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केंद्र को उत्तराखंड की गुगली

Last Updated- December 09, 2022 | 4:35 PM IST

केंद्र सरकार को करारा जवाब देते हुए उत्तराखंड सरकार ने कहा है कि उसने एचएसपीसी से 420 मेगावाट क्षमता वाली लखवर-व्यासी पनबिजली परियोजना को वापस लेने का फैसला किया है।


उत्तराखंड के बिजली सचिव प्रभात सारंगी ने केन्द्रीय बिजली मंत्रालय को भेजे एक पत्र में कहा है कि सार्वजनिक क्षेत्र की कंपनी उत्तराखंड जल विद्युत निगम लिमिटेड (यूजेवीएनएल) लखवर-व्यासी परियोजना का विकास करेगी।

यह परियोजना पिछले दो दशक से अघर में लटकी है और इसके लिए 35,000 से 40,000 करोड़ रुपये तक का निवेश प्रस्तावित है।

इससे पहले केन्द्रीय बिजली राज्य मंत्री जयराम रमेश ने उत्तराखंड से इन दोनों परियोजनाओं को एनएचपीसी को सौंपने के लिए कहा था। केंद्र को दिए जवाब में राज्य सरकार अपने पिछले रुख से भी हटती हुई दिख रही है क्योंकि इससे पहले उत्तराखंड 300 मेगावाट क्षमता वाली लखवर परियोजना को सौंपने की बात कहता रहा है।

लखवर और व्यासी परियोजना का निर्माण देहरादून जिले में यमुना नदी पर प्रस्तावित है। इस बात की पुष्टि करते हुए यूजेवीएनएल के अध्यक्ष योगेन्द्र प्रसाद ने बताया कि लखवर-व्यासी परियोजना को राज्य द्वारा संचालित कंपनी को देने की प्रक्रिया शुरू कर दी गई है।

उन्होंने बताया कि ‘हम हर संभव कोशिश कर रहे हैं कि परियोजना चार वर्षों के भीतर पूरी हो सके।’ इससे पहले भागीरथी पर दो परियोजनाओं भैरोघाटी और पालामनेरी के निर्माण को रोकने के बाद राज्य सरकार ने जुलाई में लखवर-व्यासी परियोजना यूजेवीएनएल को सौंप दी थी।

एचएचपीसी के पक्ष में उतरते हुए केन्द्रीय बिजली राज्य मंत्री जयराम रमेश ने हाल में राज्य सरकार को पत्र लिखकर लखवर और व्यासी परियोजनाओं को पीएसयू कंपनी को सौंपने का अनुरोध किया था।

एनएचपीसी ने इस परियोजना के लिए विभिन्न सर्वेक्षण किए थे और विस्तृत परियोजना रिपोर्ट तैयार की थी। प्रसाद ने कहा कि राज्य सरकार एनएचपीसी को वह राशि भी देने को तैयार है  जिसे एनएचपीसी ने अब तक इस परियोजना के सिलसिले में खर्च किया हो।

राज्य सरकार ने इन दोनों परियोजनाओं को यूजेवीएनएल को इस लिए देने का फैसला किया है ताकि उत्तराखंड पूरी बिजली हासिल कर सके।

यदि परियोजना एनएचपीसी को मिलती है तो राज्य को गाडगिल फार्मूले के तहत केवल 13 प्रतिशत बिजली मिलेगी। इस परियोजना से करीब 92.7 करोड़ मेगावाट बिजली मिलेगी।

इसके अलावा पूर्वी यमुना नहर के जरिए 40,000 हेक्टयर जमीन को पानी मिल सकेगा। पेयजल और सिंचाई सुविधा के रूप में उत्तर प्रदेश, हरियाणा और दिल्ली को फायदा मिलेगा।

एनएचपीसी के अधिकारियों से संपर्क करने पर उन्होंने बताया कि परियोजना उन्हें दी जानी चाहिए जिन्होंने उसके लिए बुनियादी काम किया है।

इस बीच उन्होंने बताया है कि परियोजना से तैयार बिजली की लागत 8 करोड़ से 10 करोड़ रुपये प्रति मेगावाट के बीच रहने का अनुमान है जो राज्य सरकार के लिए व्यवहारिक नहीं है।

एनएचपीसी के एक शीर्ष अधिकारी ने बताया कि ‘एनएचपीसी को परियोजना के लिए भारी सब्सिडी मिलेगी जिसे राज्य सरकार हासिल नहीं कर सकती है।’

सूत्रों ने बताया कि केन्द्र सरकार ने राज्य सरकार से गाडगिल फार्मूले में परिवर्तन का जो वादा किया था उसको नहीं निभाया और इस बीच राज्य की विद्युत जरूरतें बढ़ रही हैं इसलिए राज्य सरकार ने इस परियोजना पर खुद काम करने की योजना बनाई है।

First Published - January 2, 2009 | 8:54 PM IST

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