धनखड़ ने यह पत्र रात 9.25 बजे एक्स पर पोस्ट किया। इसके बाद मंगलवार को दोपहर 12.13 बजे एक्स पर ही प्रधानमंत्री मोदी ने लिखा, ‘धनखड़ को उपराष्ट्रपति सहित विभिन्न भूमिकाओं में देश की सेवा करने के कई अवसर मिले। मैं उनके अच्छे स्वास्थ्य की कामना करता हूं।’ प्रधानमंत्री के अलावा सत्तारूढ़ गठबंधन के किसी भी नेता ने न तो धनखड़ के आवास पर जाकर उनका हालचाल जाना और न ही सोशल मीडिया पर उनके स्वस्थ होने की कामना की। 

सरकार और धनखड़ के बीच छायी इस चुप्पी ने तमाम अटकलों को हवा दी और कयास लगाए जाने लगे कि दोनों पक्षों के बीच सब कुछ ठीक नहीं है। कांग्रेस संचार प्रमुख जयराम रमेश ने इस मुद्दे पर कई पोस्ट किए। उन्होंने दावा किया कि उपराष्ट्रपति के रूप में धनखड़ के इस्तीफे के पीछे के कारण उनके द्वारा बताए गए स्वास्थ्य संबंधी मुद्दों की तुलना में कहीं अधिक गहरे हैं। उन्होंने कहा, ‘जगदीप धनखड़ के जबरन इस्तीफे के संबंध में प्रधानमंत्री के पोस्ट ने रहस्य को और बढ़ा दिया है।’

इससे पहले एक पोस्ट में रमेश ने सोमवार को दूसरी कार्य मंत्रणा समिति (बीएसी) से केंद्रीय मंत्रियों जेपी नड्डा और किरेन रिजिजू की अनुपस्थिति का भी जिक्र किया, जिसमें कहा गया कि सोमवार को दोपहर 1 बजे से शाम 4.30 बजे के बीच कुछ बहुत गंभीर हुआ, जिसके कारण वे जानबूझकर दूसरी बीएसी से अनुपस्थित रहे। कांग्रेस के राज्य सभा सांसद विवेक तन्खा ने कहा कि धनखड़ का इस्तीफा अप्रत्याशित है। तन्खा ने एक्स पर पूछा, ‘क्या कल उन्होंने जिस तरह दो महाभियोग प्रस्तावों (जस्टिस शेखर यादव और जस्टिस यशवंत वर्मा) को सक्रिय रूप से संभाला, वह उनके लिए अंतिम मामला बन गया?’

कांग्रेस और अन्य विपक्षी दलों के सांसदों ने पिछले साल धनखड़ के खिलाफ महाभियोग प्रस्ताव पेश किया था, लेकिन उनके विदा होने पर उनकी प्रशंसा की है। रमेश ने कहा कि धनखड़ ने 2014 के बाद के भारत की सराहना की, लेकिन किसानों के कल्याण के लिए निडरता से बात की, सार्वजनिक जीवन में ‘अहंकार’ के खिलाफ जोरदार ढंग से और न्यायिक जवाबदेही एवं संयम पर दृढ़ता से बात की। कांग्रेस नेता ने कहा कि धनखड़ ने विपक्ष के साथ संतुलन बनाने की कोशिश की। वह मानदंडों और प्रोटोकॉल के प्रति काफी सख्त थे। उनका मानना था कि उपराष्ट्रपति और राज्य सभा के सभापति दोनों के रूप में उन्हें लगातार अनदेखा किया जा रहा था।

गृह मंत्रालय ने मंगलवार दोपहर को धनखड़ के इस्तीफे को अधिसूचित किया। राज्य सभा को दोपहर 12 बजे मंत्रालय की अधिसूचना के बारे में बताया गया और बाद में उच्च सदन के उपसभापति हरिवंश ने राष्ट्रपति से मुलाकात की। हरिवंश ने दोपहर में सदन को बताया कि भारत के उपराष्ट्रपति पद के खाली होने से संबंधित आगे की संवैधानिक प्रक्रिया जैसे ही प्राप्त होगी, सूचित कर दी जाएगी।

धनखड़ ने सोमवार को सदन को बताया था कि उन्हें भ्रष्टाचार के संदिग्ध मामले में फंसे न्यायमूर्ति यशवंत वर्मा को हटाने के लिए 63 विपक्षी सांसदों से प्रस्ताव का नोटिस मिला है। विपक्ष के सूत्रों के अनुसार, यह नोटिस जस्टिस वर्मा को हटाने के लिए लोक सभा में एक द्विदलीय प्रस्ताव जुटाने की सरकार की योजना के खिलाफ था। इस तथ्य से सत्तारूढ़ गठबंधन के लिए और अधिक शर्मनाक ​स्थिति बन गई कि यह प्रस्ताव पूरी तरह विपक्ष द्वारा लाया गया था। सूत्रों ने कहा कि वरिष्ठ मंत्रियों ने भाजपा और उसके सहयोगियों के राज्य सभा सांसदों से एक दस्तावेज पर हस्ताक्षर करवाए। इसके बारे में कुछ सदस्यों का कहना था कि यह विपक्ष के नोटिस के समान था, ताकि यह सुनिश्चित किया जा सके कि उच्च सदन में न्यायमूर्ति वर्मा को हटाने के लिए केवल विपक्षी सदस्य ही नहीं सक्रिय नहीं हैं।

तन्खा की तरह अन्य नेताओं ने भी कहा कि 2019 में पश्चिम बंगाल के राज्यपाल बनने से पहले वरिष्ठ वकील के तौर पर काम करने वाले धनखड़ ने कई मुद्दों पर न्यायपालिका पर तीखा हमला किया। ताजा मामला वर्मा से जुड़ा है।

संविधान के अनुच्छेद 68 के खंड 2 के अनुसार मृत्यु, इस्तीफे या निष्कासन अथवा दूसरे कारणों से खाली होने वाले उपराष्ट्रपति के पद को भरने के लिए जितनी जल्दी हो सके, चुनाव कराना होगा। इस मामले में राष्ट्रपति पद के लिए दिए जाने वाले छह महीने के समय के विपरीत, समय सीमा तय नहीं है। बीच कार्यकाल में उपराष्ट्रपति बनने वाला व्य​क्ति उस तारीख से पूरे पांच तक पद पर रहने का हकदार होता है। राज्य सभा में उपराष्ट्रपति की अनुप​स्थिति में उनके कार्यों का निर्वहन सदन के उपसभापति करते हैं।

(साथ में एजेंसियां)

First Published - July 22, 2025 | 10:38 PM IST

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