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मध्य प्रदेश में भाजपा राज के लिए चेतने का वक्त

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Last Updated- December 11, 2022 | 5:17 PM IST

मध्य प्रदेश में शहरी स्थानीय निकाय चुनावों के नतीजे अनूठे हैं क्योंकि भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) और कांग्रेस दोनों ही जीत का दावा कर रहे हैं। भाजपा ने जहां ‘कुलमिलाकर’ जीत हासिल होने की बात कही है वहीं कांग्रेस नेतृत्व का दावा है कि पांच शहरों के महापौर पदों पर जीत और दो पर बहुत मामूली अंतर पर हार से पार्टी ने अपनी स्थिति मजबूत की है।
2014-15 में पिछले चुनाव में भाजपा ने सभी 16 मेयर पद हासिल किए थे। लेकिन इस बार उसके दो महापौर बहुत मामूली अंतर से जीते हैं। बुरहानपुर में भाजपा के महापौर प्रत्याशी को केवल 542 मतों से जीत हासिल हुई जबकि उज्जैन में जीत का अंतर केवल 736 मतों का रहा। कांग्रेस ने बुरहानपुर में अपनी हार का ठीकरा असदुद्दीन ओवैसी की पार्टी एआईएमआईएम पर फोड़ा जिसके प्रत्यशी ने 10,000 से अधिक मत हासिल किए।
भाजपा को ग्वालियर-मुरैना, जबलपुर और रीवा जैसे अपने पारंपरिक गढ़ गंवाने पड़े। इन शहरों में भाजपा दशकों से जीतती आ रही थी। ग्वालियर और मुरैना तो क्रमश केंद्रीय मंत्रियों ज्योतिरादित्य सिंधिया और नरेंद्र सिंह तोमर के गढ़ हैं। जबलपुर में भाजपा के राष्ट्रीय अध्यक्ष जेपी नड्डा और प्रदेश अध्यक्ष विष्णुदत्त शर्मा की करीबी रिश्तेदारी है। इन दोनों जगहों पर कांग्रेस पिछले 23 वर्षों से नहीं जीत पायी थी।
ध्यान रहे विंध्य प्रदेश मध्य प्रदेश के सबसे गरीब तथा पिछड़े इलाकों में से एक है। इसमें रीवा, सतना, सीधी और सिंगरौली चार जिले आते हैं। पिछले विधानसभा चुनाव में भाजपा ने यहां अधिकांश सीटों पर जीत हासिल की थी।
सबसे दिलचस्प नतीजों में से एक सिंगरौली से आया जहां आम आदमी पार्टी की उम्मीदवार रानी अग्रवाल ने महापौर के चुनाव में जीत हासिल की। सिंगरौली में आप के पांच पार्षदों को भी जीत हासिल हुई।
राजनीतिक विशेषज्ञ अनिल जैन कहते हैं कि शहरी इलाकों में भाजपा की मजबूत पकड़ रही है। मध्य प्रदेश के बीते दो दशकों से महापौर का प्रत्यक्ष चुनाव हो रहा है और यह भाजपा का अब तक का सबसे खराब प्रदर्शन है।
जैन कहते हैं, ‘पांच सीटों पर जीत कांग्रेस को मजबूती देगी क्योंकि पाटी 2020 के आरंभ में भाजपा के हाथों सत्ता गंवाने के बाद से लगातार उपचुनाव हारती आयी है। प्रदेश में विधानसभा चुनाव एक वर्ष से कुछ ही अधिक समय बाद होने हैं ऐसे में इन चुनावों से कांग्रेस का उत्साह बढ़ना तय है।’
आत्मावलोकन का वक्त
भाजपा के राष्ट्रीय महासचिव कैलाश विजयवर्गीय इस पराजय को लेकर अधिक मुखर रहे हैं। उन्होंने ग्वालियर की हार को चिंता का विषय बताते हुए कहा कि पार्टी को कारणों की पड़ताल करनी होगी। विजयवर्गीय को मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान के साथ दूरी के कारण भी जाना जाता है।
उन्होंने एक साक्षात्कार में यह भी कहा कि मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान नौकरशाहों पर अधिक भरोसा करते हैं। उन्होंने कहा कि पार्टी के कार्यकर्ता भी समान महत्व रखते हैं और उन पर भी भरोसा किया जाना चाहिए।
भाजपा के एक नेता कहते हैं कि कई सीटों पर प्रत्याशी चयन बहुत अहम था और इसमें कांग्रेस ने बाजी मारी।
वह कहते हैं कि ग्वालियर में हार के लिए सिंधिया और तोमर के बीच का द्वंद्व जिम्मेदार रहा। कांग्रेस की तारीफ करते हुए वह छिंदवाड़ा के विक्रम सिंह अहके का उल्लेख करते हैं जो 32 वर्ष की आयु में मध्य प्रदेश के सबसे युवा महापौर बन गये।
कांग्रेस मीडिया विभाग के प्रभारी के के मिश्रा कहते हैं कि भाजपा ने इन चुनावों में प्रशासनिक मशीनरी का दुरुपयोग नहीं किया होता तो उनके दल को और सीटें मिल जातीं। वह कहते हैं, ‘बुरहानपुर और उज्जैन के नतीजे देखिए। इन दोनों सीटों पर हमारे उम्मीदवार 800 से कम मतों से हारे। हमारे पास यह मानने के पर्याप्त कारण हैं कि भाजपा ने हमें हारने के लिए अनुचित साधन अपनाये।’
कांग्रेस का दावा है कि भाजपा को स्थानीय प्रशासन ने भी फायदा पहुंचाया। परंतु कांग्रेस को भी आत्मावलोकन करना ही होगा। कांग्रेस ने पांच महापौर पद जरूर हासिल किए हैं लेकिन अधिकांश जगहों पर नगरीय निकायों में भाजपा का बहुमत है। इन चुनावों में कांग्रेस के तीन विधायकों को भी हार का सामना करना पड़ा है।

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First Published - July 27, 2022 | 12:55 AM IST

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